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नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

हिन्दीटीकासहित १२३ ऋद्ध्या समृद्ध्या कीर्त्या च श्रीशान्त्यां वरयेच्छ्रियम् । क्षमां प्रतिष्ठां बहुलां भुवञ्चाथ भुवोऽर्चने ॥९०॥ श्री शान्तिकर्म में ऋद्धि, समृद्धि तथा कीर्ति के सहित श्री लक्ष्मी देवी का वरण तथा भूशान्ति के कर्म में क्षमा, प्रतिष्ठा तथा बहुला के साथ श्रीपृथ्वी देवी का वरण किया जावे॥९०॥ गुरुँस्तदर्च्यान् विप्रान् वा विधिनाभ्यर्च्य शक्तितः । यद्दद्यात् सा परां शान्तिः सर्वपातकनाशिनी ॥९१॥ अपने गुरुभूत, आचार्य, उनके द्वारा मान्य विद्वान् ब्राह्मणों की विधिपूर्वक अर्चना करते हुए उन्हें जो भी दक्षिणादि प्रदान की जाती है वह सभी पातकों का विनाश कर परमशान्तिकर्म (विशिष्ट रूप में) मानी गयी है॥९१॥ प्रधानं स्थण्डिलं मध्ये महावेद्यां प्रकल्पयेत् । प्रत्यङ्मुख प्राङ्मुखः सन् सर्वञ्च परिकल्पयेत् ॥९२॥ महावेदी पर प्रधान स्थण्डिल सदा पश्चिमाभिमुखी बनाया जावे तथा अन्य सभी पूर्व-मुख के रहने चाहिए॥९२॥ इत्येवं शान्तयः प्रोक्ताः संस्काराश्च द्विजन्मनाम् । यथार्हमितरेषाञ्च योजनीयः क्रियाविधिः ॥९३॥ इस प्रकार मैंने द्विजों के लिये किये जाने वाले संस्कारों तथा शान्ति कर्मों का कथन किया। इनकी योजना योग्यतानुसार इनमें तथा इसी प्रकार अन्य जन में रखी जाए तथा अनुष्ठानादि की विधि भी तदनुरूप रहे॥९३॥ इति संस्कारसम्पन्नः सम्प्राप्य गुरुवश्यताम् । आराधनं हरेरेव कुर्वाणः कर्म चोदितम् ॥९४॥ इस प्रकार बतलाये गये विधान से सभी संस्कारों से सम्पन्न होकर तथा अपने आचार्य की आज्ञा में स्थित रहते हुए उनका सान्निध्य प्राप्त करते हुए श्रीनारायण का ही समाराधन रूप विहित कर्मों का पालन करना चाहिए॥९४॥ तदप्रीतिकराण्याशु प्रतिषिद्धानि वर्जयेत् । पश्यन् सदागमैः स्वेशफलोपायविरोधिनः ॥९५॥ तथा कुदृष्टिकृपणशास्त्राणि परिवर्जयेत् । भक्त्या परमया नित्यमर्चयेत् पुरुषोत्तमम् ॥९६॥ कुदृष्टिकल्पितान् देवान् कामजाँश्च विवर्जयेत् ॥९७॥ ऐसे कर्म जो श्रीहरि के चित्त को कलुषित करते हों तथा जो प्रतिषिद्ध कर्म हों तो ऐसे कर्मों का आचरण नहीं करना चाहिए। आगमादि वैष्णवशास्त्रों के द्वारा अपने

१२४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता इष्ट तथा फल की प्राप्ति के प्रतिकूल एवं अशुद्ध दृष्टि से परिकल्पित शास्त्रों का भी परित्याग करना उचित है। अतएव परमश्रद्धा भक्ति से नित्य ही श्रीपुरुषोत्तम विष्णु की अर्चना करे तथा दृष्टिको या पुरुषोत्तम से भिन्न देवगण की उपासना को वर्जित करे तथा विशेष कर काम्य कर्मों की ओर अभिमुख न हो॥९५-९७॥ धृतोर्ध्वपुण्ड्रश्चक्राद्यैरङ्कितो हरिलाञ्छनैः । मुद्रापुण्ड्राङ्कनादीनि तामसानि विवर्जयेत् ॥९८॥ वह स्वयं ऊर्ध्वपुण्ड्र को तथा श्रीहरि के चक्रादि आयुधों से अंकित शरीर का रहता है। अतः तामस गुणवाले शास्त्रों में परिकल्पित मुद्रादि तथा अन्य देवता के पुण्ड्रादि का धारण करना भी छोड़ दे। (जो कि लक्ष्यविरुद्ध आचरण के हों)॥९८॥ आचार्यप्रमुखांन्नित्यं विशेषेण प्रसादयेत् । प्रच्युतान् प्राकृतांश्चैव सर्वत्र परिवर्जयेत् ॥९९॥ वह अपने आचार्य आदि प्रमुख वैष्णव जन को विशेष रूप से प्रसन्न रखता रहे तथा वृत्ति को छोड़ने या उपेक्षा करनेवाले और अन्य प्राकृतजन की सदा ही उपेक्षा करे तथा उनकी संगति में न रहे॥९९॥ आतिष्ठेत् पारमैकान्त्यमपायानपमार्जयन् । अपायवद्धिहैकान्त्यमशुद्धकरणान्वयात् । निरापाय भवेत् प्राप्यं तद्विष्णोः परमं पदम् ॥१००॥ इति श्रीनारदपञ्चरात्रे भारद्वाजसंहितायाः परिशिष्टे द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ अपने उपायुक्त दोषों का परिमार्जित करते हुए पारमैकान्त्य भाव में स्थित रहे क्योंकि अशुद्ध कर्मादि के आचरण से तथा उनसे सम्बन्ध रखने से अपाय के समान दोषवता आ जाती है। अतएव सदा अपायों से रहित होकर यदि रहेगा तो यही कर्म श्रीनारायण के परमपद को प्राप्त स्थिति निर्माण करेगा॥१००॥ नारदपंचरात्र की भारद्वाजसंहिता के परिशिष्ट भाग की तत्त्वप्रकाशिकाहिन्दीव्याख्या का द्वितीय अध्याय समाप्त

हिन्दीटीकासहित १२५ परिशिष्टे तृतीय अध्याय भूयः स्फुटतरं वक्ष्ये शृणुध्वं मुनिसत्तमाः । सनातनीं सतां वृत्तिं परेषां लक्षणानि च ॥१॥ हे मुनियो! अब मैं पुनः आपको अविच्छिन्न सम्प्रदाय वाली सनातनभूत सन्तों की वृत्ति तथा असन्तों के लक्षणों को बतलाता हूं॥१॥ सर्वभूतान्तरात्मानमीशमाराध्यमच्युतम् । बुद्ध्वा चरन्ति सुधियो धर्मांस्तत्प्रीतये परम् ॥२॥ जो सन्त या ज्ञानीजन हैं वे सभी जीवों के अन्तराल में स्थित रहनेवाले तथा उन सभी के स्वामी श्रीनारायण की आराधना को जानकर उनकी प्रीति के सम्पादनार्थ केवल स्वधर्मादि का आचरण करते हैं॥२॥ व्यामुग्धमतयः केचित् क्षुद्राः नानाफलार्थिनः । तमेव हि यजन्त्यन्ये तथान्या अपि देवताः ॥३॥ अज्ञभाववाले (कुछ) अनेक (दृष्ट तथा आनुश्रविक) फलों की आकांक्षा करने वाले होकर कुछ व्यक्तियों के अन्य देवताओं का भजन करने पर भी उनमें सभी में स्थित अच्युत का ही अर्चन करते हैं। (इसी प्रकार अन्य देवता का भजन भी अन्तःस्थित अच्युत भाव से करने से वे भी सन्त हैं।)॥३॥ कल्पिताः कर्मबन्धेन विष्णुमायाविमोहिताः । अपि देवा न जानन्ति स्वात्मानं किमुतापरे ॥४॥ अपने संस्कार तथा कर्मों के बन्धन से कल्पित और श्रीविष्णु की माया से मोह प्राप्त रहने के कारण जब देवगण की आत्मा के अन्तस्थ श्रीविष्णु का सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त करने में असमर्थ हो तो फिर मनुष्य आदि अन्यों को यह तत्व कैसे जानने में आ सकता है॥४॥ वदन्ति धर्मान् व्यामिश्रान् वेदाः स्कन्धमयाः किल । श्रुतिर्मोक्षमयी प्राह शुद्धं मोक्षैकलक्षणम् ॥५॥

