नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
हिन्दीटीकासहित १३७ पाकादि द्रव्यों के लिये निर्धारित कांस्य के तथा विशेष कर मिट्टी के पात्रों का दूसरे तथा अन्य कार्यों में निर्धारित पात्रों के साथ विशेषरूप में सांकर्य (मिलाना) इष्ट नहीं है॥६४॥ शुद्धव्यामिश्रपात्राणां न कुर्याच्च परस्परम् । व्यामिश्रे शुद्धशेषं स्यात्तच्छेषं न शुचौ क्वचित् ॥६५॥ शुद्ध किया या कर्मों में विनियुक्त शुद्ध पात्रों का तथा मिश्र क्रिया में विनियुक्त मिश्रपात्रों का भी परस्पर सांकर्य उचित नहीं क्योंकि पात्रों (जिन्हें मिश्र क्रियाओं में विनियोजित किया जाता है) से शुद्ध पात्र शेष हो सकते हैं किन्तु शुद्ध क्रिया में विनियोजित पात्रों को मिश्र कर्म में विनियोजित नहीं किया जा सकता है॥६५॥ सतां पादोदकं पात्रे काञ्चने मृन्मयेऽपि वा । पावनं धारयेन्नित्यं प्रच्युताद्यैरदूषितम् ॥६६॥ प्रच्युत आदि से अदूषित या अस्पृष्ट गुरुजन आदि पूज्यजन का पादोदक कांचन अथवा मिट्टी के पात्र में पवित्रभाव में रखकर उसे नित्य धारण आदि किया जाता है (धारण करना चाहिए)॥६६॥ सन्तोऽनुपरतारब्धविलयात्यन्तनिर्मलः । अशुद्धैस्तत्तथाभावान्नाश्लिष्येयुः कथञ्चन ॥६७॥ सञ्चित प्रारब्ध के विलय हो जाने से जो अतिशय निर्मल हो चुके हों ऐसे सन्तजन वैसी स्थिति प्राप्त न किये हुए तथा इसी कारण परमशुद्धता से रहित अशुद्धजन से आश्लेष न करें (न ही हीन स्थिति के ऐसे व्यक्ति से संपर्क या सांकर्य होने दे)॥६८॥ कृत्वा मन्त्रान्वयं तत्र विवाहं परिवर्जयेत् । वैवाहिकोऽन्वयः पूर्वो न तु मन्त्रं निवारयेत् ॥६८॥ आचार्य या पूज्यगुरु से मन्त्र का सम्बन्ध दीक्षा से प्राप्त करने पर फिर उस वंश के साथ विवाहादि सम्बन्ध (अथवा उस वंश की कन्या का विवाहार्थ ग्रहण) नहीं करना चाहिए (मन्त्र सम्बन्ध लेकर उस परिवार से विवाह अनुचित है किन्तु) यदि पूर्व में विवाह हो गया हो तो बाद में मन्त्र लेने का सम्बन्ध करना निषिद्ध नहीं है॥६८॥ न्यासस्य सर्वयोगस्य शुद्धस्यात्यन्तिकस्य च । अन्यादृशस्य च विधेर्नानुबन्धं परे विदुः ॥६९॥ सभी के अधिकार वाले शुद्ध योग तथा मिश्र योग रूप न्यास के साथ इससे भिन्न
१३८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता विवाहादि सम्बन्ध की विधि का कोई सम्बन्ध नहीं है ऐसी दूसरी मुनिजन की मान्यता है (अतएव न्यास-योग का मन्त्र सम्बन्ध तथा विवाह जैसे वंश-सम्बन्ध का परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं समझना उचित है, ऐसा कुछ दूसरे मुनिजन का मत है)॥६९॥ प्राप्तुं लक्ष्मीपतेर्दास्यं शाश्वतं परमात्मनः । तमेव शरणं प्राप्य गच्छेदात्मविदं गुरुम् ॥७०॥ परमात्मा श्रीलक्ष्मीपति नारायण के नियत या शाश्वत दास्यभाव को शरण को प्राप्त करने के लिये ही श्रेष्ठ तथा आत्मज्ञ आचार्य (गुरु) को प्राप्त किया जाता है जिससे प्रपत्तिभूत न्यासयोग की दीक्षा ली जा सके॥७०॥ संवत्सरमुपासीत तमेव सुसमाहितः । वर्षवातातपादीनां सोढा युक्तोऽस्य कर्मसु ॥७१॥ वह गुरु की सेवाशुश्रूषादि में निरत रहकर वर्षा, वात, आतप (आदि का सहन करने) जैसे तप को साधते हुए तथा गुरु की सदैव शुश्रूषादि की चिन्ता रखते हुए एक वर्ष पर्यन्त उनके साथ निवास करे॥७१॥ गुरुरस्य परं स्थैर्यं शौचमास्तिक्यमार्जवम् । ज्ञात्वा चान्यगुणान् सम्यक् संस्कारैर्योजयेत् ततः ॥७२॥ इस प्रकार समय बीत जाने पर फिर गुरु इसके स्थिर भाव, बाह्य तथा आभ्यन्तर शुचिता (पवित्रता), वेदादि अर्थों तथा इष्टदेव के प्रति दृढ़ विश्वास, वाणी, मन तथा शरीर के एकरूपतावाली ऋजुता आदि अन्य गुणों को समझ कर बाद में उसको तापादि पञ्च संस्कारों से युक्त (संस्कारित) करे॥७२॥ अथ कश्चिदनुग्राह्यमबुद्धं स्वयमेव वा । परिगृह्य परं प्राज्ञः प्रापयेच्छरणं हरिम् ॥७३॥ (तथा यदि कोई) स्वयं करने की विधि तथा आचार से अनभिज्ञ तथा असमर्थ हो और उस पर करुणा बुद्धि से अनुग्रह करना उचित दिखता हो तो मनीषी आचार्य उस पर कृपा कर उसे स्वयं श्रीहरि की प्रपत्ति करवाकर श्रीहरि की शरणागत दीक्षा प्रदान करे॥७३॥ क्रमाच्च बुद्धयमानं तं बोधनीयानि बोधयेत् । कारयेत् करणीयानि प्रापयेत् परमां स्थितिम् ॥७४॥ आगे फिर समय बीतने पर क्रमशः अपने ईश के विषय में दृष्टि प्राप्त कर उसका ज्ञान प्राप्त कर लेने के उपरान्त उसे आवश्यक कर्तव्यों का तथा रहस्यों का ज्ञान करवाना चाहिए फिर उससे कर्तव्यों का पालन करवाने और वृत्ति का उपदेश देकर
