भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासहित १२९ जाने से कर्मों की गति में भी भिन्नता आ जाती है। इस प्रकार होने पर भी सभी कर्म तथा फलों का प्रदाता तो स्वयं श्रीनारायण ही रहते हैं (अतएव किसी भी अन्य देवता के आराधन करने पर भी उनके फलदाता भी अच्युत ही हो जाते हैं)॥२१॥ यथा कामफला यज्ञाः सृष्टा भगवता स्वयम् । त एव विदुषां तर्हि निर्वाणाय निराशिषाम् ॥२२॥ क्योंकि श्रीभगवन्नारायण ने ही स्वयं जिस प्रकार स्वर्गादि कामनाओं के प्रदाता यज्ञादि की सृष्टि की थी वे ही तथारूपवाले कामनाओं के प्रदाता यज्ञादि जब बिना किसी कामना या कर्मफल के अनुष्ठित किये जाएं तो ज्ञानी जन के लिये मोक्ष प्रदाता भी हो जाते हैं॥२२॥ अबुद्धा परमात्मानं हरिमन्या हि देवताः । ये यजन्ति निरस्ताशास्तेषां ज्ञानाय तच्छनैः ॥२३॥ केवल श्रीहरि को न लक्ष्यकर (बिना ज्ञान से देखे) वैदिकादि अनुष्ठानों के अनुरोध पर अन्य अग्नि, इन्द्रादि देवगणों का यज्ञों में यजन करनेवाले किन्तु फल की इच्छा न रखनेवाले विद्वानों को यह यजन आगे चलकर शनैः शनैः (भगवन्नारायणविषयक) ज्ञान तथा भक्ति और उसी के बाद प्राप्य मोक्ष को भी प्रदान कर देते ज्ञान तथा भक्ति और उसी के बाद प्राप्य मोक्ष को प्रदान कर देता है)॥२३॥ बुद्ध्वापि परमात्मानं पारमैकान्त्यवर्जिताः । इष्ट्वापि परमैर्यज्ञैः स्थानं यान्ति न शाश्वतम् ॥२४॥ अन्तर्यामीभूत श्रीनारायण की ज्ञान की स्थिति रखकर भी जो एकान्त भाव से रहित होकर उत्तम प्रकारों वाले वेदादि से अनुमत विविध यज्ञादि से यजन करने पर भी ऐसे विद्वान् परमपद की प्राप्ति (परमैकान्त्यभाव के न रहने से) नहीं प्राप्त करते हैं॥२४॥ व्यामिश्रांश्चापि शुद्धांश्च तत्तत्कालविभागवित् । यथान्यायं प्रयुञ्जीत धर्मानैकान्त्यनिष्ठतः ॥२५॥ अतएव विद्वान् अवसरों के विभागों को देखकर जो ज्ञानपूर्वक यथाक्रम, यथाविभाग तथा यथाधिकार व्यामिश्र धर्म तथा शुद्ध कर्मों का एकान्त्यभाव में स्थित रहकर अनुष्ठान करें (जिससे उसे परमपद प्राप्ति में बाधा न रहे॥२५॥ बुद्ध्वापि परमात्मानमशुद्धं कर्म कामिनाम् । शुद्धं सर्वमकामानामेतद्धि परमं मतम् ॥२६॥