१२६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अनुवाकादि स्कन्ध तथा उपनिषदात्मक वेद भी देवतान्तर्यामिभूत आराधना वाले मिश्रित (धर्मों का) काम्य धर्मों का कथन करते हैं तथा मोक्षमयी (मोक्षपुण्य) श्रुति मोक्षप्रयोजन रूप धर्म को ही शुद्ध (भी) कहती है॥५॥ प्रायेण धर्मान् व्यामिश्रानूचुर्मन्वत्रिपूर्वकाः । शुद्धाँस्तु वयमन्ये च पञ्चरात्रपथानुगाः ॥६॥ मनु तथा अत्रि जैसे शास्त्र एवं धर्मवेत्ता तथा पुरातन स्मृतिकारों ने प्राय इसी प्रकार के वेदानुगत व्यामिश्र धर्मों के प्रतिपादन करते हुए धर्मविषयक बातें बतलाई हैं। पांचरात्र आगम के अनुगत धर्म के अनुगामी हम तथा हमारे जैसे अन्य अनुगत विद्वानों ने शुद्ध धर्म का प्रतिपादन कर धर्मतत्व को बतलाया॥६॥ व्यामिश्रः पञ्चरात्रेऽपि धर्मः क्वाप्यनुकृष्यते । तत्र चागमसिद्धान्ते शुद्ध एवोपदिष्यते ॥७॥ पंचरात्र आगम में भी कहीं कहीं व्यामिश्र धर्म का अनुकर्षण कर धर्म का आगमानुमत प्रतिपादन किया है पर सिद्धान्तरूप में इस आगम में शुद्ध धर्म का उपदेश ही रखा गया है॥७॥ हरेः शुद्धतनोः शुद्धं व्यामिश्रं कल्पितात्मनः । अशुद्धं कल्पितानान्तु केवलं यजनादिकम् ॥८॥ इनमें रज तथा तमोगुण से कल्पित शरीरों से भिन्न देवताओं के अन्तः स्थित अन्तर्यामीभाववाले सत्वमय शुद्धशरीर श्रीहरि के आराधनात्मक धर्म को शुद्ध, रज तथा तम गुणों से कल्पित इंद्राग्निदेवगणों को अन्तर्यामिभूत हरि से व्यामिश्र, केवल यजनादि कर्म हेतु शुद्ध तथा रज आदि गुणों से कल्पित अन्य देवता का मात्र यजनादि आराधन अशुद्ध होता है॥८॥ ते ह्यशुद्धतमाः सर्वे तमोनिष्ठतया स्मृताः । श्रीकण्ठप्रमुखैरुक्ता ये धर्माः कामकामिनाम् ॥९॥ श्रीकण्ठ आदि के द्वारा तामस तन्त्रादि में प्रसिद्ध तम गुणों से कल्पित यजनादि कर्म होने के कारण ऐसे धर्म अशुद्धतम माने गये हैं जिनमें किसी विशिष्ट कामना को लेकर अनुष्ठानादि विहित हों (तथा वेदबाह्य होने से कुदृष्टि निर्माण करती हैं अतः ये निष्फल भी हैं)॥९॥ त्रैविद्यानां सदा मिश्राः प्रायेण विहिताः क्रियाः । ज्ञानं भक्तिश्च वैराग्यं सर्वं शुद्धमुदाहृतम् ॥१०॥ त्रैविद्य वेदनिष्ठ प्रायुर्चेण मिश्ररूप की क्रियाएं करते हैं तथा विहित भी हैं परंतु जो ज्ञान, भक्ति और वैराग्य के अनुगत क्रियादि हैं वे 'शुद्ध' होती हैं क्योंकि

हिन्दीटीकासहित १२७ इनमें परमैकान्तभाव से अन्तर्यामी रूप का आराधन कर्म होता है॥१०॥ न्यासनिर्धूतपाप्मानः प्रियैः प्रियतमैरपि । मिश्रैः शुद्धैश्च नियमैर्विष्णुमाराधयन्ति ये ॥११॥ प्रपत्तिरूप बल के परिग्रह से न्यासयोग के द्वारा जिसने अपने समस्त पातकों को समाप्त कर दिया वे त्रैविद्य जन भी क्रमशः प्रिय, प्रियतम तथा मिश्र और शुद्ध कर्मोंवाले नियमों से श्रीहरि की आराधना करते हैं॥११॥ निन्दितक्रियया हानाद्धिहीनानाञ्च कुप्यति । ऐच्छैरपि पुनः शुद्धैः परं तुष्यति माधवः ॥१२॥ विहित कर्मों के परित्याग करने से तथा निषिद्ध कर्मों के आचरण करने से श्रीनारायण अप्रसन्न होते हैं परंतु किसी इच्छा के अधीन किये जाने वाले अनुष्ठानादि शुद्ध कर्मों से श्रीनारायण संतुष्ट होते हैं॥१२॥ विशुद्धपरिवारस्य नित्यं शुद्धा हरेः क्रिया । तयैव शुद्धकर्मेति त्रैविद्योऽपि न गद्यते ॥१३॥ रजस्तमः गुणों से अस्पष्टः विशुद्ध सात्विक गुणों से परिवृत श्रीहरि की आराधना क्रिया भी शुद्ध रूपवाली होती है तथा इसी प्रकार नित्यार्चनात्मक क्रिया के द्वारा त्रैविद्य व्यामिश्र धर्म का अनुष्ठान करनेवाला भी शुद्ध कर्म का अनुष्ठाता माना जाता है॥१३॥ शुद्धो मिश्रस्तथान्यो वा समर्पितभरो हि यः । सद्यः स वासुदेवस्य कैङ्कर्यानन्दमश्नुते ॥१४॥ तथा जो शुद्ध कर्म का व्यामिश्र कर्म तथा अन्य अशुद्ध कर्म के अनुष्ठान करने पर श्रीहरि की प्रपत्ति को न्यासयोग के द्वारा धारण करता हो तो शीघ्र ही वह श्रीनारायण के कैंकर्यभाव तथा मुक्ति के परमानन्द का सुख प्राप्त करता है॥१४॥ शुद्धादीनान्तु धर्माणामधिकारादियोगतः । क्रियते पुरुषादीनां व्यपदेशस्तथाविधः ॥१५॥ शुद्ध आदि धर्मों का अधिकारादि के योग के आधार पर पुरुषों का उनके उपयुक्त आचारों के पौर्वापर्य तथा गुणावगुण के परामर्श को विचार कर इस प्रकार शुद्धधर्माधिकारी आदि के रूप में व्यवहार रखा गया है॥१५॥ एकायने ह्यधिकृताः सर्वे यान्त्यञ्जसा हरिम् । ये च नानापथेऽन्यत्र प्रतिबुद्धास्तु केचन ॥१६॥ अतएव जो मूलवेदों के अधिकृत ब्राह्मणादि वर्ण हैं वे सभी अविलम्ब श्रीहरि को