हिन्दीटीकासहित १३९ एकान्तीजन की स्थिति तक उसे विकसित कर पहुँचावे जिससे वह उत्कृष्ट एकान्ती हो जाए॥७४॥ अजिह्मा सात्त्विकी बुद्धिर्येषां शास्त्रावगाहिनी । तेषां नारायणे भक्तिर्भवत्यव्यभिचारिणी ॥७५॥ जिनकी बुद्धि शास्त्र का अर्थ ग्रहण करने में समर्थ सत्वगुणवाली तथा सरलवृत्ति की है उनकी अन्य देवताओं की आराधनाओं से टूट कर एकनिष्ट भाव से श्रीहरि में स्थित भक्तिवाली बुद्धि हो जाती है॥७५॥ येषां शास्त्रेषु गाढापि राजसी कुटिला मतिः । तेषां न जायते भक्तिर्हरौ जातापि च स्खलेत् ॥७६॥ और जिनकी प्रतिशास्त्र में अर्थावगाहिनी बुद्धि राजसी गुणोंवाली हो तथा जिसमें कुटिलवृत्ति के कारण अनेक देवताओं में अपेक्षावश निष्ठा निर्माण होती है तो उनकी श्रीनारायण में भक्ति उत्पन्न नहीं होती और कदाचित् उत्पन्न होती भी है तो वह स्थिर नहीं होने से बाद में स्खलित या दूर हो जाती है॥७६॥ तमसाभिप्लुता येषां शास्त्रेष्वक्रमते न धीः । न ते स्वात्मानमीशं वा बुद्धयन्ते देहबुद्धयः ॥७७॥ तथा जिनकी बुद्धि शास्त्रादि के अनुशीलन से नहीं चलती, ऐसे जो व्यक्ति तमोगुण से युक्त होते हैं वे देहादिस्थूल पदार्थ तक ज्ञान के पहुँचने के कारण आत्मा के अधिपति परमात्मा को जानने में असमर्थ रहते हैं। (तथा वे श्रीहरि के ज्ञान तथा भक्ति की प्राप्ति से वंचित हो जाते हैं)॥७७॥ लोभाद्वा यदि वा मोहाच्छिष्यं शास्ति न यो गुरुः । नास्मात् संशृणुते यश्च प्रच्युतौ तावुभावपि ॥७८॥ जो आचार्य लोभ या मोह के वश में होकर अपने शिष्य को अनुशासन में नहीं रख पाते तथा जिसके उपदेशादि शास्त्रवृत्त को शिष्य नहीं सुनते न उस पर ध्यान देते हों तो ऐसे आचार्य तथा शिष्य दोनों का पतन हो जाता है (अतएव सात्विक गुणवाले शिष्य को ही गुरु उपदेश देकर उसे कल्याण प्राप्ति करवा सकता है तथा ऐसे ही शिष्य रखना उचित है)॥७८॥ अपरीक्ष्य चिरं क्षेत्रं यः परं ज्ञानमावहेत् । प्रमाद्यतः सुगोप्तव्ये परमार्थोऽस्य हीयते ॥७९॥ इसीलिये शिष्यरूप क्षेत्र की बिना चिरकाल तक परीक्षा के ही जो उसमें परमार्थसाधक परम ज्ञानरूप बीज का आधार उपदेश द्वारा सम्पन्न करता है तो अत्यंत गोपनीय मोक्षोपायभूत ज्ञान के प्रदानरूप प्रमाद करने से उस आचार्य की भी
१४० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अपने उद्देश्य या परमप्रयोजन में हानि होकर प्रमादवश पतन हो जाता है॥७९॥ न्यासे हि देहिनोऽपायैर्जायते प्रच्युतिः फलात् । वार्यत्याप्रशमनात् सा हि सद्भ्यवहार्यताम् ॥८०॥ किसी शिष्य के द्वारा आत्मा के प्रपत्तिरूप न्यास के सम्पन्न करने पर भी बाद में उपायों के प्राकृतजन संसर्गादि से बन जाने पर श्रीहरि के दास भाव की प्राप्तिरूप फल से प्रच्युति से उद्दिष्टार्थ से वंचित होना पड़ता है, अतएव प्रायश्चित्तादि से प्रशमन कर्म के आचरण तक वह प्रायश्चित रूप में शिष्टजन से बहिष्कृत होकर रहेगा तथा इस समय वह भगवत् कैङ्कर्य के अधिकार से हीन भी हो जाएगा ॥८०॥ यज्ज्ञानपूर्वं न्यसनं मन्त्रेण गुरुणा हरौ । स एव सर्वसंस्कारः प्राक्तस्मात् प्राकृताः नराः ॥८१॥ आचार्य के द्वारा मन्त्रार्थ के ज्ञान को देते हुए जो शरणागति मन्त्र से श्रीनारायण के प्रति प्रपत्ति या न्यासयोग के साथ शिष्य का समर्पण करवाया जाता है उस सभी पूर्ण संस्कार के किये गये विधान से पूर्व वह जन अवैष्णवभूत था, अतः वह तब तक प्राकृत जन था॥८१॥ प्राकृताद्यैः परिहृतो निवसेन्नासहायवान् । वसँश्चाभ्यन्तरान् प्राज्ञः संसर्गान् परिवर्जयेत् ॥८२॥ न्यासयोग प्राप्त शिष्य अकेली ही रहे वह प्राकृतादि की संगति से दूर रहे तथा अपनी कुशलबुद्धि के साथ इनसे व्यवहार रखते हुए किसी आंतरिक संसर्गवाला व्यवहार भी (जैसे साथ रहना एक साथ शयन तथा भोजन आदि व्यवहार) नहीं रखे॥८२॥ श्रद्धापूतमवैद्यस्याप्यन्नाद्यं तु कदाचन । इज्यासु विनियुञ्जीत न श्राद्धे सति किञ्चन ॥८३॥ अवैष्णवभूत श्रीहरि की प्रपत्ति न पाने वाले किसी प्राकृतजन का श्रद्धावश अर्पित अन्न (पक्व या अपक्व) या किसी श्राद्ध कर्म के या सामान्यरूप में यज्ञादि के प्रसंग में अनापत् या आपत् स्थिति में भी उपयोग न करे (इस अवैष्णव दत्त अन्न का भोजनादि में लेना या उपयोग भी फल प्राप्ति में बाधक समझना चाहिए)॥८३॥ गुणासहास्त्यजन्त्यार्या न सन्तश्चिरमंहसे । दोषासहास्त्यजन्त्येव सन्तश्च श्रेयसे परान् ॥८४॥ आर्यजन या सज्जन किसी के गुणवश ही उसका चिरकाल तक पातकादि के चलाने
हिन्दीटीकासहित १४१ पर उसका परित्याग करना उचित मानकर बाद में उसे छोड़ते हैं और दोषों को देखकर सज्जन रहने पर भी उसी के लिये प्रायश्चित्तादि आचरण के काल में उसका परित्याग करते हैं॥८४॥ धर्मच्छद्मभृतो धर्मान् घ्नन्ति वेदपराङ्मुखाः । वैदिकाभास्तथा वेदान् कृष्णैकान्त्यपराङ्मुखाः ॥८५॥ वेद प्रतिपादित धर्म से हटकर चैत्यवन्दनादि बौद्ध धर्म का ज्ञान तथा आचरण करने (या उस पर आस्था रखने) वाले केवल धर्म का छद्म् धारण करते हुए (धार्मिक होना दिखलाते हुए) धर्मों का (ज्योतिष्टोमादि सत्रो का जो कि धर्म प्राप्ति के आधार हैं) हनन करते हैं तथा जो परमार्थतः वैदिक नहीं होकर भी अपनी वैदिक स्थिति दिखला कर वेदों का हनन करते हैं ये श्री नारायण के एकान्त्यभाव में बाधक रहने से उसके प्रतिपक्षी (ही) समझना चाहिए॥८५॥ य आत्मनां परो वेद्यस्तं विष्णुं वेदयन्ति यत् । तद्वेदानां हि वेदत्वं यस्तं वेद स वेदवित् ॥८६॥ जिनसे चेतनभूत जीवात्माओं से उत्कृष्ट ज्ञानवेद्य परमात्मरूप श्रीविष्णु का ब्रह्मरूप में ज्ञान प्राप्त हो यही वेदों की सत्ज्ञानवत्ता है तथा जो वेदों के अनुशीलन से इसी रहस्यभूत ज्ञान की प्राप्ति करे वही वेदवेत्ता है। तथा इससे भिन्न तत्वों के विज्ञाता वेद के वेत्ता नहीं वे वेदविद्यघातक हैं॥८६॥ दर्शयन्त इव श्रेयो विप्लुतैर्हेतुभिर्बलात् । च्यावयन्ति श्रुतिपथात् दूरं बाह्याः स्थिरानपि ॥८७॥ हेतुवादिक अवैष्णव व कुदृष्टि रखनेवाला विद्वान् (बौद्धादि दार्शनिक) स्खलनशील हेत्वाभास जैसे हेतुओं को अपने बुद्धिबल से श्रेयस्कारी दिखलाते हुए स्थित श्रद्धाभक्तिवाले बुधजन को भी स्थिर सिद्धान्तवाले वेदमार्ग से दूर हटाकर वे उन्हें अपथगामी बना देते हैं॥८७॥ वैदिका इव चाप्यन्ये दर्शयन्तोऽन्यथा श्रुतेः । अर्थमच्युतकैङ्कर्याच्च्यावयन्ति कुदृष्टयः ॥८८॥ कुछ विद्वान् वेद का अनुगमन करनेवाले होने से वेद के आशयों को अपनी तार्किक बुद्धि के बल से अन्यरूपों में दिखलाने वाले कुदृष्टि होकर अच्युत के कैङ्कर्यभाव से दृढ़भक्ति वैष्णवों को भी भटका देते हैं॥८८॥ तस्मात् कुदृष्टिभिर्बाह्यैरप्रकम्प्यो गतव्यथः । ऐकान्त्यममलं विष्णोरातिष्ठेत् परमं सुधीः ॥८९॥ अतएव बुद्धिमान् स्थिर भक्तिवाला एकान्ती बाह्यजन की ऐसी हेतु प्रदर्शन तार्किक ६
