नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित १३७ पाकादि द्रव्यों के लिये निर्धारित कांस्य के तथा विशेष कर मिट्टी के पात्रों का दूसरे तथा अन्य कार्यों में निर्धारित पात्रों के साथ विशेषरूप में सांकर्य (मिलाना) इष्ट नहीं है॥६४॥ शुद्धव्यामिश्रपात्राणां न कुर्याच्च परस्परम् । व्यामिश्रे शुद्धशेषं स्यात्तच्छेषं न शुचौ क्वचित् ॥६५॥ शुद्ध किया या कर्मों में विनियुक्त शुद्ध पात्रों का तथा मिश्र क्रिया में विनियुक्त मिश्रपात्रों का भी परस्पर सांकर्य उचित नहीं क्योंकि पात्रों (जिन्हें मिश्र क्रियाओं में विनियोजित किया जाता है) से शुद्ध पात्र शेष हो सकते हैं किन्तु शुद्ध क्रिया में विनियोजित पात्रों को मिश्र कर्म में विनियोजित नहीं किया जा सकता है॥६५॥ सतां पादोदकं पात्रे काञ्चने मृन्मयेऽपि वा । पावनं धारयेन्नित्यं प्रच्युताद्यैरदूषितम् ॥६६॥ प्रच्युत आदि से अदूषित या अस्पृष्ट गुरुजन आदि पूज्यजन का पादोदक कांचन अथवा मिट्टी के पात्र में पवित्रभाव में रखकर उसे नित्य धारण आदि किया जाता है (धारण करना चाहिए)॥६६॥ सन्तोऽनुपरतारब्धविलयात्यन्तनिर्मलः । अशुद्धैस्तत्तथाभावान्नाश्लिष्येयुः कथञ्चन ॥६७॥ सञ्चित प्रारब्ध के विलय हो जाने से जो अतिशय निर्मल हो चुके हों ऐसे सन्तजन वैसी स्थिति प्राप्त न किये हुए तथा इसी कारण परमशुद्धता से रहित अशुद्धजन से आश्लेष न करें (न ही हीन स्थिति के ऐसे व्यक्ति से संपर्क या सांकर्य होने दे)॥६८॥ कृत्वा मन्त्रान्वयं तत्र विवाहं परिवर्जयेत् । वैवाहिकोऽन्वयः पूर्वो न तु मन्त्रं निवारयेत् ॥६८॥ आचार्य या पूज्यगुरु से मन्त्र का सम्बन्ध दीक्षा से प्राप्त करने पर फिर उस वंश के साथ विवाहादि सम्बन्ध (अथवा उस वंश की कन्या का विवाहार्थ ग्रहण) नहीं करना चाहिए (मन्त्र सम्बन्ध लेकर उस परिवार से विवाह अनुचित है किन्तु) यदि पूर्व में विवाह हो गया हो तो बाद में मन्त्र लेने का सम्बन्ध करना निषिद्ध नहीं है॥६८॥ न्यासस्य सर्वयोगस्य शुद्धस्यात्यन्तिकस्य च । अन्यादृशस्य च विधेर्नानुबन्धं परे विदुः ॥६९॥ सभी के अधिकार वाले शुद्ध योग तथा मिश्र योग रूप न्यास के साथ इससे भिन्न