१२८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता प्राप्त करने के अधिकारी (भी) हैं परन्तु जो त्रैविद्य के अनुसार विभिन्न पदों से त्रिवर्गमात्र की साधना में लग्न हैं उनमें कुछ ही अपवर्ग तथा उसके उपायों के साधनों के अनुष्ठान करने में सक्रिय होकर जागृत रहते हैं। क्योंकि वे अपवर्ग तथा उसके उपाय का ज्ञान रखने से श्रीहरि को प्राप्त कर लेते हैं)॥१६॥ एकायना व्रजन्तोऽपि त्रैविद्या वा स्ववर्त्मना । स्खलतो दृष्टिवैषम्याच्च्यवन्त्यैकान्त्यतो हरेः ॥१७॥ और ऐसे एकान्ती वैष्णव त्रैविद्य का ज्ञान रखने के कारण तथा उनके अनुगत स्वयं रहते हुए भी दृष्टिगत विषमता को (साथ में) रखने के कारण विपरीत ज्ञान (के सहानुगम) से श्रीहरि के एकान्तभाव से स्खलित हो जाते हैं तथा अन्त में उनको इष्ट प्राप्ति नहीं हो पाती है॥१७॥ यायाच्छुद्धेन मार्गेण मिश्रेष्वन्यतमेन वा । परं भगवदैकान्त्यं पूर्वैराचरितेन वा ॥१८॥ अतएव शुद्ध कर्म के मार्ग का अनुगमन करना उचित है अथवा मिश्र या इनमें से किसी एक का अनुगमन करे जो अपने परम्परा में पूर्वजों के द्वारा चली आ रही हो तथा वे ऐसे मार्ग से श्रीनारायण के परम एकान्त्य को प्राप्त करें॥१८॥ यथैवाश्रमिणः पूर्वे व्रजन्त्युत्तममाश्रमम् । तथैव शुद्धं त्रैविद्यामिश्रं नैकायनाः पुनः ॥१९॥ जैसे पूर्व के ब्रह्मचर्य आदि आश्रम गृहस्थाश्रम जैसे उत्तम आश्रम की पगतावस्था प्राप्त कर लेते हैं, इसी प्रकार त्रैविद्य व्यामिश्र कर्मानुष्ठानों से एकायनभाव प्राप्त करते हैं पर शुद्धकर्म मिश्रभाव को प्राप्त नहीं करते॥१९॥ ऐच्छञ्च नियतञ्चैव नित्यनैमित्तिकं तथा । काम्यञ्च विविधं सर्वं शुद्धशुद्धोभयात्मकम् ॥२०॥ ऐसे कर्म श्रीनारायण का इष्ट सम्पाद रूप जो 'ऐच्छ' दीपारोपण मालाकरणादिरूप नियत रूपवाले हैं जो सन्ध्योपासनादि 'नित्य' हैं, जो एकादशी आदि उपवासानुष्ठान के कारण 'नियत' हैं किसी सूर्यचन्द्रग्रहणादि के कारण 'नैमित्तिक' हैं जो किन्हीं अपेक्षित कामनाओं के कारण अनुष्ठित कारीरादि यजनात्मक 'काम्य' हैं। ये सभी शुद्ध तथा अशुद्ध अथवा उभयात्मकरूप वाले कर्मों में आते हैं। (जिनमें एकायन का शुद्ध कर्म में विहित अनुष्ठान इष्ट है)॥२०॥ स्वतः सङ्कल्पतश्चापि कर्मणां भिद्यते गतिः । फलानामिह सर्वेषां प्रदाता स्वयमच्युतः ॥२१॥ विषयगत तथा फलकामना आदि के अनुष्ठानों के कारण स्वतः संकल्प के भेद हो

हिन्दीटीकासहित १२९ जाने से कर्मों की गति में भी भिन्नता आ जाती है। इस प्रकार होने पर भी सभी कर्म तथा फलों का प्रदाता तो स्वयं श्रीनारायण ही रहते हैं (अतएव किसी भी अन्य देवता के आराधन करने पर भी उनके फलदाता भी अच्युत ही हो जाते हैं)॥२१॥ यथा कामफला यज्ञाः सृष्टा भगवता स्वयम् । त एव विदुषां तर्हि निर्वाणाय निराशिषाम् ॥२२॥ क्योंकि श्रीभगवन्नारायण ने ही स्वयं जिस प्रकार स्वर्गादि कामनाओं के प्रदाता यज्ञादि की सृष्टि की थी वे ही तथारूपवाले कामनाओं के प्रदाता यज्ञादि जब बिना किसी कामना या कर्मफल के अनुष्ठित किये जाएं तो ज्ञानी जन के लिये मोक्ष प्रदाता भी हो जाते हैं॥२२॥ अबुद्धा परमात्मानं हरिमन्या हि देवताः । ये यजन्ति निरस्ताशास्तेषां ज्ञानाय तच्छनैः ॥२३॥ केवल श्रीहरि को न लक्ष्यकर (बिना ज्ञान से देखे) वैदिकादि अनुष्ठानों के अनुरोध पर अन्य अग्नि, इन्द्रादि देवगणों का यज्ञों में यजन करनेवाले किन्तु फल की इच्छा न रखनेवाले विद्वानों को यह यजन आगे चलकर शनैः शनैः (भगवन्नारायणविषयक) ज्ञान तथा भक्ति और उसी के बाद प्राप्य मोक्ष को भी प्रदान कर देते ज्ञान तथा भक्ति और उसी के बाद प्राप्य मोक्ष को प्रदान कर देता है)॥२३॥ बुद्ध्वापि परमात्मानं पारमैकान्त्यवर्जिताः । इष्ट्वापि परमैर्यज्ञैः स्थानं यान्ति न शाश्वतम् ॥२४॥ अन्तर्यामीभूत श्रीनारायण की ज्ञान की स्थिति रखकर भी जो एकान्त भाव से रहित होकर उत्तम प्रकारों वाले वेदादि से अनुमत विविध यज्ञादि से यजन करने पर भी ऐसे विद्वान् परमपद की प्राप्ति (परमैकान्त्यभाव के न रहने से) नहीं प्राप्त करते हैं॥२४॥ व्यामिश्रांश्चापि शुद्धांश्च तत्तत्कालविभागवित् । यथान्यायं प्रयुञ्जीत धर्मानैकान्त्यनिष्ठतः ॥२५॥ अतएव विद्वान् अवसरों के विभागों को देखकर जो ज्ञानपूर्वक यथाक्रम, यथाविभाग तथा यथाधिकार व्यामिश्र धर्म तथा शुद्ध कर्मों का एकान्त्यभाव में स्थित रहकर अनुष्ठान करें (जिससे उसे परमपद प्राप्ति में बाधा न रहे॥२५॥ बुद्ध्वापि परमात्मानमशुद्धं कर्म कामिनाम् । शुद्धं सर्वमकामानामेतद्धि परमं मतम् ॥२६॥

१३० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अतएव परमात्मा श्रीनारायण को तात्विकभाव से अन्तर्यामी मानकर भी कामनाओं के अनुरूप काम्य यज्ञादि यजन कर्मोंका अनुष्ठान करना भी अशुद्ध कर्म है तथा बिना कामना के काम्य यज्ञादि का यजन ही शुद्ध कर्म होता है तथा यही सिद्धान्तभूत मत या तत्व भी है॥२६॥ नानाफलक्रियायोगदेवताव्याकुलात्मभिः । दुर्ज्ञानं दुरवाप्यञ्च दास्यं विष्णोः परं पदम् ॥२७॥ इसलिये अनेक फलों, अनेक क्रियाओं के योग तथा देवताओं के कारण तथा अनेक उपायों से युक्त होने से व्याकुल रहकर त्रैविद्य यजनादि काम्य कर्मों के विस्तीर्ण रहने से जिनका पूर्णतः ज्ञान नहीं प्राप्त किया जा सकता है तथा जिनसे प्राप्य फलों की भी प्राप्ति बड़े आयास के बाद संभव होती है परन्तु इन सभी की अपेक्षा तो श्रीविष्णु की दास्यभक्ति द्वारा प्रपत्ति धारण करना या न्यासयोग का ग्रहण ही अधिक सरल है॥२७॥ यत्तु विश्वपतेर्विष्णोर्नित्यं दासत्वमात्मनः । तज्ज्ञानन्तत्क्रिया वा तत्प्रसादादेव सिद्ध्यति ॥२८॥ और इस प्रकार विश्व के अधिपति श्रीविष्णु को अर्पित अपना नित्य दास्यभाव का ज्ञान रखना रूप जो क्रिया है वही या उसी के प्रभाव से श्रीविष्णु के प्रपत्ति के प्रसाद से परमपद की प्राप्ति रूप सिद्धि भी मिल सकती है॥२८॥ प्रसादनानामीशस्य श्रेयसी शरणागतिः । तत्प्रधाना हि सिद्ध्यन्ति यथान्याः सकलाः क्रियाः ॥२९॥ परमेश्वर के प्रसादन के उपायों में उनकी शरणागतिरूप जो प्रपत्ति है वही श्रेयस्करी या सर्वोत्तम उपाय है, क्योंकि उसकी मुख्यता से अन्य उपायभूत सभी क्रियाएं अंगभाव में होकर सिद्ध हो जाती है (अतः शरणागति ही उत्तम क्रिया या उपाय है)॥२९॥ यश्चायमात्मनिक्षेपः क्रियते परमात्मनि । तेनैव हि भरन्यासस्तथा फलसमर्पणम् ॥३०॥ अतः जिस मन्त्र से परमेश्वर श्रीहरि में आत्मनिक्षेप किया जाए उसी मन्त्र से कार्यों का भर न्यास तथा उनके फल का समर्पण भी किया जाता है॥३०॥ यः शरण्यमशेषाणां प्राप्नोति शरणं हरिम् । स मुक्तः सर्वपापेभ्यः स्वकुलञ्च समुद्धरेत् ॥३१॥ और जो श्रीहरि सभी विश्व का शरण्य (रक्षक) है ऐसे श्रीहरि की जो शरणागति

