नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित १४५ परिशिष्टे चतुर्थोऽध्यायः ४ पुनरेवं मुनिश्रेष्ठं पप्रच्छुस्ते महर्षयः । कथं निक्षेपता वृत्तिर्विस्तारोऽस्याश्च कीदृशः ॥१॥ अथ चतुर्थाध्याय सभी महर्षिगण ने यह सुनकर फिर एक प्रश्न भारद्वाजमुनि से किया कि हे मुने! आत्मनिक्षेप के बाद अनुष्ठेय वृत्ति या आचार कैसा रखा जाए तथा इसका विस्तृत तथा तात्विकरूप क्या होता है॥१॥ भरद्वाजो महातेजाः श्रुत्वा तेषामिदं वचः । प्रत्युवाच परं हृष्टो भगवद्दास्यतत्ववित् ॥२॥ तब महातेजस्वी भरद्वाज मुनि ने उन महर्षियों के इस प्रकार के वचनों को सुनकर प्रसन्नता से हर्षित भाव में भरकर भगवद्दास्यभाव के तात्विक ज्ञान के आधार पर इस प्रकार कहा॥२॥ विशुद्धज्ञानसलिलां भक्तिकल्लोलमालिनीम् । सत्सेवनस्वादुरसां दिव्यलक्षणवारिजाम् ॥३॥ वैराग्यतीरसुभागामाचारोपवनावृताम् । वृत्त्यापगां निषेवध्वं विष्णुसागरगामिनीम् ॥४॥ हे महर्षिजन! यह वृत्तिरूप नदी ही सेवन के योग्य तथा अनुष्ठेय है। क्योंकि इसमें शुद्ध ज्ञानरूप दृष्टि ही जल है, भक्ति रूपी लहरों की मालाओं से यह भरी हुई है, सत्सेवनरूप स्वादु इसका आस्वाद है, दिव्य लक्षणों वाले ताप, पुण्ड्रादि कमल खिले हुए हैं, वैराग्य के तीर से जो रम्य भाववाली है, विहित आचाररूपी उपवनों से जो वेष्टित है और जो विष्णु रूपी सागर की ओर जाने वाली है (इसका सेवन करना चाहिए)॥३-४॥ न्यासतीर्थाभिगमनं सुदृष्टिर्यजनं हृदि । स्वकर्माण्यासनाविधिर्लक्ष्मावाहनसत्क्रिया ॥५॥ भक्तिस्तु विविधा भोगाः सत्सेवा हविरुत्तमम् । वैराग्ययोगनिर्विघ्ना यजध्वमनयेज्यया ॥६॥