१४२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता कुदृष्टियों से अपने धर्म से न हटे तथा बिना किसी कथा के श्रीहरि के परम एकान्त्यभाव में दृढ़ता से स्थिर रहे तथा अपने धर्मादि का पालन करत रहे॥८९॥ नास्तिकः संशयी मूढ इत्यदूरतरा नराः । विज्ञाय लक्षणैस्तांस्तु सम्यग् व्यवसितस्त्यजेत् ॥९०॥ अपने साथ रहने वाले निकटस्थ नास्तिक, सन्देहशील तथा मूढ़मति के मनुष्यों क उनके लक्षणों से भली प्रकार समझते हुए ऐसे सभी कुदृष्टि जन को निश्चय क उनका साहचर्य तथा संगादि छोड़ देवे॥९०॥ मत्प्रत्यक्षन्तदेवास्ति नास्त्यन्यदिति निश्चिताः । अर्थकामपराः पापा नास्तिका देहकिङ्कराः ॥९१॥ जो मुझे प्रत्यक्ष हो वही विद्यमान या सत्य है तथा अन्य पदार्थ या ईश्वरादि अप्रत्यक्ष तत्व कुछ भी नहीं है ऐसा निश्चय दिखलाने वाले अर्थ तथा कामरूप पुरुषार्थ के सेव में रत रहनेवाले अपने शरीर के धर्म के जो दास हैं वे ‘नास्तिक’ है (तथा कुदृष्टि हैं)॥९१॥ नानाविधेषु ज्ञानेषु नराः संशयिनोऽधमाः । निश्चयं नाधिगच्छन्ति लिङ्गमात्रधराः क्वचित् ॥९२॥ इसी प्रकार अनेक प्रकार के शास्त्रज्ञानों के कारण परस्पर विपरीत कथ्यों को प्राप कर संशय में स्थित रहनेवाले होकर किसी निश्चय पर नहीं पहुँचने से ‘संशयी’ तथ अधमजन हैं। इसके अतिरिक्त कुछ व्यक्ति केवल अपने मत के अनुक वस्त्रादिवेषधारी मात्र होते हैं॥९२॥ देहात्मस्वर्गनरकपुण्यपापाविमर्शनः । गतानुगतिका मूढा नश्यन्ति पशुबुद्धयः ॥९३॥ कुछ देहात्मवादी, स्वर्ग, नरक, पुण्य तथा पाप के विचार से शून्य होते हुए केव अपने प्रविचारित मार्ग में स्थित रहनेवाले अज्ञानी हैं जो, इस वृत्ति के कारण पशु समान विवेक रहित हैं। ऐसे सभी प्रायः मोक्षप्राप्ति के अपात्र होने से अन्त में ना प्राप्त करते हैं॥९३॥ कुदृष्टयो बहुविधा वृथा वैदिकमानिनः । तथा मिथ्यादृशो बाह्याः सर्वैरेवावृतञ्जगत् ॥९४॥ नास्तिक एवं कुदृष्टिजन के अनेक प्रकार होते हैं। कुछ वृथा ही अपने को वेदज्ञान सम्पन्न मानने वाले वैष्णवविरोधी हैं, इसी प्रकार कुछ हेतु आदि के प्रयोगों मिथ्यादृष्टि का निर्माण करनेवाले बाह्य विद्वान् हैं (अवैदिकजनक)। इस प्रकार
हिन्दीटीकासहित १४३ अनेक जन से संसार आच्छादित है। अतः ठीक से इस आवरण में से अपने दृष्टि प्रकाश के अनुसार परीक्षा कर ऐसे मनुष्यों की संगति से दूर रहें॥९४॥ वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञाः नारायणपरायणाः । धन्याः केचन तेभ्योऽपि तेषामादेशवृत्तिनः ॥९५॥ और जो वेद तथा वेदांगो के तात्त्विक आशयों के विज्ञाता हों, जो श्रीनारायण के प्रति वेदों की निष्ठा के जानने वाले हैं, वे ही धन्य हैं तथा उनसे जो उपदेश लेकर वृत्ति में स्थित हो वे भी धन्य हैं तथा दुर्लभ हैं॥९५॥ आदिष्टाः पुण्ड्रमन्त्रार्चा-नाम-ताप-पराङ्मुखाः । धूतावधूतनिर्धूत-विधूतोद्धृत-संज्ञकाः ॥९६॥ जो वैष्णवाभिमत पुण्ड्र, मन्त्र, अर्चा, नाम, ताप नामक पंचसंस्कारों से रहित हैं उन्हें क्रमशः धूत, अवधूत, निर्धूत, विधूत तथा उद्धृत के रूप में शास्त्रकारों ने बतलाया है॥९६॥ आदिष्टा एव चान्यार्चामन्त्रपुण्ड्राङ्कनामकाः । राक्षसासुरवेताल-व्याल-प्रेता नराधमाः ॥९७॥ इसी प्रकार जो अन्य अर्चानादि में लीन हैं उन्हें राक्षस, अन्य मन्त्रादि का जपादि करने वाले असुर, अन्य पुण्ड्रादि धारी बेताल, अन्य देवता के शस्त्रादि चिन्हों के धारण करनेवाले व्याल तथा अन्य नाम को धारण करनेवाले 'प्रेत' हैं, ऐसा भी आगमादि शास्त्रों में निर्दिष्ट किया गया है॥९७॥ तथा स्वकर्मशास्त्रेशगुरु-सत्सङ्गवर्जिताः । ऊना हीना स्रस्ता नष्टा दग्धा ज्ञेयास्समाख्यया ॥९८॥ भिन्नोऽन्यनाथो भिन्नोऽन्यफलो भिन्नोऽथनिन्द्यकृत् । भग्नोऽन्यदेशिकादेशोऽनृतोऽन्यजनसंश्रयः ॥९९॥ इसी प्रकार जो अपने कर्म तथा विहिताचार से हीन हों वे 'ऊन' शास्त्र तथा दृष्टि से रहित वे 'हीन', जो इष्ट श्रीश से रहित हैं वे 'स्रस्त' जो गुरु प्राप्ति से वंचित हैं वे 'नष्ट', जो सत्संग से हीन है वे 'दग्ध' इन नामों से भी शास्त्रकारों ने दिखलाये हैं। इसी प्रकार जिसका आराध्य अन्य देवता हो वह 'भिन्न' जिसका फल मोक्ष से अन्य है वह 'अन्यफल, और जो निन्द्य कर्मकारी है वह 'निन्द्य' जो अनेक विद्वान् गुरुजन की आज्ञाएं माने वह 'भग्न' तथा जो दूसरे देवताओं का यजन करे वह 'अनज्ञ' नाम से शास्त्र में दिखलाया गया है॥९८-९९॥