प्राप्त कर लेता है वह सभी पातकों से मुक्त होकर अपने कुल का भी उद्धार करता है॥३१॥ न तथा विविधैर्दानैर्न तपोभिर्न चाध्वरैः । यथैव गुरुतां यान्ति नरा नारायणसंश्रयात् ॥३२॥ मनुष्यगण विविध दानादि के पुण्यकर्मों से तथा अपने कपटमय आचरण तथा त्रैविद्य वेदादि अनुष्ठानों वाले यज्ञों के यजन से इतना उत्कर्ष या महत्व प्राप्त नहीं कर पाते हैं जितना श्रीनारायण की शरणागति से प्राप्त कर लेते हैं॥३२॥ यथैव भगवान् विष्णुर्देवानां परमो गुरुः । तथैव हि मनुष्याणां वैष्णवः परमो गुरुः ॥३३॥ जैसे सभी देवगणों का परमगुरु तथा अत्यन्त वन्दनीय देव श्री श्रीनारायण होता है उसी प्रकार सभी मनुष्यों का वन्दनीय तथा सर्वश्रेष्ठ गुरु वैष्णव (भक्त) होता है॥३३॥ न परीक्ष्य वयो वन्द्या नारायणपरायणाः । अपि स्युर्हीनजन्मानो मान्या निघ्नेन चेतसा ॥३४॥ जो श्रीनारायण के शरणागत वैष्णवजन हैं उनकी आयु तथा अवस्थादि की परीक्षा करने के पश्चात् उनकी वन्दना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जो अपने अधीन विद्यमान वैष्णव तेज से सम्पन्न हैं वे हीनवर्ण में जन्म लेकर भी मान्य तथा वन्दनीय स्थितिवाले हो जाते हैं॥३४॥ समर्पितात्मनः श्रीशे सत्वयुक्तेन चेतसा । नापायोऽभिभवेत् सन्तं सद्यः प्रशमयेदपि ॥३५॥ ऐसे वैष्णवजन जितने श्रीविष्णु अच्युत के प्रति अपने सात्विक गुणवाले चित्त से आत्मा का भार न्यस्त कर दिया हो तो न्यासयोग से समृद्ध इनको उत्तमाधिकारता के प्राप्त रहने से कोई अन्याय या दोष की प्रवृत्ति या प्राप्ति नहीं होती तथा दैववश यदि किसी अपाय की प्राप्ति हो भी जाए तो वह शीघ्र दूर हो जाती हैं॥३५॥ प्रपन्नमपि यं कञ्चित् प्रसक्तं पापकर्मणि । चिरात् संयोज्य विनयैः परिगृह्णाति माधवः ॥३६॥ और ऐसे वैष्णवजन अपने किसी दुर्भाग्य के कारण पापकर्मों में लीन भी हो जाए तो उनको अपने निषिद्ध कर्मों के फलस्वरूप शरीर दण्ड देकर (या उन्हें लंगड़ा, कूबड़ा शरीरवाला व्याधियुक्त बनाकर) प्रकाशित करवाते हुए श्रीनारायण ही उसे उचित बुद्धि प्रदान कर अपने किकिरभाव में स्थित रखते हैं॥३६॥

१३२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता पूर्वेषामुत्तरेषाञ्च न्यासो नाशाय पाप्मनाम् । सर्वेषामपचाराणामयं हि क्षमापणं परम् ॥३७॥ न्यासयोग ग्रहण करने के पूर्व अनादिकाल से अर्जित पातकों का तथा न्यासग्रहण के पश्चात् किये गये प्रमादजन्य पातकों को तथा सभी प्रकार के उपचारों को हटाने के लिये यह न्यासयोग ही एक मात्र निवारक उपाय माना गया है॥३७॥ नारी वा पुरुषो वापि प्रपद्य शरणं हरिम् । तत्र चैकान्त्यवृत्त्यैव गच्छेतां भुवि भाव्यताम् ॥३८॥ सकृदेव कृतो न्यासो वृत्तिर्भवति शाश्वती । तथापि तन्मूलतया तस्यास्तादात्म्यमीरितम् ॥३९॥ कोई स्त्री अथवा पुरुष श्रीहरि की शरणागति लेते हुए तथा एकान्तिक वृत्ति रखकर अनन्यभाव से पृथ्वी पर अपना जीवन चलाते रहे। अतएव एक बार भी किया गया यह 'न्यास' जीवन पर्यन्त शाश्वत वृत्ति से चलाया जाएगा क्योंकि न्यास मूलकता होने से वृत्ति का न्यासरूप में तादात्म्य हो जाता है॥३८-३९॥ ईशे न्यस्तभराणां हि कर्तव्यं नास्ति किञ्चन । यद्यस्ति शुद्धमैच्छन्तत् सामान्यमिति यौक्तिकाः ॥४०॥ परमेश्वर के प्रति अपने को न्यासरूप में समर्पित करने के बाद कृतकृत्य हो जाने के कारण आगे कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता। यदि कोई है भी तो वह शुद्ध होकर भी कर्ता की इच्छा पर निर्भर है। वह नित्यभूत सन्ध्यादि कर्म होने से सामान्यरूपवाला है जिसके न करने से प्रत्यवाय होता है, ऐसा युक्तिवादी जन का मत है॥४०॥ दृप्ताः प्रपद्य लक्ष्मीशं चपला मुक्तमानिनः । प्राप्यान्तमपि देहस्य च्यवन्त्युज्झितवृत्तयः ॥४१॥ श्रीनारायण को प्राप्त करने के अहंकार से अभिभूत तथा इन्द्रियार्थों पर चंचलभाव से आसक्त रहनेवाले तथा अपने को मुक्त रूप में समझने वाले तथा ईश की एकान्तीवृत्ति का परित्याग करते हुए शरीर का अन्त प्राप्त करने पर भी वे अन्त में मुक्ति प्राप्ति से वंचित होते हैं॥४१॥ अथैतत् परमर्षीणां ज्ञेयं तत्वविदां मतम् । दास्यं हि शुद्धं मिश्रं वा व्यामिश्रं चोदितं पृथक् ॥४२॥ तथा परमऋषि नारदादि का यह मन्तव्य ध्यान में रखना आवश्यक है कि भगवान् श्रीहरि का दास्य के शुद्ध या व्यामिश्र रूप एक दूसरे से सदा पृथक् हैं जिनमें एकायन व्यक्तियों को शुद्ध तथा त्रैविद्यजन को व्यामिश्र दास्य मोक्षप्राप्ति पर्यन्त यथासम्बन्ध बराबर आचरण में रखना चाहिए॥४२॥

