भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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पृष्ठ 127

हिन्दीटीकासहित १२५ परिशिष्टे तृतीय अध्याय भूयः स्फुटतरं वक्ष्ये शृणुध्वं मुनिसत्तमाः । सनातनीं सतां वृत्तिं परेषां लक्षणानि च ॥१॥ हे मुनियो! अब मैं पुनः आपको अविच्छिन्न सम्प्रदाय वाली सनातनभूत सन्तों की वृत्ति तथा असन्तों के लक्षणों को बतलाता हूं॥१॥ सर्वभूतान्तरात्मानमीशमाराध्यमच्युतम् । बुद्ध्वा चरन्ति सुधियो धर्मांस्तत्प्रीतये परम् ॥२॥ जो सन्त या ज्ञानीजन हैं वे सभी जीवों के अन्तराल में स्थित रहनेवाले तथा उन सभी के स्वामी श्रीनारायण की आराधना को जानकर उनकी प्रीति के सम्पादनार्थ केवल स्वधर्मादि का आचरण करते हैं॥२॥ व्यामुग्धमतयः केचित् क्षुद्राः नानाफलार्थिनः । तमेव हि यजन्त्यन्ये तथान्या अपि देवताः ॥३॥ अज्ञभाववाले (कुछ) अनेक (दृष्ट तथा आनुश्रविक) फलों की आकांक्षा करने वाले होकर कुछ व्यक्तियों के अन्य देवताओं का भजन करने पर भी उनमें सभी में स्थित अच्युत का ही अर्चन करते हैं। (इसी प्रकार अन्य देवता का भजन भी अन्तःस्थित अच्युत भाव से करने से वे भी सन्त हैं।)॥३॥ कल्पिताः कर्मबन्धेन विष्णुमायाविमोहिताः । अपि देवा न जानन्ति स्वात्मानं किमुतापरे ॥४॥ अपने संस्कार तथा कर्मों के बन्धन से कल्पित और श्रीविष्णु की माया से मोह प्राप्त रहने के कारण जब देवगण की आत्मा के अन्तस्थ श्रीविष्णु का सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त करने में असमर्थ हो तो फिर मनुष्य आदि अन्यों को यह तत्व कैसे जानने में आ सकता है॥४॥ वदन्ति धर्मान् व्यामिश्रान् वेदाः स्कन्धमयाः किल । श्रुतिर्मोक्षमयी प्राह शुद्धं मोक्षैकलक्षणम् ॥५॥