१४४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता निहीनान् प्राकृतेभ्योऽपि प्रच्युतान् परिवर्जयेत् । भक्ताणाराधयन् विष्णोः प्राप्नोति परमं पदम् ॥१००॥ इति नारदपञ्चरात्रे भारद्वाजसंहितायां परिशिष्टे तृतीयोऽध्यायः प्राकृतजन से भी हीन ये सभी प्रच्युत कहलाते हैं अतः इनसे अपने को दूर रखते हुए तथा श्रीविष्णु की तथा इनके भक्तजन की आराधना करते हुए श्री विष्णु के परमपद मोक्ष को प्राप्त करना चाहिए॥१००॥ नारद पंचरात्र भारद्वाज संहिता के परिशिष्ट की तत्वप्रकाशिका व्याख्या का तृतीयाध्याय समाप्त
हिन्दीटीकासहित १४५ परिशिष्टे चतुर्थोऽध्यायः ४ पुनरेवं मुनिश्रेष्ठं पप्रच्छुस्ते महर्षयः । कथं निक्षेपता वृत्तिर्विस्तारोऽस्याश्च कीदृशः ॥१॥ अथ चतुर्थाध्याय सभी महर्षिगण ने यह सुनकर फिर एक प्रश्न भारद्वाजमुनि से किया कि हे मुने! आत्मनिक्षेप के बाद अनुष्ठेय वृत्ति या आचार कैसा रखा जाए तथा इसका विस्तृत तथा तात्विकरूप क्या होता है॥१॥ भरद्वाजो महातेजाः श्रुत्वा तेषामिदं वचः । प्रत्युवाच परं हृष्टो भगवद्दास्यतत्ववित् ॥२॥ तब महातेजस्वी भरद्वाज मुनि ने उन महर्षियों के इस प्रकार के वचनों को सुनकर प्रसन्नता से हर्षित भाव में भरकर भगवद्दास्यभाव के तात्विक ज्ञान के आधार पर इस प्रकार कहा॥२॥ विशुद्धज्ञानसलिलां भक्तिकल्लोलमालिनीम् । सत्सेवनस्वादुरसां दिव्यलक्षणवारिजाम् ॥३॥ वैराग्यतीरसुभागामाचारोपवनावृताम् । वृत्त्यापगां निषेवध्वं विष्णुसागरगामिनीम् ॥४॥ हे महर्षिजन! यह वृत्तिरूप नदी ही सेवन के योग्य तथा अनुष्ठेय है। क्योंकि इसमें शुद्ध ज्ञानरूप दृष्टि ही जल है, भक्ति रूपी लहरों की मालाओं से यह भरी हुई है, सत्सेवनरूप स्वादु इसका आस्वाद है, दिव्य लक्षणों वाले ताप, पुण्ड्रादि कमल खिले हुए हैं, वैराग्य के तीर से जो रम्य भाववाली है, विहित आचाररूपी उपवनों से जो वेष्टित है और जो विष्णु रूपी सागर की ओर जाने वाली है (इसका सेवन करना चाहिए)॥३-४॥ न्यासतीर्थाभिगमनं सुदृष्टिर्यजनं हृदि । स्वकर्माण्यासनाविधिर्लक्ष्मावाहनसत्क्रिया ॥५॥ भक्तिस्तु विविधा भोगाः सत्सेवा हविरुत्तमम् । वैराग्ययोगनिर्विघ्ना यजध्वमनयेज्यया ॥६॥
१४६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता यह भगवदाराधनारूप वृत्ति ही इज्या (यजन, त्याग) है अथा अनुष्ठेय भी हैं क्योंकि इसमें प्रपत्तिरूप न्यास ही आरम्भक (ज्ञान) हेतु तीर्थाभिगमन होता है (जिसमें ज्ञान से हृद्याग पर्यन्त अङ्ग है,) जहां सुदृष्टि ही हृदयजन है, अपने कर्मों में विहित आचार ही जहां आसनविधि है। जिसमें लक्ष्य, आवाहन, मन्त्र, ज्ञान, अलंकार, भोग्य, पर्यङ्क आदि सत्कार है। भक्ति जहां अनेक विद्य गन्ध, माल्यादि भोग हैं, जहां उत्तम हविरूप है, वैराग्य ही जहां योग रूप ध्यान है, जिससे विघ्न दूर हो जाते हैं (वैराग्य के उपाय से जो विघ्नरहित है) ऐसी इस वृत्तिरूप इज्या से यजन किया जावे॥५-६॥ भूमाविव परे पुंसि न्यस्त-बीजबदात्मनि । विज्ञान-मूल-सन्तानः क्रियाचारनिबन्धनः ॥७॥ भक्ति-प्रकाण्ड-विस्तारो वैराग्यरसपेशलः । नाना-लक्षण-पुष्पाढ्यः सत्सेवनमहाफलः ॥८॥ उच्चैस्तरोऽतिविपुलः सर्वसन्तापनाशनः । सम्पद्यते सदा सेव्यो हरि-कैङ्कर्य-पादपः ॥९॥ यही वृत्ति एक ऐसा वृक्ष है जिसकी आधाररूप भूमि परमपुरुष श्रीविष्णु है जिनमें न्यस्त आत्मा बीज के समान है, जिसकी विज्ञान रूप दृष्टि ही मूल (जड़) स्थानीय है जो परम्पराशूप है, जिसकी विहित आचार रूप क्रियाएं उस जड़ की दृढ़ता तथा सुरक्षा के लिये बनाया गया पाला तथा उसके आसपास की वेदिका है, जिसकी शाखाओं का विस्तार भक्ति है, जो वैराग्य के रस (जलसेक) से जमा हुआ होकर मजबूत हो रहा है, अपने ताप, पुण्ड्र आदि लक्षणों वाले इसके सुन्दर पुष्प हैं, जो सन्तों की सेवा रूप पुष्ट फलों वाला है, जो आकाश तक ऊंचाई में फैला हुआ तथा बड़ा ही विशाल आकारवाला है तथा जो अपनी छाया से सभी आश्रित विश्राम लेने पथिकों का सभी त्रिविध सन्ताप दूर करनेवाला है तथा जो श्रीहरि का दास्य रूप वृक्ष है। अतः इस ऐसे वृक्ष का ही सेवन सर्वदा करना चाहिए॥७-९॥ आदौ गुरूणां विज्ञानमथ तन्त्रार्त्तचिन्तनम् । तत एवात्मनो ज्ञानं तद्धर्माणाञ्च सर्वशः ॥१०॥ परस्य पुंसः श्रीशस्य परेशस्य परात्मनः । स्वरूप-रूप-विभव-गुण-व्यापार-चिन्तनम् ॥११॥ परिबर्ह-विभूषास्त्र-पत्नी-परिजनात्मनाम् । सर्वेषाञ्चैव दिव्यानां गुणानामनुचिन्तनम् ॥१२॥ इसमें सर्वप्रथम अपने तत्ववेत्ता आचार्य के समीप उपसर्पण से आचार्य रूप का ज्ञान
हिन्दीटीकासहित १४७ तथा आगे उनसे तन्त्र (शास्त्र) के उपदेश रूप अर्थ का चिंतन तथा इसी से स्वयं का आत्मज्ञान एवं उसके सभी धर्मादि का ज्ञान होना, जिससे परम पुरुष रूप श्रीश जो ब्रह्मारुद्रादि के नायकभूत हैं तथा परमात्मा हैं, उन सर्वान्तरात्मा का ज्ञान तथा उनके दिव्यस्वरूप का, उनके विग्रहादि रूप का, उनकी विभूतियों तथा गुणों का तथा उनके कार्यादि का ज्ञान होना, श्रीहरि के गुणों में उनके अवतारादि कार्यों में धारण किये जाने वाले भूषणादि, अस्त्र तथा उनकी पत्नी तथा उनके परिवारजन का ज्ञान तथा उनके दिव्य गुणों तथा कार्यों (जैसे हिरण्यकशिपु, रावण, शिशुपालादि के संहार करने के कार्यों) का चिन्तन करना॥१०-१२॥ विमानमण्डपोद्यानवापीकूपादिशालिनः । नानाश्चर्यमयानन्त-दिव्यप्रासादमालिनः ॥१३॥ साप्सरो भूरिसङ्घस्य सदिव्यमृगपक्षिणः । पुरस्य दिवि लोकानां लोकस्य परिचिन्तनम् ॥१४॥ तथा भगवतो व्यूहविभवार्चा-व्यवस्थितेः । अन्तःस्थितेश्च जगतां सृष्ट्यादेश्च विचिन्तनम् ॥१५॥ इसी क्रम में आगे ऐसे पुरी (नगरी) का जिसमें विमान, मण्डप, उद्यान, वापी तथा कूप विद्यमान है, जिसमें अनेक आश्चर्यकारी, अनन्त एवं दिव्य प्रासाद (मन्दिरों) की पंक्तियों से (जो) शोभित हैं, जहां अप्सराओं से पूर्ण अनेक समुदाय विद्यमान है, जहां दिव्य मृग तथा पक्षिगण हैं ऐसे दिव्य लोक (स्वर्ग) के निवासीजन तथा लोक का चिन्तन किया गया है। इसी प्रकार जहां भगवान् श्रीवासुदेव तथा इनके चतुर्व्यूह उनके रामादि अवतार मय विभव, अर्चा में श्रीवैकुण्ठनाथादि की व्यवस्था तथा जगत् में अन्तर्यामित्व तथा सृष्टि, प्रलयादि का विचार है॥१३-१५॥ प्रधानमहदादीनां तत्त्वानामवबोधनम् । अण्डानां कालतत्त्वानां लोकानां भूतसंहतेः ॥१६॥ जहाँ प्रकृति तथा महत् तत्व, इन्द्रिय तथा तन्मात्रादि तत्वों का स्वरूप, ब्रह्माण्डों लोकों तथा काल तत्वों, पञ्चमहाभूतों तथा उनसे उत्पन्न जन्तुगण का भी विचार करना है॥१६॥ परसम्बन्धविज्ञानं प्रकृतेः पुरुषस्य च । कर्मयोगस्य विज्ञानं धर्माणाञ्चाप्यशेषतः ॥१७॥ ज्ञानयोगस्य विज्ञानं भक्तियोगस्य चाखिलम् । तथैव न्यासयोगस्य साङ्गस्य परिचिन्तनम् ॥१८॥ प्रकृति तथा पुरुष के भगवत्शरीर स्वरूप तथा सम्बन्ध का विशेष चिन्तन, कर्मयोग
१४८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता तथा विशेषरूप में धर्मों का चिन्तन, इसी प्रकार ज्ञानयोग तथा भक्तियोग का समग्र विचिन्तन करना और बाद में सांग समग्र न्यासयोग विषयक विवरण तथा इस विषय पर चिन्तन करना॥१७॥१८॥ इहैव फलरूपाया वृत्तेः सम्यक् प्रदर्शनम् । देहान्निष्क्रमणस्यापि मार्गस्य च विचिन्तनम् ॥१९॥ इस लोक में फल प्राप्ति रूप वृत्ति के पूर्णरूप से विवरण के बाद इस शरीर के छोड़ने के पश्चात् निष्क्राम प्राप्त जीव के अर्चिरादि मार्गों से उत्तमकान्तिरूप यात्रा का चिन्तन॥१९॥ दिव्यलोकस्य सम्प्राप्त्या भर्तुरालोकनार्चया । निरस्तातिशया प्रीतिः सदा तस्याश्च भावना ॥२०॥ जीवकी यात्रा के क्रम में उसका दिव्य लोक की प्राप्ति तथा अपने स्वामी इष्ट देश परमेश्वर का जो परमपद के साधन भी हैं-दर्शन प्राप्ति से निरवधि प्रीति तथा उसकी स्थिति का चिन्तन॥२०॥ भगवच्चरणाम्भोजानुभवप्रीतिजन्मनः । कैङ्कर्यस्य परा काष्ठा या तस्याश्च विचिन्तनम् ॥२१॥ और आगे दिव्यलोक में अवस्थित श्रीमन्नारायण के चरण कमलों का दर्शन, सेवा का अनुभव तथा उससे होनेवाली प्रीति की उत्पत्ति से दासभावना की परमानन्दा दात्री स्थिति की पराकाष्ठा का विचार॥२१॥ अनादेर्मोहकलनात् संसारावृत्तिहेतवः । प्रभवन्त्यात्मनां कर्म-वासनारुचयो यथा ॥२२॥ यथा रागादयो दोषा नित्यं चात्मगुणच्छिदः । कारणान्यपचारेषु क्षिपन्ति च तथा मतिः ॥२३॥ इसी क्रम में अनादिभूत माया (अविद्या) के सम्बन्ध में संसार में बार बार आकर जन्म प्राप्त करने के कारणभूत कर्मों की वासना तथा रुचि जैसी उत्पन्न होती है तथा अहिंसा आदि अध्यात्मगुणों के अनुरोधक राग आदि पुण्य पापकर्मादि के द्वारा संसार के बीजभूत तत्व बनकर दोषरूप में आते हैं तथा वे ही कारण होकर जीव को ऐसे अपचारों (पातकादि दोषों) में गिरा देते हैं, कैसी बुद्धि के उत्पन्न हो जाने की चिन्तना॥२२-२३॥ विमर्श इह दुःखानां यातनानां परत्र च । विषयाणाञ्च हेयत्वदर्शनं दृष्टिरुच्यते ॥२४॥ इस लोक में प्राप्त होनेवाली दुःखोंकी तथा परलोक में प्राप्त होनेवाली यातनाओं
हिन्दीटीकासहित १४९ का विचार तथा सुखदुःखादि सांसारिक विषयों की हेयता का प्रतिपादन करना आदि ये सभी 'दृष्टि' कहलाते हैं॥२४॥ सैषा सुदृष्टिर्वृत्याख्यतरोर्मूलमुदाहृता । अतोऽन्यथा कुदृष्टिर्हि तस्य सा मूलघातिनी ॥२५॥ यह दृष्टि ही इस वृत्तिभूत पूर्व कथित वृक्ष की मूल या जड़ मानी गयी है तथा इसके विपरीत दृष्टि कुदृष्टि कहलाती है जिससे मूल का ही विघात माना गया है॥२५॥ प्रथमासनसंस्कारो निषेको विधिपूर्वकः । संस्कारास्त्वाव्रतादेशात् तत्र भोगक्रमा हरेः ॥२६॥ वृत्तिरूप वृक्ष का मूलबन्ध तथा विहिताचार भगवदिज्या आदि के विचारक्रम में सर्वप्रथम वेदादि शास्त्राविधि से विहित गृहाश्रम में होनेवाला गर्भाधान संस्कार तथा इसी के आगे व्रतादेश तक के (पुंसवन, सीमान्तोन्नयन, जातकर्म, नामकर्म, अन्नप्राशन, चौल तथा उपनयनादि व्रतबन्ध तक) संस्कारों का उपचारक्रम श्रीहरि के उपचार के क्रम में प्रथम संस्कार माना गया है॥२६॥ द्वितीयमासनं विष्णोरस्योपनयनक्रिया । ज्ञानान्तास्तत्र संस्कारा बोद्धव्या भोगसम्पदः ॥२७॥ इसके आगे श्रीहरि के उपचार क्रम के द्वितीय संस्कार के क्रम में इसका उपनयन क्रिया से लेकर वेदारम्भ तथा समावर्तन पर्यन्त संस्कार इसके भोग सम्पत्ति के क्रम में ज्ञानासन के रूप में आते हैं॥२७॥ वैवाहिको विधिर्धर्मो यस्तृतीयं तदासनम् । गृहस्थधर्मा ये तत्र ते प्रसाधनविग्रहाः ॥२८॥ तथा धर्मभाव से अनुष्ठित विवाह संस्कार तृतीय आसन रूप है जहां गृहस्थों के आचार योग्य धर्मों का पालन होना प्रसाधनभूत अलंकार सदृश उपाचार क्रम में श्रीहरि के आता है॥२८॥ योगक्षेमविधिर्नित्यस्तच्चतुर्थमिहासनम् । ततः परेऽखिला यज्ञा हविषां विनिवेदनम् ॥२९॥ वनस्थाश्रमसम्प्राप्तिर्हरेः पञ्चममासनम् । नियमा ये च तत्र स्युस्ते वै भोगास्तदाश्रयाः ॥३०॥ इस गृहस्थ की वृत्ति के लिये भोग्यासन के रूप में जो अर्थार्ज्जनरूप योगक्षेम विधिवत् नित्य अपेक्षित है तथा जिसमें अग्निष्टोमादि यज्ञों के द्वारा (श्रीहरि एवं देवगण को), हवि समर्पण करने के आचारभूत कर्मवाला श्रीहरि के उपचार का आसन चतुर्थ स्थानीय