हिन्दीटीकासहित १३३ सामान्या च विभक्ता च वृत्तिः सर्वस्य देहिनः । दुस्त्यजां नियतामेवमिमां प्रत्यवधार्यताम् ॥४३॥ सभी शरीरधारी मानव की वृत्ति एक तो साधारण तथा दूसरी विभक्त रूप में मानी गयी है। जिनमें प्रथम तो देहसाधारणी तथा दूसरी वर्णाश्रमादि प्रतिनियता रूपवाली नियत रहती है जो दुरुपजा या कष्ट से हटनेवाली होती है यह बात भी ध्यान देकर समझना चाहिए॥४३॥ यथा यथा निषेवेत सतो वृद्धान्निरन्तरम् । तथा तथाऽस्य वै वृत्तिर्निरपाया हि वर्द्धते ॥४४॥ अतिशय एकान्तीजन भी सत्सेवा के भाव से जैसे जैसे अपने से वृद्ध तथा अनुभवी गुरुजन का सेवन करते हैं वैसे वैसे उनकी वृत्ति उपायों से रहित होकर अभिमत रूप में वृद्धि प्राप्त करती है॥४४॥ वीर्यं स्वकर्मधीर्दृष्टिस्तेजोऽङ्कः शक्तिरर्चनम् । बलं वैराग्यमैश्वर्यं सत्सङ्गः षड्गुणा हि सा ॥४५॥ इस सत्सेवा से वृत्ति में षड्गुणों का अभिवर्द्धन होता है-जैसे स्वकर्म के विहित आचार से वीर्य, ज्ञान की प्राप्ति से दृष्टि रूप वृद्धि, अंक या चिन्ह के धारण करने से तेज, अर्चना भक्ति, उससे प्राप्त शक्ति से वैराग्य, नित्य पदार्थों से हटना, रूप बल, इस प्रकार सत्सेवा छः गुणों वाली हो जाती है॥४५॥ सेव्योऽयं कर्महस्ताङ्घ्रिर्ज्ञानदृष्टिर्भजाननः । सत्सेवनशिरा धर्मो वैराग्यौजाः सुलक्षणः ॥४६॥ वृत्ति के आश्रित लक्षणादि से अनुगत षड्गुणरूप इस धर्म के कर्म से विहित आचार हाथ तथा पैर रूप वाले हैं, ज्ञान ही इसकी दृष्टिभूत नेत्र है, भक्ति ही इसका मुख स्थानीय है, सत्सेवा ही इसका मस्तक या शिरस्स्थानीय रूप है तथा नित्य वर्णन रूप वैराग्य ही इसका 'ओज' (बल) होता है॥४६॥ वन्दतोऽपि गुणान् विष्णोः कुर्वन्तोऽपि च तत्क्रियाः । मन्दपुण्या न विन्दन्ति पारमैकान्त्यसम्पदम् ॥४७॥ श्रीहरि का गुणगान करनेवाले होकर तथा उनके अनुगत अनुष्ठानादि सत्क्रियाओं का आचरण करनेवाले होने पर भी जिनके पुण्य अल्प होते हैं वे परम एकान्तभाव की प्राप्ति करने में अक्षम रहते हैं(अर्थात् पुण्यशाली वैष्णवजन ही परमैकान्त्यभाव की स्थिति में रह पाते हैं)॥४७॥ सम्भूय च कुले श्लाघ्ये सर्वान् वेदानधीत्य च । विधाय च महत्कर्म विष्णोर्दास्यं हि दुर्लभम् ॥४८॥

४. चतुर्थ परिच्छेद: ज्ञान-योग, वैकुण्ठ-प्राप्ति एवं उपसंहार

१३४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अतिविशिष्ट तथा प्रशंसनीय कुल में जन्म प्राप्त करने पर तथा सभी वेदों का विधिवत् साङ्ग अध्ययन कर लेने पर तथा दुष्कर यज्ञादि धर्मानुष्ठानों के पूर्णतः विधिवत् सम्पन्न कर लेने पर भी श्रीविष्णु की दास्यभाव की प्राप्ति हो जाना दुर्लभ है॥४८॥ सतां निषेवणं वापि जननं वा सतां कुले । विविक्तमथवा ज्ञानं विष्णोर्दास्यावलम्बनम् ॥४९॥ परन्तु सज्जन एवं सन्तजन का सेवन अथवा एकान्ती परमवैष्णवजन के कुल में जन्म प्राप्त कर असंशय रूप केवल श्रीविष्णु की दृष्टि या ज्ञान की प्राप्ति हो जाना श्रीहरि के दास्यभाव की प्राप्ति के साधनभूत आधार होते हैं॥४९॥ अस्वतन्त्राः सदा नार्यः स्थिता गुर्वादिशासने । वर्जयेयुर्विरुद्धानि यत्किञ्चिद्धर्मसंश्रयाः ॥५०॥ तूष्णीं-प्रायाः क्रियाः स्त्रीणां मन्त्रश्रावणबोधने । वाचनञ्च परेऽन्येऽपि धारणञ्चार्चने पुनः ॥५१॥ जो स्त्रियां है उनके अलग से या स्वतंत्र रूप में धर्माचरण के न होने के कारण वे अपने मन्त्रदाता आचार्य तथा पति पिता आदि के अनुशासन में रहकर विरुद्ध वर्जनादि के साथ अपने लिये उचित तथा विहित धर्म के अनुष्ठान को करते हुए वृत्ति की पूर्णता सम्पादित कर सकते हैं। इनके तापादि संस्कार अमन्त्रक तथा होमादि क्रिया के बिना किये जाते हैं,केवल इन्हें प्रदत्त मन्त्र को सुनाने तथा होमादि क्रिया के बिना किये जाते हैं। अन्य ऋषियों का मत है कि स्त्रियों को धर्मग्रन्थों का वाचन मन्त्र का धारण तथा इष्टदेव का अर्चन भी करना चाहिए जिसकी विधियां बतलाई जावें॥५०-५१॥ भर्तुरासनदानाद्यै स्नापनालङ्क्रियादिभिः । यथा चाभ्यवहाराद्यैः परिचर्या हरेस्तथा ॥५२॥ जिस प्रकार एक स्त्री अपने स्वामी की आसनदान, आदि तथा स्नान करवाने चन्दनादि चर्चा आदि से अलंक्रिया करती हुई सुश्रूषा करती है तथा भोजनादि के द्वारा उनकी सेवा करती है उसी प्रकार वह विश्वेश श्रीहरि की भी इसी प्रकार परिचर्या करे॥५२॥ यद्वा परमसंस्काराः प्राप्या गुणसमानतः । सर्वत्र हरिरेवाच्यो नाग्निकर्मेति केचन ॥५३॥ अथवा तापादि पूर्वोक्त परमसंस्कारों को गुण की समानता के गुरु लाघव का विचार करते हुए सम्पन्न करवाने चाहिए। इनमें सभी में सम्पन्न होने के अवसर पर श्रीहरि

हिन्दीटीकासहित १३५ की (चर्या तथा) अर्चना ही प्रथम मुख्य कर्म है तथा तापादि संस्कार और होमादि कर्म की विधिकर्म के अनुगत बाद में स्थिति रहती है ऐसा अन्य विद्वानों का यहां मत है।।५३।। परमैकान्तिनां नित्या या वृत्तिर्विहिता गुरौ । तदभावे तु तत्पुत्रे गुर्वर्चा दैवतेषु सा ॥५४॥ परमैकान्ती वैष्णव की अपने गुरु के विषय में रखी जानेवाली जो विहित वृत्ति है उनके अभाव में उसके पुत्र के द्वारा गुरु तथा देवादि अर्चा सम्पन्न करवाने में रहती ही है।।५४।। सर्वेषां याग एवायं सामान्यो मुनिभिः स्मृतः । अभ्येत्य प्रणिपत्याग्रे देवायात्मनिवेदनम् ॥५५॥ पुरातन मुनिजन ने प्रायः यह सभी के लिये सामान्यरूप में यज्ञ की तरह विधिरूप में दिखलाया है कि देवता के समक्ष उपस्थित होकर उसे प्रणाम कर आत्मनिवेदन करे। यह कार्य यजन या यज्ञ के आचरण के तुल्य है।।५५।। सर्वेषामुपचाराणामर्घ्यं परममुच्यते । कृतेनैकेन तेनैव सर्वमेव कृतं भवेत् ॥५६॥ और सभी पाद्यादि उपचारों में अर्घ्य अर्पण करना श्रेष्ठ माना गया है अतः इस एक के ही प्रस्तुत या अर्पित कर देने से सभी उपचार अर्पित माने गये हैं।।५६।। अर्च्योऽर्चायां हरिर्नित्यं तदभावे तु कुत्रचित् । पुष्पेणार्घ्येण हविषा नत्या स्तुत्यापि वा परम् ॥५७॥ श्रीहरि के शालिग्रामादि बिम्ब में अर्चना नित्य होना चाहिए जिसमें अर्घ्य प्रस्तुत हो तथा इसके अभाव में उनकी व्यापकता की दृष्टि से सूर्याग्नि में भी अर्चना हो सकती है. जिसे पुष्प, अर्घ्य, हवि, प्रदान, प्रणति तथा परम स्तुति आदि के द्वारा सम्पन्न किया जाता है।।५७।। शालग्रामशिलायान्तु पूजनं ज्ञापनादपि । सा हि दिव्या हरेर्मूर्तिर्दर्शनादेव सिद्धिकृत् ॥५८॥ शालिग्राम शिला बिम्ब का पूजन उनका ज्ञान करवाने से ही माना जाता है क्योंकि वह श्रीहरि की दिव्य मूर्ति मानी गयी है जिसके दर्शनमात्र से सिद्धि को प्राप्ति होती है।।५८।। प्राप्त्याभिगमनं दृष्ट्योपादानं नभसार्चनम् । स्वाध्यायः कीर्तनाद् योगः स्वार्पणादपि केवलम् ॥५९॥

