नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता श्रीहरि की मात्र सन्निधि प्राप्ति कर लेना ही उनके प्रति अभिगमन हो जाता है केवल ज्ञान मात्र की दृष्टि से सभी उपचारों का उपादान हो जाता है तथा उनके नमस्कार करने से अर्चना सम्पन्न हो जाती है, उनके नामकीर्तन के कार्य से स्वाध्याय तथा केवल अपने आत्मनिवेदन रूप समर्पण से योग की सम्पन्नता होती है। (अतएव इस विकल्प को भी यथासमय प्रस्तुत कर श्रीहरि की नित्य अर्चना की पूर्ति की जावे॥५९॥ एवं विद्वानेकदापि कुर्वन् सन् पाञ्चकालिकः । कृतं भवति वा सर्वमिज्ययैव हि केवलम् ॥६०॥ इस प्रकार के विधानभूत आचार से विद्वान् तत्व की दृष्टि से एक बार सम्पन्न कर एकान्तीजन अथवा पांच समय सभी वर्णों की सामान्यविधि से केवल एक भगवद् अर्चना रूप कर्म सभी अभिगमनादि कर्मों को करनेवाला हो जाता है। (क्योंकि अर्चना में ही सभी भगवत् अर्चना के अन्य कर्म भी प्रथमाङ्ग रहने से अनुप्रविष्ट माने जाते हैं॥६०॥ स्वाध्यायेनापि विदुषा सर्वं योगेन वा कृतम् । पूजनेन गुरोर्वापि सताञ्चापि निषेवणात् ॥६१॥ इसी प्रकार अन्य कर्म जैसे स्वाध्याय या योग कर्म, गुरु के अर्चन कर्म तथा सत्सेवनादि' कर्म की भी इस श्रीहरि की सामान्य पांचकालिक इज्या (अर्चानारूप अनुष्ठान) से पूर्ति हो जाती है॥६१॥ विशुद्धं वैष्णवं बिम्बं गृहीत्वा न्यासतत्ववित् । सलिले देवमावाह्याभिषिञ्चेत् स्थापनं हि तत् ॥६२॥ अतएव न्यासयोग का तात्विक ज्ञान रखनेवाला एकान्ती भक्त, विशुद्ध श्रीविष्णु के शालिग्रामादि को लेकर जल में नारायण का आवाहन कर्म कर उससे उन्हें अभिषिक्त करना ही यहां उनकी स्थापना कर्म है॥६२॥ महाभागवतो मन्त्रैः शुद्धैर्यदभिषिञ्चति । बिम्बं सर्वोपचाराणां प्रायश्चित्तमिदं परम् ॥६३॥ और जो महाभागवत पुरुष शुद्ध देवताभिसम्बद्ध काव्यों मन्त्रों से श्रीहरि के शालिग्रामादि बिम्ब पर अभिषेक करता है तो यह कार्य सभी अपचारों का परम प्रायश्चित् हो जाता है॥६३॥ न परैः सङ्करं कुर्यात् पात्राणां यज्ञकर्मणि । कांस्यानां भोजने पाके मृण्मयानां विशेषतः ॥६४॥ यज्ञादि कर्मों में भगवदाराधन में उनके निमित्त निर्मित किये जाने वाले भोजन तथा