१५० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता है। इस आश्रम के आगे वानप्रस्थ के प्राप्त हो जाने पर वह श्रीहरि के उपचारभूत रूप में पंचम आसन (होता) है जहां वन में स्थित रहकर आश्रम के नियत तथा उनके अनुरूप पदार्थों का भोगरूप में सेवन करना विहित है॥२९-३०॥ यत् प्रव्रजन्ति तत् षष्ठमासनं परमात्मनः । योगाख्यमतुलं शुद्धं तद्धर्मास्तित्र सत्क्रियाः ॥३१॥ इसके बाद अधिकारानुरूप जो प्रव्रजनरूप (सन्यास नामक) आश्रम है वह परमेश्वर के उपचार क्रम में षष्ठ स्थानीय है जिसका नाम योगसंस्कार है जो परमशुद्ध तथा अतुलनीय है। सन्यास के धर्मों में किये जाने वाले कर्मभूत उपचार सद्धर्मानुष्ठानरूप है जहां सत्सेवा की जाए॥३१॥ सतामुत्क्रमणादेश्च कर्तव्या विधयः परे । उद्वासनोपचारा वै भवन्ति दिवि शार्ङ्गिणः ॥३२॥ अग्नौ तु परमे व्योम्नि ध्यायेतां नित्यमच्युतम् । वैश्यत्वे चार्णवगतं शूद्रत्वे तु भुवि स्थितम् ॥३३॥ ऐसे सन्त के प्राणों के उत्सर्ग के उपरान्त उसकी उत्तरकालिक विधियों को सम्पन्न करना चाहिए। जिसमें श्रीहरि को अर्पित उद्वासनादि उपचार होते हैं। इसमें अग्नि तथा परम आकाश में स्थित अच्युत का ध्यान करते हैं (क्रमशः) ब्राह्मण तथा क्षत्रिय के लिये और वैश्य के लिये समुद्र में स्थित तथा शुद्र के लिये पृथ्वी पर स्थित अच्युत का ध्यान करते हैं॥३२-३३॥ इत्थं वर्णाश्रमादीनां नित्यनैमित्तिकादिकम् । विहितं कर्म सकलं विष्णोराराधनं परम् ॥३४॥ इस प्रकार वर्ण तथा आश्रम आदि के नित्य एवं वैमित्रिक सम्पूर्ण विहित कर्म श्री विष्णु की परमाराधना है॥३४॥ निबोधत महाप्राज्ञस्तदेतदखिलं पुनः । वृत्त्याख्यस्य तरोरेव सुदृढं मूलबन्धनम् ॥३५॥ हे मुनिगण! इस सभी को निश्चित रूप में आपको समझाना आवश्यक है जो कि वृत्तिनामक वृक्ष के सुदृढ़ मूलबन्ध के रूप में सदा अव स्थित है॥३५॥ त्यागेन कर्मणां स्वस्य निषिद्धकरणेन च । आज्ञातिक्रमणं यत् तन्मूलबन्धोपघातकम् ॥३६॥ तथा अपने विहित कर्मों के परित्याग से तथा कर्मों के आचरण करने से जो श्रीहरि की आज्ञा का अतिक्रमण होता है वह वृत्तिवृक्ष के मूल बन्ध का उपघात करनेवाला होता है॥३६॥
हिन्दीटीकासहित १५१ विहितैवमुपावृत्तिर्विशुद्धपरिवारके । विशुद्धे ब्रह्मणि परे प्रीत्या सा भक्तिरुच्यते ॥३७॥ अतएव विशुद्ध भावादि सम्पन्न परिवारवाले (देवतान्तर्यामिभाव सहित) अपने स्वरूप में अवस्थित परब्रह्म में जो वृत्ति आराधनात्मक रूप में विधिपूर्वक बतलायी गयी है वही, अतिप्रीति से सम्पन्न की जाए तो भक्ति कहलाती है॥३७॥ श्रुतिस्मृतीतिहासाद्यैर्दिव्यार्षागमविस्तरैः । ब्रह्मसूत्रपदैर्मन्त्रैः सन्निबन्धैः सयुक्तिभिः ॥३८॥ नाथस्य रूपविभवस्वरूपगुणकर्मणाम् । कीर्तनं ख्यापनं चिन्ता भृशं व्यक्तिषु चादरः ॥३९॥ स्तुतिर्नतिः परिक्रमः प्रीतिरात्मनिवेदनम् । उपहाराच्छेषरतिः समीपपरिवर्तनम् ॥४०॥ दिव्यार्चायतन-ग्राम-पुर-राष्ट्रादिसम्पदाम् । निष्पादनं तथारामतटाकादि-प्रकल्पनम् ॥४१॥ स्थापनार्चन-यात्रादिमङ्गलानां प्रवर्तनम् । आस्थानासनयोग्यानां पात्रोपकरणस्य च ॥४२॥ स्नानप्रसाधनहविः शय्यान्तः पुरसम्पदाम् । सङ्ग्राममृगयाणाञ्च क्रीडोपकरणस्य च ॥४३॥ दिव्यानां मानुषाणाञ्च सेवकानां पृथक् पृथक् । अन्येषाञ्चैव भोगानां चेतनाचेतनात्मनाम् ॥४४॥ निष्पादनं रक्षणञ्च संस्क्रियोपनयादि च । भक्त्या च नियतौत्सुक्यं स्वयमाराधनक्रियाः ॥४५॥ श्रुति, स्मृति तथा इतिहास पुराण आदि के तथा श्रीहरि के उद्गारभूत वैष्णव तन्त्रादि के, ऋषियों के उपदेशों से प्रवर्तित संहिताओं के विस्तार से ब्रह्मसूत्र के मन्त्रभूत निबन्धनों से तथा विद्वानों के द्वारा निर्मित न्यायतत्व जैसे शास्त्रीय निबन्धों तथा उनकी तर्कपूर्ण युक्ति आदि से श्रीनारायण के रूप, विभव, स्वरूप, गुण तथा कर्मों का जिसमें उनके विग्रह, विभूति, स्वरूप, गुण तथा चेष्टाओं पर विमर्श है तथा उनके नाम का उच्चारण, दूसरे भर को उसका प्रतिपादित रूप प्रख्यापन करना, उसी की चिन्ता रखना तथा अर्चावतार रूप व्यक्तिमें आदर दिखलाना। उन्हीं के स्तोत्र तथा उन्हीं के प्रति प्रणामादि का साष्टांग अर्पण करना, उन्हीं की प्रदक्षिणा करना, स्तुत्यादि से संतुष्ट होकर उनमें प्रीति रखना, उन्हीं के प्रति अपना आत्मनिवेदन प्रस्तुत करना तथा उन्हें ही नवैद्यादि उपहार प्रदान कर उसी के