१३६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता श्रीहरि की मात्र सन्निधि प्राप्ति कर लेना ही उनके प्रति अभिगमन हो जाता है केवल ज्ञान मात्र की दृष्टि से सभी उपचारों का उपादान हो जाता है तथा उनके नमस्कार करने से अर्चना सम्पन्न हो जाती है, उनके नामकीर्तन के कार्य से स्वाध्याय तथा केवल अपने आत्मनिवेदन रूप समर्पण से योग की सम्पन्नता होती है। (अतएव इस विकल्प को भी यथासमय प्रस्तुत कर श्रीहरि की नित्य अर्चना की पूर्ति की जावे॥५९॥ एवं विद्वानेकदापि कुर्वन् सन् पाञ्चकालिकः । कृतं भवति वा सर्वमिज्ययैव हि केवलम् ॥६०॥ इस प्रकार के विधानभूत आचार से विद्वान् तत्व की दृष्टि से एक बार सम्पन्न कर एकान्तीजन अथवा पांच समय सभी वर्णों की सामान्यविधि से केवल एक भगवद् अर्चना रूप कर्म सभी अभिगमनादि कर्मों को करनेवाला हो जाता है। (क्योंकि अर्चना में ही सभी भगवत् अर्चना के अन्य कर्म भी प्रथमाङ्ग रहने से अनुप्रविष्ट माने जाते हैं॥६०॥ स्वाध्यायेनापि विदुषा सर्वं योगेन वा कृतम् । पूजनेन गुरोर्वापि सताञ्चापि निषेवणात् ॥६१॥ इसी प्रकार अन्य कर्म जैसे स्वाध्याय या योग कर्म, गुरु के अर्चन कर्म तथा सत्सेवनादि' कर्म की भी इस श्रीहरि की सामान्य पांचकालिक इज्या (अर्चानारूप अनुष्ठान) से पूर्ति हो जाती है॥६१॥ विशुद्धं वैष्णवं बिम्बं गृहीत्वा न्यासतत्ववित् । सलिले देवमावाह्याभिषिञ्चेत् स्थापनं हि तत् ॥६२॥ अतएव न्यासयोग का तात्विक ज्ञान रखनेवाला एकान्ती भक्त, विशुद्ध श्रीविष्णु के शालिग्रामादि को लेकर जल में नारायण का आवाहन कर्म कर उससे उन्हें अभिषिक्त करना ही यहां उनकी स्थापना कर्म है॥६२॥ महाभागवतो मन्त्रैः शुद्धैर्यदभिषिञ्चति । बिम्बं सर्वोपचाराणां प्रायश्चित्तमिदं परम् ॥६३॥ और जो महाभागवत पुरुष शुद्ध देवताभिसम्बद्ध काव्यों मन्त्रों से श्रीहरि के शालिग्रामादि बिम्ब पर अभिषेक करता है तो यह कार्य सभी अपचारों का परम प्रायश्चित् हो जाता है॥६३॥ न परैः सङ्करं कुर्यात् पात्राणां यज्ञकर्मणि । कांस्यानां भोजने पाके मृण्मयानां विशेषतः ॥६४॥ यज्ञादि कर्मों में भगवदाराधन में उनके निमित्त निर्मित किये जाने वाले भोजन तथा

हिन्दीटीकासहित १३७ पाकादि द्रव्यों के लिये निर्धारित कांस्य के तथा विशेष कर मिट्टी के पात्रों का दूसरे तथा अन्य कार्यों में निर्धारित पात्रों के साथ विशेषरूप में सांकर्य (मिलाना) इष्ट नहीं है॥६४॥ शुद्धव्यामिश्रपात्राणां न कुर्याच्च परस्परम् । व्यामिश्रे शुद्धशेषं स्यात्तच्छेषं न शुचौ क्वचित् ॥६५॥ शुद्ध किया या कर्मों में विनियुक्त शुद्ध पात्रों का तथा मिश्र क्रिया में विनियुक्त मिश्रपात्रों का भी परस्पर सांकर्य उचित नहीं क्योंकि पात्रों (जिन्हें मिश्र क्रियाओं में विनियोजित किया जाता है) से शुद्ध पात्र शेष हो सकते हैं किन्तु शुद्ध क्रिया में विनियोजित पात्रों को मिश्र कर्म में विनियोजित नहीं किया जा सकता है॥६५॥ सतां पादोदकं पात्रे काञ्चने मृन्मयेऽपि वा । पावनं धारयेन्नित्यं प्रच्युताद्यैरदूषितम् ॥६६॥ प्रच्युत आदि से अदूषित या अस्पृष्ट गुरुजन आदि पूज्यजन का पादोदक कांचन अथवा मिट्टी के पात्र में पवित्रभाव में रखकर उसे नित्य धारण आदि किया जाता है (धारण करना चाहिए)॥६६॥ सन्तोऽनुपरतारब्धविलयात्यन्तनिर्मलः । अशुद्धैस्तत्तथाभावान्नाश्लिष्येयुः कथञ्चन ॥६७॥ सञ्चित प्रारब्ध के विलय हो जाने से जो अतिशय निर्मल हो चुके हों ऐसे सन्तजन वैसी स्थिति प्राप्त न किये हुए तथा इसी कारण परमशुद्धता से रहित अशुद्धजन से आश्लेष न करें (न ही हीन स्थिति के ऐसे व्यक्ति से संपर्क या सांकर्य होने दे)॥६८॥ कृत्वा मन्त्रान्वयं तत्र विवाहं परिवर्जयेत् । वैवाहिकोऽन्वयः पूर्वो न तु मन्त्रं निवारयेत् ॥६८॥ आचार्य या पूज्यगुरु से मन्त्र का सम्बन्ध दीक्षा से प्राप्त करने पर फिर उस वंश के साथ विवाहादि सम्बन्ध (अथवा उस वंश की कन्या का विवाहार्थ ग्रहण) नहीं करना चाहिए (मन्त्र सम्बन्ध लेकर उस परिवार से विवाह अनुचित है किन्तु) यदि पूर्व में विवाह हो गया हो तो बाद में मन्त्र लेने का सम्बन्ध करना निषिद्ध नहीं है॥६८॥ न्यासस्य सर्वयोगस्य शुद्धस्यात्यन्तिकस्य च । अन्यादृशस्य च विधेर्नानुबन्धं परे विदुः ॥६९॥ सभी के अधिकार वाले शुद्ध योग तथा मिश्र योग रूप न्यास के साथ इससे भिन्न

