नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता श्रीभगवान् की पूजन ही होती है) ॥६०॥ मन्त्रसंस्कारयुक्तस्य न चेत् तापादिकं तदा । परमाख्या भवेच्छान्तिरविभागे सतामपि ॥६१॥ यदि मन्त्र संस्कार से युक्त पुरुष के तापादि संस्कार न हुए हों, परमशान्ति के हेतु परमशान्तिभूत अनुष्ठान बिना क्रम तथा विभाग के पांच संस्कार को सम्पन्न करनेवाली परमशान्ति विधि ही की जाना उचित है॥६१॥ परमाख्याथ वैयूही मूर्त्याख्या वैभवीति च । आनन्ती गारुडी चैव वैष्वक्सेनी सुदर्शनी ॥६२॥ इस परमशान्ति के क्रम में परमनामकशान्ति, वैयूही शान्ति, मूर्ति शान्ति, वैभव-शान्ति, आनन्ती-शान्ति, गारुडी-शान्ति, वैष्वक्सेनी-शान्ति तथा सुदर्शनी- शान्ति आती हैं॥६२॥ चतुष्टयी महाशान्तिरुपशान्तिश्चतुष्टयी । यथानिमित्तं कर्त्तव्यास्तथान्यः श्रीभुवादयः ॥६३॥ इनमें परमाख्य, वैयूही, मूर्त्याख्या तथा वैभवी ये चार महाशान्ति कहलाती है तथा आनन्त, गारुडी, वैष्वक्सेनी तथा सुदर्शना ये चार उपशान्ति हैं। जिन्हें जैसा कारण या अपेक्षा ही तदनुसार इन्हें करना चाहिए। इसी के समान भूशान्ति आदि अन्य शान्तिकर्म भी हैं जिन्हें यथानिमित्त करना चाहिए॥६३॥ दानहोमजपार्चानामेकाद्वित्र्यखिलान्वयात् । नैकभेदविभिन्नास्ताः पात्रोत्कर्षश्च शक्तितः ॥६४॥ ये शान्ति, कर्म, दान, होम, जप, पूजा आदि में एक, दो, तीन तथा चारों के साथ सम्बद्ध होकर अनेक भेदों से युक्त हो जाती हैं जिनमें पांचों के शक्ति के अनुसार वरण करने से शक्ति के अल्प बहुत्व के कारण उत्कर्ष हो जाता है॥६४॥ हीना परमसंस्कारैर्देवतान्तरबुद्धयः । ऋत्विजौ यजमानाश्च च्यावयन्ति परस्परम् ॥६५॥ क्योंकि जो तापादि पांच परम संस्कार हैं उनमें जो हीन होते हैं तथा अनेक दूसरे देवताओं की अर्चना तथा उनके यज्ञों को जो सम्पन्न करनेवाले होते हैं तो ऐसे याजक ऋत्विकगण तथा उनके अनुगत यजमान थे दोनों ही परस्पर (श्रीविष्णु के विमुख होने से) एक दूसरे को लक्ष्य से गिराकर (उन्हें) पतित बनाते हैं॥६५॥ अपराधेषु सर्वेषु वृत्यङ्गानां यथाविधि । वृत्तेश्च परिपोषाय शान्तिं शाश्वत् प्रयोजयेत् ॥६६॥