भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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१४४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता निहीनान् प्राकृतेभ्योऽपि प्रच्युतान् परिवर्जयेत् । भक्ताणाराधयन् विष्णोः प्राप्नोति परमं पदम् ॥१००॥ इति नारदपञ्चरात्रे भारद्वाजसंहितायां परिशिष्टे तृतीयोऽध्यायः प्राकृतजन से भी हीन ये सभी प्रच्युत कहलाते हैं अतः इनसे अपने को दूर रखते हुए तथा श्रीविष्णु की तथा इनके भक्तजन की आराधना करते हुए श्री विष्णु के परमपद मोक्ष को प्राप्त करना चाहिए॥१००॥ नारद पंचरात्र भारद्वाज संहिता के परिशिष्ट की तत्वप्रकाशिका व्याख्या का तृतीयाध्याय समाप्त