१३८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता विवाहादि सम्बन्ध की विधि का कोई सम्बन्ध नहीं है ऐसी दूसरी मुनिजन की मान्यता है (अतएव न्यास-योग का मन्त्र सम्बन्ध तथा विवाह जैसे वंश-सम्बन्ध का परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं समझना उचित है, ऐसा कुछ दूसरे मुनिजन का मत है)॥६९॥ प्राप्तुं लक्ष्मीपतेर्दास्यं शाश्वतं परमात्मनः । तमेव शरणं प्राप्य गच्छेदात्मविदं गुरुम् ॥७०॥ परमात्मा श्रीलक्ष्मीपति नारायण के नियत या शाश्वत दास्यभाव को शरण को प्राप्त करने के लिये ही श्रेष्ठ तथा आत्मज्ञ आचार्य (गुरु) को प्राप्त किया जाता है जिससे प्रपत्तिभूत न्यासयोग की दीक्षा ली जा सके॥७०॥ संवत्सरमुपासीत तमेव सुसमाहितः । वर्षवातातपादीनां सोढा युक्तोऽस्य कर्मसु ॥७१॥ वह गुरु की सेवाशुश्रूषादि में निरत रहकर वर्षा, वात, आतप (आदि का सहन करने) जैसे तप को साधते हुए तथा गुरु की सदैव शुश्रूषादि की चिन्ता रखते हुए एक वर्ष पर्यन्त उनके साथ निवास करे॥७१॥ गुरुरस्य परं स्थैर्यं शौचमास्तिक्यमार्जवम् । ज्ञात्वा चान्यगुणान् सम्यक् संस्कारैर्योजयेत् ततः ॥७२॥ इस प्रकार समय बीत जाने पर फिर गुरु इसके स्थिर भाव, बाह्य तथा आभ्यन्तर शुचिता (पवित्रता), वेदादि अर्थों तथा इष्टदेव के प्रति दृढ़ विश्वास, वाणी, मन तथा शरीर के एकरूपतावाली ऋजुता आदि अन्य गुणों को समझ कर बाद में उसको तापादि पञ्च संस्कारों से युक्त (संस्कारित) करे॥७२॥ अथ कश्चिदनुग्राह्यमबुद्धं स्वयमेव वा । परिगृह्य परं प्राज्ञः प्रापयेच्छरणं हरिम् ॥७३॥ (तथा यदि कोई) स्वयं करने की विधि तथा आचार से अनभिज्ञ तथा असमर्थ हो और उस पर करुणा बुद्धि से अनुग्रह करना उचित दिखता हो तो मनीषी आचार्य उस पर कृपा कर उसे स्वयं श्रीहरि की प्रपत्ति करवाकर श्रीहरि की शरणागत दीक्षा प्रदान करे॥७३॥ क्रमाच्च बुद्धयमानं तं बोधनीयानि बोधयेत् । कारयेत् करणीयानि प्रापयेत् परमां स्थितिम् ॥७४॥ आगे फिर समय बीतने पर क्रमशः अपने ईश के विषय में दृष्टि प्राप्त कर उसका ज्ञान प्राप्त कर लेने के उपरान्त उसे आवश्यक कर्तव्यों का तथा रहस्यों का ज्ञान करवाना चाहिए फिर उससे कर्तव्यों का पालन करवाने और वृत्ति का उपदेश देकर

हिन्दीटीकासहित १३९ एकान्तीजन की स्थिति तक उसे विकसित कर पहुँचावे जिससे वह उत्कृष्ट एकान्ती हो जाए॥७४॥ अजिह्मा सात्त्विकी बुद्धिर्येषां शास्त्रावगाहिनी । तेषां नारायणे भक्तिर्भवत्यव्यभिचारिणी ॥७५॥ जिनकी बुद्धि शास्त्र का अर्थ ग्रहण करने में समर्थ सत्वगुणवाली तथा सरलवृत्ति की है उनकी अन्य देवताओं की आराधनाओं से टूट कर एकनिष्ट भाव से श्रीहरि में स्थित भक्तिवाली बुद्धि हो जाती है॥७५॥ येषां शास्त्रेषु गाढापि राजसी कुटिला मतिः । तेषां न जायते भक्तिर्हरौ जातापि च स्खलेत् ॥७६॥ और जिनकी प्रतिशास्त्र में अर्थावगाहिनी बुद्धि राजसी गुणोंवाली हो तथा जिसमें कुटिलवृत्ति के कारण अनेक देवताओं में अपेक्षावश निष्ठा निर्माण होती है तो उनकी श्रीनारायण में भक्ति उत्पन्न नहीं होती और कदाचित् उत्पन्न होती भी है तो वह स्थिर नहीं होने से बाद में स्खलित या दूर हो जाती है॥७६॥ तमसाभिप्लुता येषां शास्त्रेष्वक्रमते न धीः । न ते स्वात्मानमीशं वा बुद्धयन्ते देहबुद्धयः ॥७७॥ तथा जिनकी बुद्धि शास्त्रादि के अनुशीलन से नहीं चलती, ऐसे जो व्यक्ति तमोगुण से युक्त होते हैं वे देहादिस्थूल पदार्थ तक ज्ञान के पहुँचने के कारण आत्मा के अधिपति परमात्मा को जानने में असमर्थ रहते हैं। (तथा वे श्रीहरि के ज्ञान तथा भक्ति की प्राप्ति से वंचित हो जाते हैं)॥७७॥ लोभाद्वा यदि वा मोहाच्छिष्यं शास्ति न यो गुरुः । नास्मात् संशृणुते यश्च प्रच्युतौ तावुभावपि ॥७८॥ जो आचार्य लोभ या मोह के वश में होकर अपने शिष्य को अनुशासन में नहीं रख पाते तथा जिसके उपदेशादि शास्त्रवृत्त को शिष्य नहीं सुनते न उस पर ध्यान देते हों तो ऐसे आचार्य तथा शिष्य दोनों का पतन हो जाता है (अतएव सात्विक गुणवाले शिष्य को ही गुरु उपदेश देकर उसे कल्याण प्राप्ति करवा सकता है तथा ऐसे ही शिष्य रखना उचित है)॥७८॥ अपरीक्ष्य चिरं क्षेत्रं यः परं ज्ञानमावहेत् । प्रमाद्यतः सुगोप्तव्ये परमार्थोऽस्य हीयते ॥७९॥ इसीलिये शिष्यरूप क्षेत्र की बिना चिरकाल तक परीक्षा के ही जो उसमें परमार्थसाधक परम ज्ञानरूप बीज का आधार उपदेश द्वारा सम्पन्न करता है तो अत्यंत गोपनीय मोक्षोपायभूत ज्ञान के प्रदानरूप प्रमाद करने से उस आचार्य की भी

१४० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अपने उद्देश्य या परमप्रयोजन में हानि होकर प्रमादवश पतन हो जाता है॥७९॥ न्यासे हि देहिनोऽपायैर्जायते प्रच्युतिः फलात् । वार्यत्याप्रशमनात् सा हि सद्भ्यवहार्यताम् ॥८०॥ किसी शिष्य के द्वारा आत्मा के प्रपत्तिरूप न्यास के सम्पन्न करने पर भी बाद में उपायों के प्राकृतजन संसर्गादि से बन जाने पर श्रीहरि के दास भाव की प्राप्तिरूप फल से प्रच्युति से उद्दिष्टार्थ से वंचित होना पड़ता है, अतएव प्रायश्चित्तादि से प्रशमन कर्म के आचरण तक वह प्रायश्चित रूप में शिष्टजन से बहिष्कृत होकर रहेगा तथा इस समय वह भगवत् कैङ्कर्य के अधिकार से हीन भी हो जाएगा ॥८०॥ यज्ज्ञानपूर्वं न्यसनं मन्त्रेण गुरुणा हरौ । स एव सर्वसंस्कारः प्राक्तस्मात् प्राकृताः नराः ॥८१॥ आचार्य के द्वारा मन्त्रार्थ के ज्ञान को देते हुए जो शरणागति मन्त्र से श्रीनारायण के प्रति प्रपत्ति या न्यासयोग के साथ शिष्य का समर्पण करवाया जाता है उस सभी पूर्ण संस्कार के किये गये विधान से पूर्व वह जन अवैष्णवभूत था, अतः वह तब तक प्राकृत जन था॥८१॥ प्राकृताद्यैः परिहृतो निवसेन्नासहायवान् । वसँश्चाभ्यन्तरान् प्राज्ञः संसर्गान् परिवर्जयेत् ॥८२॥ न्यासयोग प्राप्त शिष्य अकेली ही रहे वह प्राकृतादि की संगति से दूर रहे तथा अपनी कुशलबुद्धि के साथ इनसे व्यवहार रखते हुए किसी आंतरिक संसर्गवाला व्यवहार भी (जैसे साथ रहना एक साथ शयन तथा भोजन आदि व्यवहार) नहीं रखे॥८२॥ श्रद्धापूतमवैद्यस्याप्यन्नाद्यं तु कदाचन । इज्यासु विनियुञ्जीत न श्राद्धे सति किञ्चन ॥८३॥ अवैष्णवभूत श्रीहरि की प्रपत्ति न पाने वाले किसी प्राकृतजन का श्रद्धावश अर्पित अन्न (पक्व या अपक्व) या किसी श्राद्ध कर्म के या सामान्यरूप में यज्ञादि के प्रसंग में अनापत् या आपत् स्थिति में भी उपयोग न करे (इस अवैष्णव दत्त अन्न का भोजनादि में लेना या उपयोग भी फल प्राप्ति में बाधक समझना चाहिए)॥८३॥ गुणासहास्त्यजन्त्यार्या न सन्तश्चिरमंहसे । दोषासहास्त्यजन्त्येव सन्तश्च श्रेयसे परान् ॥८४॥ आर्यजन या सज्जन किसी के गुणवश ही उसका चिरकाल तक पातकादि के चलाने

