नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 123, कुल 176 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित १२१ द्वारा पक्व अन्नादि भोजन को ग्रहण करने पर वैयूह ही शान्तिकर्म कर शेषान्न ग्रहण करने से शुद्धि हो जाती है॥७७॥ विप्रानैकान्तिनः प्राज्ञानृत्विजः शान्तिकर्मसु । गो-भू-धान्यहिरण्याद्यैः प्रभूतैः परितोषयेत् ॥७८॥ प्राज्ञ तथा एकान्तिक वैष्णव ब्राह्मणों को शान्तिकर्म में आमंत्रित करे तथा शान्तिकर्म के पूर्ण करवाने के पश्चात् उन्हें गोप्रदान, धान्य तथा हिरण्य आदि प्रभूत मात्रा में देकर संतुष्ट करना चाहिए॥७८॥ अन्ते चैषां प्रकुर्वीत सर्वेषां शान्तिकर्मणाम् । नारायणस्य परमां प्रपत्तिं सर्वपूरणीम् ॥७९॥ इस प्रकार पूर्व में कथित सभी शान्तिकर्मों की समाप्ति कर सभी न्यूनाधिक कर्मों की पूरक तथा समृद्धिकारक श्रीनारायण की प्रपत्ति को सम्पन्न करना चाहिए॥७२॥ शान्तिं पुण्येषु देशेषु स्वक्षेत्रे स्वगृहेऽपि वा । कुर्यात् पुण्येषु कालेषु स्वजन्मादिषु वा पुनः ॥८०॥ ये शान्तिकर्म पुण्य तीर्थ तथा प्रदेशों में, अपने तीर्थ या क्षेत्रों में, अपने निवास पर, किसी पुण्य काल, पुण्यकारी मुहूर्त में तथा अपने जनमनक्षत्र अथवा जन्मदिवसादि के समय भी करना चाहिए॥८०॥ ध्यायन्नाधारशक्त्यादिपारिषद्यान्तदेवताः । नामभिर्वरयेद् विद्वान् परमायां विपश्चितः ॥८१॥ परमा शान्ति कर्म के अवसर पर विद्वान् आचार्य के द्वारा आधार-शक्ति से आरम्भ कर पारिषद्-देवता तक के देवगणों का ध्यान करते हुए उनके नामादि को बतलाते हुए उनकां वरणादि करना चाहिए॥८१॥ आसनेषु यथाकाममुपवेश्य यथाक्रमम् । पाद्यमर्घ्यं तथा भोगान् दद्यात् तेभ्यश्च मन्त्रतः ॥८२॥ स्नातेभ्यश्च यथाकामं वस्त्रभूषानुलेपनम् । माल्यानि धूपदीपौ च दद्याद् भक्त्या धनानि च ॥८३॥ अष्टोत्तरशतावृत्त्या जपं होमञ्च कारयेत् । स्थण्डिले तत्तदर्चाञ्च सर्वं कुर्वीत् वा स्वयम् ॥८४॥ आधारशक्ति आदि स्थानों पर वरण किये गये ब्राह्मणों के द्वारा उन उन मन्त्रों की एक सौ आठ बार आवृत्ति से होम करवाया जाता है। आधारशक्ति आदि के स्थण्डिल पर उन सभी की अर्चा का कार्य भी स्वयं अथवा ब्राह्मणादि से करवाना