नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित १२३ ऋद्ध्या समृद्ध्या कीर्त्या च श्रीशान्त्यां वरयेच्छ्रियम् । क्षमां प्रतिष्ठां बहुलां भुवञ्चाथ भुवोऽर्चने ॥९०॥ श्री शान्तिकर्म में ऋद्धि, समृद्धि तथा कीर्ति के सहित श्री लक्ष्मी देवी का वरण तथा भूशान्ति के कर्म में क्षमा, प्रतिष्ठा तथा बहुला के साथ श्रीपृथ्वी देवी का वरण किया जावे॥९०॥ गुरुँस्तदर्च्यान् विप्रान् वा विधिनाभ्यर्च्य शक्तितः । यद्दद्यात् सा परां शान्तिः सर्वपातकनाशिनी ॥९१॥ अपने गुरुभूत, आचार्य, उनके द्वारा मान्य विद्वान् ब्राह्मणों की विधिपूर्वक अर्चना करते हुए उन्हें जो भी दक्षिणादि प्रदान की जाती है वह सभी पातकों का विनाश कर परमशान्तिकर्म (विशिष्ट रूप में) मानी गयी है॥९१॥ प्रधानं स्थण्डिलं मध्ये महावेद्यां प्रकल्पयेत् । प्रत्यङ्मुख प्राङ्मुखः सन् सर्वञ्च परिकल्पयेत् ॥९२॥ महावेदी पर प्रधान स्थण्डिल सदा पश्चिमाभिमुखी बनाया जावे तथा अन्य सभी पूर्व-मुख के रहने चाहिए॥९२॥ इत्येवं शान्तयः प्रोक्ताः संस्काराश्च द्विजन्मनाम् । यथार्हमितरेषाञ्च योजनीयः क्रियाविधिः ॥९३॥ इस प्रकार मैंने द्विजों के लिये किये जाने वाले संस्कारों तथा शान्ति कर्मों का कथन किया। इनकी योजना योग्यतानुसार इनमें तथा इसी प्रकार अन्य जन में रखी जाए तथा अनुष्ठानादि की विधि भी तदनुरूप रहे॥९३॥ इति संस्कारसम्पन्नः सम्प्राप्य गुरुवश्यताम् । आराधनं हरेरेव कुर्वाणः कर्म चोदितम् ॥९४॥ इस प्रकार बतलाये गये विधान से सभी संस्कारों से सम्पन्न होकर तथा अपने आचार्य की आज्ञा में स्थित रहते हुए उनका सान्निध्य प्राप्त करते हुए श्रीनारायण का ही समाराधन रूप विहित कर्मों का पालन करना चाहिए॥९४॥ तदप्रीतिकराण्याशु प्रतिषिद्धानि वर्जयेत् । पश्यन् सदागमैः स्वेशफलोपायविरोधिनः ॥९५॥ तथा कुदृष्टिकृपणशास्त्राणि परिवर्जयेत् । भक्त्या परमया नित्यमर्चयेत् पुरुषोत्तमम् ॥९६॥ कुदृष्टिकल्पितान् देवान् कामजाँश्च विवर्जयेत् ॥९७॥ ऐसे कर्म जो श्रीहरि के चित्त को कलुषित करते हों तथा जो प्रतिषिद्ध कर्म हों तो ऐसे कर्मों का आचरण नहीं करना चाहिए। आगमादि वैष्णवशास्त्रों के द्वारा अपने