नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता इष्ट तथा फल की प्राप्ति के प्रतिकूल एवं अशुद्ध दृष्टि से परिकल्पित शास्त्रों का भी परित्याग करना उचित है। अतएव परमश्रद्धा भक्ति से नित्य ही श्रीपुरुषोत्तम विष्णु की अर्चना करे तथा दृष्टिको या पुरुषोत्तम से भिन्न देवगण की उपासना को वर्जित करे तथा विशेष कर काम्य कर्मों की ओर अभिमुख न हो॥९५-९७॥ धृतोर्ध्वपुण्ड्रश्चक्राद्यैरङ्कितो हरिलाञ्छनैः । मुद्रापुण्ड्राङ्कनादीनि तामसानि विवर्जयेत् ॥९८॥ वह स्वयं ऊर्ध्वपुण्ड्र को तथा श्रीहरि के चक्रादि आयुधों से अंकित शरीर का रहता है। अतः तामस गुणवाले शास्त्रों में परिकल्पित मुद्रादि तथा अन्य देवता के पुण्ड्रादि का धारण करना भी छोड़ दे। (जो कि लक्ष्यविरुद्ध आचरण के हों)॥९८॥ आचार्यप्रमुखांन्नित्यं विशेषेण प्रसादयेत् । प्रच्युतान् प्राकृतांश्चैव सर्वत्र परिवर्जयेत् ॥९९॥ वह अपने आचार्य आदि प्रमुख वैष्णव जन को विशेष रूप से प्रसन्न रखता रहे तथा वृत्ति को छोड़ने या उपेक्षा करनेवाले और अन्य प्राकृतजन की सदा ही उपेक्षा करे तथा उनकी संगति में न रहे॥९९॥ आतिष्ठेत् पारमैकान्त्यमपायानपमार्जयन् । अपायवद्धिहैकान्त्यमशुद्धकरणान्वयात् । निरापाय भवेत् प्राप्यं तद्विष्णोः परमं पदम् ॥१००॥ इति श्रीनारदपञ्चरात्रे भारद्वाजसंहितायाः परिशिष्टे द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ अपने उपायुक्त दोषों का परिमार्जित करते हुए पारमैकान्त्य भाव में स्थित रहे क्योंकि अशुद्ध कर्मादि के आचरण से तथा उनसे सम्बन्ध रखने से अपाय के समान दोषवता आ जाती है। अतएव सदा अपायों से रहित होकर यदि रहेगा तो यही कर्म श्रीनारायण के परमपद को प्राप्त स्थिति निर्माण करेगा॥१००॥ नारदपंचरात्र की भारद्वाजसंहिता के परिशिष्ट भाग की तत्त्वप्रकाशिकाहिन्दीव्याख्या का द्वितीय अध्याय समाप्त