नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 121, कुल 176 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित १९९ इस प्रकार के सभी वृत्ति तथा उनके अंगो के न करने या उनके विरुद्ध आचरण जैसे वृत्ति के परिपोष के लिये विधिवत् प्रतिबन्धक दुरित की निवृत्ति के लिये वृत्ति की ही शान्ति हेतु आधारभूत अनुष्ठान करना उचित है॥६६॥ करणे प्रतिषिद्धानां विहिताकरणे तथा । विधेया महती शान्तिर्विज्ञाय गुरुलाघवम् ॥६७॥ विहित कर्मों के आचरण न करने पर तथा प्रतिषिद्ध आचरणों के करने पर उनके द्वारा होनेवाले कारण के अल्पमात्रा में या विस्तृत रहने पर उनके गुरुलाघव का विचार कर परम आदि महाशान्ति में से जो भी उपयुक्त हो उसको सम्पन्न करना चाहिए॥६७॥ अवैष्णवेभ्यो यत्किञ्चित् प्रतिगृह्य प्रदाय वा । कृत्वोपशान्तिं शुद्ध्येत् परिवादे सतामपि ॥६८॥ जो वैष्णव न हों उन्हें किसी वस्तु आदि को देने अथवा उनसे किसी पदार्थ के ग्रहण करने पर गारुडी आदि उपशान्ति में से जो भी उपयुक्त या विहित हो उस शान्ति को करने पर दोष से शुद्धि होती है, किन्तु एकान्ती वैष्णव की निन्दा के अपराध पर उन्हें महाशान्ति कर्म के बाद गारुडी आदि उपशान्ति भी करना चाहिए॥६८॥ असतः प्रतिगृह्णीयात् पुत्रदारादिकं यदि । विधाय परमां शान्तिं वृत्तिमाचारयेन्निजाम् ॥६९॥ यदि अवैष्णवजन से पुत्र अथवा स्त्री आदि का सम्बन्धादि का योग हो तो ऐसे सम्बन्ध के हो जाने पर परमाशान्ति का कर्म करवाये तथा अपनी वैष्णव वृत्ति को उन पुत्र तथा दास आदि से भी करवाए और उन्हें अपने आचार से समान कार्यवाले बना ले॥६९॥ भजने चान्यदेवानामपचारे च शार्ङ्गिणः । वैयूहीं परमां वापि कुर्याच्छान्तिं विशुद्धये ॥७०॥ अन्य देवता के प्रति भक्ति रखने तथा श्रीविष्णु की इष्टदेव के रूप में उपासना में कमी कर देने पर इस उपचार (दोष) की शुद्धि के लिये वैयूही अथवा परमा नामक शान्ति कर्म को किया जाता है॥७०॥ लक्षणानामकरणे धारणे चान्यलक्ष्मणाम् । मूर्तिं कुर्यान्महाशान्तिमपि सौदर्शनीं तथा ॥७१॥ तापादि वैष्णव चिन्हों के धारण न करने तथा तदनुरूप कर्म से अन्य चिन्हों के धारणादि से विमुख रहने की वृत्ति में रहने पर मूर्ति नामक महाशान्ति अथवा