नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता चाहिए। (यह सभी जप तथा होमादि कार्य यजमान शिष्य स्वयं भी कर सकता है)॥८२-८४॥ सर्वत्राग्निमुखस्यान्ते समिदन्नघृताहुतीः । भोजयित्वा द्विजवरान् समभ्यर्च्य विसर्जयेत् ॥८५॥ अष्टोत्तर शत आवृत्ति को देते हुए किया जानेवाला होम अग्निस्थापन के बाद अग्निमुख होने पर समिधा, अन्न, घृतादि की आहुति प्रदान कर करते हैं (अर्थात् अष्टोत्तरशत संख्या में समिधायें, अन्न तथा घृत की आहुतियां प्रदान करते हैं।) होम की समाप्ति पर उत्तम ब्राह्मणों को भोजन करवाकर तथा उनकी यथोत्साह अर्चना कर उन्हें प्रस्थान करवाए। ८५॥ चतुरो वासुदेवादीन् वैयूह्यां वरयेद् द्विजान् । मूर्त्याख्यायां द्वादशैव केशवादीननुक्रमात् ॥८६॥ वैयूही शान्तिकर्म में वासुदेवादि चार व्यूह देवों के नाम पर चार ब्राह्मणों का वरण करना चाहिए। मूर्तिनामक शान्ति कर्म में केशवादि क्रम के बारह ब्राह्मणों का वरण करे॥८६॥ मत्स्यं कूर्मं वराहञ्च नृसिंहं वामनं तथा । वैभव्यां वरयेद् विप्रान् यथेच्छमितरानपि ॥८७॥ वैभवी शान्तिकर्म में मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह तथा वामन नामक पांच ब्राह्मणों का वरण करे तथा इच्छानुसार अन्य वरण कर इसे परशुरामादि दस संख्या तक किया जा सकता है॥८७॥ आनन्त्याञ्चतुरोऽनन्तशेषनागेन्द्रभूधरान् । गारुडयाङ्गरुडं तार्क्ष्यं वैनतेयं पतत्पतिम् ॥८८॥ आनन्ती शान्तिकर्म में अनन्त, शेष, नागेन्द्र तथा भूधर नामक चार (संख्या में) ब्राह्मणों का वरण करे तथा गारुडी शांतिकर्ममें तार्क्ष्य, वैनतेय तथा पतत्पति नामक तीन ब्राह्मणों का वरण करें॥८८॥ गजाननाद्यैः सहितं विष्वक्सेनं तदर्चने । सौदर्शिन्यां शङ्खगदाशार्ङ्गखड्गैः सुदर्शनम् ॥८९॥ विष्वक्सेनी शान्तिकर्म में गजानन आदि (गजानन, जयत्सेन, हरिवक्त्र, काल, प्रकृति, संज्ञादि) पार्षद सहित विष्वक्सेन का वरण करे तथा सौदर्शिनी शान्तिकर्म में शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग के साथ सुदर्शन नाम से वरण करना चाहिए॥८९॥