नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२० नारदपञ्चरात्रं भारद्वाजसंहिता सौदर्शनी नामक उपशान्ति कर्म को गुरु लाघव का विचार कर करना चाहिए॥७१॥ अपचारे गुरूणाञ्च वैष्णवानाञ्च सर्वशः । वैष्वक्सेन्यथ वानन्ती कार्या चासन्निषेवणे ॥७२॥ वैष्णव गुरु तथा वैष्णवों के साथ होने वाले असन्निषेवणरूप उपचार होने पर वैष्वकसेनी या आनन्ती नामक शान्तिकर्म को विचार कर करना चाहिए॥७२॥ असच्छास्त्राभियोगे तु सच्छास्त्राणां निराकृतौ । कर्तव्या गारुडी शान्तिर्दुर्निमित्तेषु वैभवी ॥७३॥ वैष्णवशास्त्रों के विरोधी शास्त्रों के अध्ययन करने तथा वेद एवं वैष्णवादि असत् शास्त्रों के निराकरण करने पर गारुडी शान्ति कर्म करना चाहिए तथा दुर्निमित्तोंके या बुरे शकुनों के दिखाई देने पर वैभवी नामक शान्ति की जाए॥७३॥ अवैष्णवस्य भुक्त्वान्नमनिवेदितमेव वा । पीत्वा पादोदकं भक्त्या वैष्णवानां विशुद्ध्यति ॥७४॥ श्रीनारायण को निवेदित या अर्पण न किया गया अवैष्णवजन का अन्न खा लेने पर वैष्णवों के पादोदक को पीकर प्रायश्चित करने पर शुद्धि हो जाती है॥७४॥ सर्वपातकसम्प्राप्तौ श्रियं वा गुरुमेव वा । समभ्यर्च्य विधानेन तच्छेषं प्राश्य शुद्ध्यति ॥७५॥ सभी प्रकार के पातकों के किये जाने पर शान्ति के कारणीभूत अन्य पातकादि के होने पर श्री लक्ष्मी, पृथ्वी तथा अपने आचार्य का विधि पूर्वक अर्चन कर उनको अर्पित अन्नाद्रि का शेष भाग प्रसादरूप में प्राशन करने से (श्रीशान्ति एवं भूशान्ति को ऐसे कारणों के होने पर करने से) शुद्धि हो जाती है॥७५॥ देवतान्तरशेषन्तु भुक्त्वा स्पृष्ट्वापि वा पुनः । वैष्वकसेनीं क्रियां कृत्वा तच्छेषं प्राश्य शुद्ध्यति ॥७६॥ (यदि) अन्य देवता के प्रसाद रूप शेषान्न को स्पर्श करने या उसे भक्षण करने का कार्य हो गया हो वैष्वकसेनी शान्तिकर्म को कर उसका शेष प्रसाद का प्राशन करने से शुद्धि हो जाती है॥७६॥ पीत्वाऽनैकान्तिनां सोमं सह पङ्क्तौ प्रभुज्य च । कृतञ्च तेन भुक्त्वाऽन्नं वैयूहीं प्राप्य शुद्ध्यति ॥७७॥ अवैष्णव यज्ञों में ऋत्विक् बन कर पंक्ति के साथ बैठकर सोम का पान करने और उन वैदिक ब्राह्मणों के साथ भोजन करने पर अथवा उन (अवैष्णव) ब्राह्मणों के