हिन्दीटीकासहित १४१ पर उसका परित्याग करना उचित मानकर बाद में उसे छोड़ते हैं और दोषों को देखकर सज्जन रहने पर भी उसी के लिये प्रायश्चित्तादि आचरण के काल में उसका परित्याग करते हैं॥८४॥ धर्मच्छद्मभृतो धर्मान् घ्नन्ति वेदपराङ्मुखाः । वैदिकाभास्तथा वेदान् कृष्णैकान्त्यपराङ्मुखाः ॥८५॥ वेद प्रतिपादित धर्म से हटकर चैत्यवन्दनादि बौद्ध धर्म का ज्ञान तथा आचरण करने (या उस पर आस्था रखने) वाले केवल धर्म का छद्म् धारण करते हुए (धार्मिक होना दिखलाते हुए) धर्मों का (ज्योतिष्टोमादि सत्रो का जो कि धर्म प्राप्ति के आधार हैं) हनन करते हैं तथा जो परमार्थतः वैदिक नहीं होकर भी अपनी वैदिक स्थिति दिखला कर वेदों का हनन करते हैं ये श्री नारायण के एकान्त्यभाव में बाधक रहने से उसके प्रतिपक्षी (ही) समझना चाहिए॥८५॥ य आत्मनां परो वेद्यस्तं विष्णुं वेदयन्ति यत् । तद्वेदानां हि वेदत्वं यस्तं वेद स वेदवित् ॥८६॥ जिनसे चेतनभूत जीवात्माओं से उत्कृष्ट ज्ञानवेद्य परमात्मरूप श्रीविष्णु का ब्रह्मरूप में ज्ञान प्राप्त हो यही वेदों की सत्ज्ञानवत्ता है तथा जो वेदों के अनुशीलन से इसी रहस्यभूत ज्ञान की प्राप्ति करे वही वेदवेत्ता है। तथा इससे भिन्न तत्वों के विज्ञाता वेद के वेत्ता नहीं वे वेदविद्यघातक हैं॥८६॥ दर्शयन्त इव श्रेयो विप्लुतैर्हेतुभिर्बलात् । च्यावयन्ति श्रुतिपथात् दूरं बाह्याः स्थिरानपि ॥८७॥ हेतुवादिक अवैष्णव व कुदृष्टि रखनेवाला विद्वान् (बौद्धादि दार्शनिक) स्खलनशील हेत्वाभास जैसे हेतुओं को अपने बुद्धिबल से श्रेयस्कारी दिखलाते हुए स्थित श्रद्धाभक्तिवाले बुधजन को भी स्थिर सिद्धान्तवाले वेदमार्ग से दूर हटाकर वे उन्हें अपथगामी बना देते हैं॥८७॥ वैदिका इव चाप्यन्ये दर्शयन्तोऽन्यथा श्रुतेः । अर्थमच्युतकैङ्कर्याच्च्यावयन्ति कुदृष्टयः ॥८८॥ कुछ विद्वान् वेद का अनुगमन करनेवाले होने से वेद के आशयों को अपनी तार्किक बुद्धि के बल से अन्यरूपों में दिखलाने वाले कुदृष्टि होकर अच्युत के कैङ्कर्यभाव से दृढ़भक्ति वैष्णवों को भी भटका देते हैं॥८८॥ तस्मात् कुदृष्टिभिर्बाह्यैरप्रकम्प्यो गतव्यथः । ऐकान्त्यममलं विष्णोरातिष्ठेत् परमं सुधीः ॥८९॥ अतएव बुद्धिमान् स्थिर भक्तिवाला एकान्ती बाह्यजन की ऐसी हेतु प्रदर्शन तार्किक ६

१४२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता कुदृष्टियों से अपने धर्म से न हटे तथा बिना किसी कथा के श्रीहरि के परम एकान्त्यभाव में दृढ़ता से स्थिर रहे तथा अपने धर्मादि का पालन करत रहे॥८९॥ नास्तिकः संशयी मूढ इत्यदूरतरा नराः । विज्ञाय लक्षणैस्तांस्तु सम्यग् व्यवसितस्त्यजेत् ॥९०॥ अपने साथ रहने वाले निकटस्थ नास्तिक, सन्देहशील तथा मूढ़मति के मनुष्यों क उनके लक्षणों से भली प्रकार समझते हुए ऐसे सभी कुदृष्टि जन को निश्चय क उनका साहचर्य तथा संगादि छोड़ देवे॥९०॥ मत्प्रत्यक्षन्तदेवास्ति नास्त्यन्यदिति निश्चिताः । अर्थकामपराः पापा नास्तिका देहकिङ्कराः ॥९१॥ जो मुझे प्रत्यक्ष हो वही विद्यमान या सत्य है तथा अन्य पदार्थ या ईश्वरादि अप्रत्यक्ष तत्व कुछ भी नहीं है ऐसा निश्चय दिखलाने वाले अर्थ तथा कामरूप पुरुषार्थ के सेव में रत रहनेवाले अपने शरीर के धर्म के जो दास हैं वे ‘नास्तिक’ है (तथा कुदृष्टि हैं)॥९१॥ नानाविधेषु ज्ञानेषु नराः संशयिनोऽधमाः । निश्चयं नाधिगच्छन्ति लिङ्गमात्रधराः क्वचित् ॥९२॥ इसी प्रकार अनेक प्रकार के शास्त्रज्ञानों के कारण परस्पर विपरीत कथ्यों को प्राप कर संशय में स्थित रहनेवाले होकर किसी निश्चय पर नहीं पहुँचने से ‘संशयी’ तथ अधमजन हैं। इसके अतिरिक्त कुछ व्यक्ति केवल अपने मत के अनुक वस्त्रादिवेषधारी मात्र होते हैं॥९२॥ देहात्मस्वर्गनरकपुण्यपापाविमर्शनः । गतानुगतिका मूढा नश्यन्ति पशुबुद्धयः ॥९३॥ कुछ देहात्मवादी, स्वर्ग, नरक, पुण्य तथा पाप के विचार से शून्य होते हुए केव अपने प्रविचारित मार्ग में स्थित रहनेवाले अज्ञानी हैं जो, इस वृत्ति के कारण पशु समान विवेक रहित हैं। ऐसे सभी प्रायः मोक्षप्राप्ति के अपात्र होने से अन्त में ना प्राप्त करते हैं॥९३॥ कुदृष्टयो बहुविधा वृथा वैदिकमानिनः । तथा मिथ्यादृशो बाह्याः सर्वैरेवावृतञ्जगत् ॥९४॥ नास्तिक एवं कुदृष्टिजन के अनेक प्रकार होते हैं। कुछ वृथा ही अपने को वेदज्ञान सम्पन्न मानने वाले वैष्णवविरोधी हैं, इसी प्रकार कुछ हेतु आदि के प्रयोगों मिथ्यादृष्टि का निर्माण करनेवाले बाह्य विद्वान् हैं (अवैदिकजनक)। इस प्रकार