भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासहित १३५ की (चर्या तथा) अर्चना ही प्रथम मुख्य कर्म है तथा तापादि संस्कार और होमादि कर्म की विधिकर्म के अनुगत बाद में स्थिति रहती है ऐसा अन्य विद्वानों का यहां मत है।।५३।। परमैकान्तिनां नित्या या वृत्तिर्विहिता गुरौ । तदभावे तु तत्पुत्रे गुर्वर्चा दैवतेषु सा ॥५४॥ परमैकान्ती वैष्णव की अपने गुरु के विषय में रखी जानेवाली जो विहित वृत्ति है उनके अभाव में उसके पुत्र के द्वारा गुरु तथा देवादि अर्चा सम्पन्न करवाने में रहती ही है।।५४।। सर्वेषां याग एवायं सामान्यो मुनिभिः स्मृतः । अभ्येत्य प्रणिपत्याग्रे देवायात्मनिवेदनम् ॥५५॥ पुरातन मुनिजन ने प्रायः यह सभी के लिये सामान्यरूप में यज्ञ की तरह विधिरूप में दिखलाया है कि देवता के समक्ष उपस्थित होकर उसे प्रणाम कर आत्मनिवेदन करे। यह कार्य यजन या यज्ञ के आचरण के तुल्य है।।५५।। सर्वेषामुपचाराणामर्घ्यं परममुच्यते । कृतेनैकेन तेनैव सर्वमेव कृतं भवेत् ॥५६॥ और सभी पाद्यादि उपचारों में अर्घ्य अर्पण करना श्रेष्ठ माना गया है अतः इस एक के ही प्रस्तुत या अर्पित कर देने से सभी उपचार अर्पित माने गये हैं।।५६।। अर्च्योऽर्चायां हरिर्नित्यं तदभावे तु कुत्रचित् । पुष्पेणार्घ्येण हविषा नत्या स्तुत्यापि वा परम् ॥५७॥ श्रीहरि के शालिग्रामादि बिम्ब में अर्चना नित्य होना चाहिए जिसमें अर्घ्य प्रस्तुत हो तथा इसके अभाव में उनकी व्यापकता की दृष्टि से सूर्याग्नि में भी अर्चना हो सकती है. जिसे पुष्प, अर्घ्य, हवि, प्रदान, प्रणति तथा परम स्तुति आदि के द्वारा सम्पन्न किया जाता है।।५७।। शालग्रामशिलायान्तु पूजनं ज्ञापनादपि । सा हि दिव्या हरेर्मूर्तिर्दर्शनादेव सिद्धिकृत् ॥५८॥ शालिग्राम शिला बिम्ब का पूजन उनका ज्ञान करवाने से ही माना जाता है क्योंकि वह श्रीहरि की दिव्य मूर्ति मानी गयी है जिसके दर्शनमात्र से सिद्धि को प्राप्ति होती है।।५८।। प्राप्त्याभिगमनं दृष्ट्योपादानं नभसार्चनम् । स्वाध्यायः कीर्तनाद् योगः स्वार्पणादपि केवलम् ॥५९॥