१५२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अर्पित भक्त अन्न को लेने में रति तथा अर्चावतार के आसपास ही चलते फिरते तथा विद्यमान रहना, दिव्यार्चायतन का निष्पादन अर्थात् निर्माण करवाना (जहां श्रीहरि की अर्चा का धाम न हो), ऐसे ग्राम का, पुर (नगर) तथा राष्ट्र का निष्पादन करना जहां श्रीहरि की अर्चाधाम रहे, तथा इसी प्रकार उपवन, तटाक आदि का श्रीहरि के अर्चाधाम या नाम पर निष्पादन करवाना, श्रीहरि के विग्रह का स्थापन, नित्य आराधन, पक्ष, उत्सव, मासोत्सव आदि के समय श्रीहरि की उत्सवयात्रा या ग्रामप्रदक्षिणादि का निष्पादन करवाना, श्रीहरि के आस्थान या मन्दिर में आसन आदि योग्य वस्तुओं तथा अन्य पात्रादि उपकरणों का दानरूप में निष्पादन करना तथा प्रेरित कर दूसरों से भी ऐसा ही दानादि करवाना तथा उस आस्थान में उपयोगार्थ स्नान, प्रसाधन के उपयोगी पदार्थ या अलंकार, हवि, पदार्थ, शय्यादि वस्तु, अन्तःपुर के उपयोगी समृद्ध उपकरण, संग्राम तथा मृगया के उपयुक्त पदार्थ तथा श्रीहरि के उपयुक्त (श्रीहरि के हेतु) उपकरण भूत पदार्थों का आस्थान में प्रेषण करवाना, इसी प्रकार दिव्य इष्ट के, मानवों के तथा सेवकों आदि के उपयुक्त भोग्य पदार्थों तथा भोज्यपदार्थों का (जो चेतन एवं अचेतन रूप हैं) तदर्थ भिजवाना, इन पदार्थों का उत्पादन करवाना, इनका संरक्षण करना, इनकी संस्काररूप निगरानी करते हुए इन्हें शुद्ध रखवाना, निश्चित उत्सुकता के साथ भक्तिपूर्वक यह सभी स्वयं करने का कार्य भी आराधना किया (भक्ति का कार्य) है॥३८-४५॥ इत्येतत् सकलं काण्डस्कन्धशाखादलाङ्कुरम् । देवतान्तरभक्तिस्तु निरासस्तस्य हाऽशनिः ॥४६॥ इस प्रकार यह भी उस तरु की शाखा, टहनियां, ऊपर पहुंचनेवाली शाखाएं उसके पत्ते तथा अंकुर रूप विस्तार है परन्तु अन्य या अनेक देवताओं की भक्ति इस वृक्ष पर गिरनेवाली बिजली समझाना चाहिए (जो इस वृक्ष को क्षति पहुंचाती है)॥४६॥ अथ पुष्पं फलञ्चास्य लक्ष्म सत्सेवनन्तथा । युक्तोऽप्यन्यैर्विना पुष्पैः फलैरवति कस्तरुः ॥४७॥ इस वृत्तिरूप वृक्ष का 'पुष्प' होता है पंचलक्ष्म (चिन्ह) तथा सत्सेवन इसका फल माना जाता है अतएव यदि वृक्ष पुष्प तथा फल से युक्त न हो तो उसकी रक्षा कौन करेगा (अतः पुष्प तथा फलों के लिये वृक्ष का रक्षण करना आवश्यक है)॥४७॥
हिन्दीटीकासहित १५३ प्रतप्तैर्भगवद्दिव्यायुधैर्गात्रेषु लाञ्छनम् । सततञ्च हरिक्षेत्रोद्भू-मृत्स्नोर्ध्वपुण्ड्रकः ॥४८॥ पद्मबीजमयी माला तुलसीदिव्यचूर्णकम् । पवित्रञ्चाथ कौपीनं व्यतिस्यूता च मेखला ॥४९॥ लक्षणों में शरीर के उपयुक्त स्थानों पर अग्रजन्मा जन को श्रीहरि के प्रतप्त दिव्यायुधों का लाञ्छन अंकित करवाना चाहिए तथा सदैव श्रीहरि के पुण्यक्षेत्रों से लायी गयी मृत्तिका से ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाना चाहिए, कमल के बीजों की बनी हुई माला को तथा तुलसी हरिद्रा के चूर्ण को (मस्तक पर) धारण करना चाहिए, शुभ्र धौत एवं पवित्र कौपीन तथा कटिसूत्र का धारण करना चाहिए॥४८-४९॥ पञ्चायुधाब्जताक्ष्र्यादिलक्षणाभरणादिकम् । वेषश्चानुल्बणः शौक्ल्यं दन्तहृत्पुण्ड्रवाससाम् ॥५०॥ विष्णोस्तत्संश्रयाणांञ्च चेतनाचेतनात्मनाम् । आख्या व्यपदेशश्च लक्षणानि सतां विदुः ॥५१॥ शरीर पर श्रीहरि के पंचायुध शंख, गरुत्मादि लक्षणों वाले अलंकार तथा उष्णीय आदि को धारण करना चाहिए तथा शुक्ल वर्णके सूक्ष्म वस्त्रादि का परिशुद्धरूप में धारण तथा दन्त, हृदयपुण्ड्र तथा वस्त्रों को शुभ्ररूप में रखना तथा श्रीविष्णु के नाम से उन्हीं के आश्रित चेतन तथा अचेतन रूपवाले व्यक्तियों नामों से व्यवहार रखना ये लक्षण संतों के होते हैं॥५०-५१॥ लक्ष्मणामपचारेण विरुद्धानाञ्च धारणात् । कैङ्कर्यामोदसम्पत्तिर्नश्येन्मोहश्च जायते ॥५२॥ इन लक्षणों के धारण न करने पर अपचार से तथा अन्य देवगण के चिन्हादि के धारण करने पर वृत्ति के कैङ्कर्यामोदन सम्पदा का विघात होता है तथा इससे मोह रूप भ्रम की भी सम्भावना (या स्थिति) निर्मित हो जाती है॥५२॥ पत्युर्ज्ञानमयी वृत्तिर्विष्णोः प्रियमिहोच्यते । ये सन्ति तत्र निरतास्ते सन्त इति कीर्तिताः ॥५३॥ सर्वात्मना हि या वृत्तिस्तेषु भक्तिमयी परा । सा भक्तेः परमा काष्ठा वृत्तेश्च परमात्मनि ॥५४॥ आचार्यवद्दैवतवन्मातृवत्पितृवत्स्ववत् । सुहृद्वत् स्वामिवत् सन्तो दृष्टव्या राजवत् तथा ॥५५॥ अब स्वामी श्रीनारायण की ज्ञानमयी तथा प्रिय वृत्ति को बतलाते हैं। जो श्रीविष्णु के आराधक इस इष्टज्ञान की दृष्टि रखते हुए अपने आराध्य में निरत रहें उन्हें
१५४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता सत्जन या सन्त कहते हैं। तथा इनमें जो भक्तिमयी उत्कृष्ट वृत्ति सर्वात्मना अपने इष्ट परमात्मा में पराकाष्ठा तक पहुँच जाती हो वही भक्ति की पराकाष्ठा रूप सद्वृत्ति हैं। संत आचार्यों को समान, अपने आराध्य देव के समान, माता और पिता के समान, अपने विश्वस्त मित्र की तरह, अपने स्वामी के समान तथा अपने शासक नृप के समान देखते हुए उनके अनुरूप प्रीति रखना चाहिए॥५३-५५॥ श्रुत्वैव सहसोत्थानम्प्रत्युत्थानं सुदूरतः । दर्शनानुभवप्रीतिः प्रणिपातोऽभिवादनम् ॥५६॥ इनके आगमन को सुनते ही बिना किसी विलम्ब के अपने स्थान से उठ जाना चाहिए तथा दूर तक आगे चलकर इनकी अगवानी करना चाहिए, इनके दर्शन के साथ अपनी प्रीति का अनुभव तथा उन्हें आदरपूर्वक नमस्कार अथवा अभिवादन करना चाहिए॥५६॥ नीचैः संश्लेषणं हस्तदानं मार्गप्रदर्शनम् । पश्चात्पार्श्वपुरोयानञ्जयालोकाभिभाषणम् ॥५७॥ झुककर विनयपूर्वक उनके हाथ को लेते हुए किसी बात को बतलाना चाहिए तथा बाद में उनकी बाजू से आगे चलकर उनकी जय का उद्घोषण आदि करना चाहिए॥५७॥ गृहोपनयनञ्चान्तर्देशक्रमणमासनम् । पादावनेजनञ्चार्घ्योपहारः स्वागतादि च ॥