भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासहित ११७ अग्नि की उपस्थापना अधिक विस्तृत स्थण्डिलादि पर रखते हुए अग्निस्थापनादि होम कर्म करते हुए किसी अन्यतम संस्कार (जो सबके बाद क्रम में रहे उस) के होम को समाप्त करना चाहिए। (क्योंकि संस्कारों में सभी के सहैकभाव में सम्पन्न होने के बाद ही होम कार्य सम्पन्न होता है)॥५५॥ यद्येकदिवसे पञ्च तथा मन्त्राहुतेः परम् । कृत्वा यागाद्यमखिलं तन्त्रशेषं समापयेत् ॥५६॥ यदि एक ही दिवस में पांच संस्कार किये जाए तो मन्त्राहुति के पश्चात् (एक ही अग्नि में) यागादि सभी कार्य किये जाएं तथा एक साथ सभी शेष कर्म पूर्ण किये जाएं (अथवा एक साथ सभी संस्कारों की समाप्ति होनी चाहिए।॥५६॥ एकदेशयुतोऽप्यन्यसंस्काराणां गुणान्वितः । युक्तः परमसंस्कारैः स वै भागवतः स्मृतः ॥५७॥ अन्यथा सभी वर्णादि समुचित संस्कारों में कुल संस्कारों के सम्पन्न होने की स्थिति वाला रहने पर तथा पांच संस्कारों से युक्त होनेवाला गुणकारी या उत्तम माना जाता है क्योंकि वह उत्तम पांच संस्कारों से पूर्ण है तथा उसे ही 'भागवत' समझना चाहिए॥५७॥ तापस्तपांसि तीर्थानि पुण्ड्रं नाम नमस्क्रिया । आम्नायाः सकला मन्त्राः क्रतवः पूजनं हरे ॥५८॥ इनमें ताप तप रूप है, पुण्ड्र तीर्थभूत है (जिसका फल समस्त तीर्थों का स्नान करने जैसा है), नाम ही इष्ट की नमस्क्रिया है, मन्त्र का जप समस्त वेदों का आम्नायभूत है तथा नारायण का पूजन ही यज्ञ का सम्पादन है॥५८॥ वृत्तिर्भागवतानां हि सर्वा भगवतः क्रियाः । प्रायश्चित्तिरियं तस्याः सैव यत् क्रियते पुनः ॥५९॥ भागवत जन की विहित आचार वाली सभी वृत्ति श्रीमन्नारायण की सेवा रूप है। इस सेवावृत्ति के बार बार अनुष्ठान करते रहने से दोषरूप आचरणों का प्रायश्चित्त हो जाता है। (अर्थात् प्रमाद या क्रिया लोप रूप दोष के होने पर सेवावृत्ति को दोहराने से ही प्रायश्चित होकर कर्ता की शुद्धि हो जाती है)॥५९॥ तस्मादाराधनं विष्णोः शान्तिकर्म विधीयते । तथैव विष्णुभक्तानां पूजनं शान्तिरुत्तमा ॥६०॥ इसलिये श्रीमन्नारायण की आराधना ही समस्त प्रत्यवायों को दूर करने का शान्तिकर्म है और उसे ही सदा बार बार करते रहना इष्ट है। इसी प्रकार विष्णु-भक्त-जन की अर्चनादि धर्म-कर्म उत्तम शान्ति कर्म है (क्योंकि इससे