नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अतएव परमात्मा श्रीनारायण को तात्विकभाव से अन्तर्यामी मानकर भी कामनाओं के अनुरूप काम्य यज्ञादि यजन कर्मोंका अनुष्ठान करना भी अशुद्ध कर्म है तथा बिना कामना के काम्य यज्ञादि का यजन ही शुद्ध कर्म होता है तथा यही सिद्धान्तभूत मत या तत्व भी है॥२६॥ नानाफलक्रियायोगदेवताव्याकुलात्मभिः । दुर्ज्ञानं दुरवाप्यञ्च दास्यं विष्णोः परं पदम् ॥२७॥ इसलिये अनेक फलों, अनेक क्रियाओं के योग तथा देवताओं के कारण तथा अनेक उपायों से युक्त होने से व्याकुल रहकर त्रैविद्य यजनादि काम्य कर्मों के विस्तीर्ण रहने से जिनका पूर्णतः ज्ञान नहीं प्राप्त किया जा सकता है तथा जिनसे प्राप्य फलों की भी प्राप्ति बड़े आयास के बाद संभव होती है परन्तु इन सभी की अपेक्षा तो श्रीविष्णु की दास्यभक्ति द्वारा प्रपत्ति धारण करना या न्यासयोग का ग्रहण ही अधिक सरल है॥२७॥ यत्तु विश्वपतेर्विष्णोर्नित्यं दासत्वमात्मनः । तज्ज्ञानन्तत्क्रिया वा तत्प्रसादादेव सिद्ध्यति ॥२८॥ और इस प्रकार विश्व के अधिपति श्रीविष्णु को अर्पित अपना नित्य दास्यभाव का ज्ञान रखना रूप जो क्रिया है वही या उसी के प्रभाव से श्रीविष्णु के प्रपत्ति के प्रसाद से परमपद की प्राप्ति रूप सिद्धि भी मिल सकती है॥२८॥ प्रसादनानामीशस्य श्रेयसी शरणागतिः । तत्प्रधाना हि सिद्ध्यन्ति यथान्याः सकलाः क्रियाः ॥२९॥ परमेश्वर के प्रसादन के उपायों में उनकी शरणागतिरूप जो प्रपत्ति है वही श्रेयस्करी या सर्वोत्तम उपाय है, क्योंकि उसकी मुख्यता से अन्य उपायभूत सभी क्रियाएं अंगभाव में होकर सिद्ध हो जाती है (अतः शरणागति ही उत्तम क्रिया या उपाय है)॥२९॥ यश्चायमात्मनिक्षेपः क्रियते परमात्मनि । तेनैव हि भरन्यासस्तथा फलसमर्पणम् ॥३०॥ अतः जिस मन्त्र से परमेश्वर श्रीहरि में आत्मनिक्षेप किया जाए उसी मन्त्र से कार्यों का भर न्यास तथा उनके फल का समर्पण भी किया जाता है॥३०॥ यः शरण्यमशेषाणां प्राप्नोति शरणं हरिम् । स मुक्तः सर्वपापेभ्यः स्वकुलञ्च समुद्धरेत् ॥३१॥ और जो श्रीहरि सभी विश्व का शरण्य (रक्षक) है ऐसे श्रीहरि की जो शरणागति