५८॥ उन्हें अपने निवास पर लाना चाहिए तथा घर के सभी कक्षादि स्थानों पर उन्हें ले जाना चाहिए तथा योग्य आसन पर उन्हें बिठाकर उनके पादप्रक्षालन, अर्घ्योपहार तथा स्वागतादि प्रस्तुत करना चाहिए॥५८॥ प्रसादनं क्षमापणञ्च प्रीतिसङ्कथनानि च । उपासनं प्रश्रयणमात्मात्मीय निवेदनम् ॥५९॥ उनके प्रसादन हेतु प्रसीद जैसे शब्दों का कथन विनयपूर्वक करना चाहिए तथा क्षमा प्रार्थना कर प्रीतिपूर्वक संभाषण करना चाहिए, उनके समीप ही स्वयं को बैठना, विनय तथा आत्मीयभाव का निवेदन करना चाहिए॥५९॥ आज्ञाम्यर्थनमालोकनिर्देशवचनादरः । साधनं सम्पदादिष्टादरोऽनिष्टनिवर्तनम् ॥६०॥ किसी कार्य के होने पर उनसे आज्ञा कीजिये कहना, उनके द्वारा देखने आने पर उनके आज्ञा वचनों पर आदर करते हुए उनके लिये शाकफलादि भोजनयोग्य सामग्री का पकाना आदि कार्य के साथ ( इष्ट आदर तथा उसी से अपना अनिष्ट का
निवारण बतलाना चाहिए)॥६०॥ विरहानर्थपीडावमाननाद्यसहिष्णुता । दास्याभिमानोऽनुव्रज्या श्रवणं कीर्तनं स्मृतिः ॥६१॥ भक्तिज्ञानसमाचारवैराग्याद्यनुमोदनम् । सङ्गेच्छोपगमनमन्वक्स्थानासनादिकम् ॥६२॥ उनके विरुद्ध की, उनकी अर्थहानि की, उनकी पीड़ा की, उनके किसी द्वेषी जन द्वारा किये गये तिरस्कार की असहिष्णुता का निवेदन करना चाहिए तथा उनके दास्य का अपना निश्चय तथा उसका अभिमान बतला कर उसके अनुगमन, उनके योगक्षेम तथा गुणों का श्रवण, स्वयं उनकी बातों का तथा नामादि का उल्लेख कर बात करना तथा उनकी पिछले गौरव का स्मरण करना, उनके द्वारा आचरित या बुद्ध भक्ति, ज्ञान का तथा वैराग्यमय आचारादि का अनुमोदन करना, उन्हीं के उद्देश्य से उनके समीप जाना तथा उनके पीछे स्थित होना, बैठना आदि करना चाहिए॥६१-६२॥ समानसुखदुःखत्वं मिथश्चार्थ-विचिन्तनम् । क्रियाकाले तु वरणं सदस्याग्रे तु पूजनम् ॥६३॥ परिषत्सु च सान्निध्यं संविदाञ्च प्रवर्तनम् । तथास्यानुज्ञापूर्वञ्च सर्वार्थेषु प्रवृत्तयः ॥६४॥ उनके सुख तथा दुःखों में अपनी समान स्थिति निदर्शित करना, परस्पर किसी शास्त्रादि अर्थ पर विचार करना (या उसमें सहयोग करना) स्वयं के यज्ञादि अनुष्ठानों के सम्पादन में उनका योग्य स्थिति में वरण करना, श्रेष्ठ सदस्य के रूप में उनकी अनुरूप अर्चना, परिषद् या सभा में उनके समीप रहना, उनकी किसी शास्त्रादि प्रतिज्ञा के होने पर उनका विषयादि प्रवर्तन करना तथा सभी अपेक्षित कार्यों में उनकी आदेशमयी अनुज्ञा के अनुरूप कार्यों का सम्पादन करना॥६३-६४॥ प्रच्छादनञ्च दोषाणां गुणानां ख्यापनन्तथा । क्वचिच्चैवाप्यधर्मेण कृच्छ्रेणाप्यर्थसाधनम् ॥६५॥ एताश्चान्याश्च विविधा वृत्तयो रसनिर्भराः । विष्णुभक्तेषु वृत्त्याख्यतरोर्हि फलसम्पदः ॥६६॥ उनके स्खलन या दोषों का प्रच्छादन करना तथा गुणों का प्रख्यापन करना तथा आवश्यक होने पर किसी अवसर पर कष्ट के उपस्थित हो जाने पर किसी अधर्म की भी किञ्चिद् वृत्ति का आश्रय लेकर उद्दिष्ट अर्थ साधन कर लेना। ये सभी तथा इन्हीं के
१५६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता समान कुछ दूसरी भी भक्ति से प्रेरित तथा संचालित वृत्तियां है जिनकी प्रवृत्ति रखी जाए। ये ही विष्णु भक्तों में वृत्तिनामक वृक्ष की रसपूर्ण फलवृत्ति या सम्पत्ति कहलाती है॥६५-६६॥ सतामाचार्यमुख्यानामपचाराः पृथग्विधाः । असतामिव संसर्गात्ससूलफलनाशनाः ॥६७॥ सन्तभूत वैष्णव तथा आचार्यों के विषय में होनेवाले अपचारों को अलग रूपवाले समझना चाहिए जो असज्जन के संसर्गवत् मूलसहित फल के विघातक होते हैं॥६७॥ दास्यामृतरसास्वादतृर्षादत्यन्तमेशितुः । वैरस्येन विरुद्धानां हानं वैराग्यमुच्यते ॥६८॥ परमेश्वर श्रीहरि के दास्यरूप अमृत के आस्वादन की तृष्णा के कारण अत्यन्त विरस लगने वाले संसार के त्याग करनेवाला तथा संसार को विघ्न माननेवाला भाव 'वैराग्य' कहलाता है॥६८॥ श्रुतिभिः पञ्चरात्रेण स्मृतिभिस्तत्वदर्शिभिः । दर्शितान्यर्थतत्वानि न हि मन्दधियो विदुः ॥६९॥ ब्रह्मरुद्रमुखा देवा विविधाश्च महर्षयः । मनुष्या नागयक्षाश्च सिद्धविद्याधरास्तथा ॥७०॥ तत्तत्कार्योपपत्त्यर्थ शासनाच्च जगत्पतेः । रजस्तमोऽभिभूत्या च जगुः शास्त्राण्यनेकंशः ॥७१॥ विपरीतार्थतत्वानि क्षुद्रनानाफलानि च । अपवर्गकथावन्ति मोहनान्यद्भुतानि च ॥७२॥ तत्वदर्शीजन के द्वारा वेदादि, पञ्चरात्र, स्मृति, पुराण तथा इतिहासादि के द्वारा दृष्टितत्व या अपेक्षित अर्थों का तात्विक रूप दिखलाया गया है परन्तु उसे मन्दबुद्धि जन तात्विकरस में समझने में अक्षम हैं। अतएव जगत्पति श्रीविष्णु के निदेश के कारण ब्रह्मा तथा रुद्र आदि देवों ने तथा अनेक विभिन्न मतों वाले महर्षिगण ने, मनुष्य, नाग, यक्ष, सिद्ध, विद्याधर आदि ने अपेक्षित अनेक कार्यों तथा प्रयोजनों को प्राप्त करने के लिये तथा रजोगुण एवं तमोगुण से अभिभूत क्रियाओं से युक्त अनेक उपाय भूत ऐसे तन्त्रादि शास्त्रों का कथन किया जिनमें वास्तविकता से परे विपरीत अर्थ तथा तत्वों का मिश्रण भरा हुआ है तथा जिनके लिये अनेक छोटे छोटे उद्देश्यों की पूर्ति देनेवाले फल हैं तथा जिनमें मोक्ष प्राप्ति तक की बाते कहीं हुई हैं, ऐसे अद्भुत एवं बुद्धि को मोहित करनेवाले विवरण या अर्थ उनमें कहे गये हैं॥६९-७२॥