भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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१४६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता यह भगवदाराधनारूप वृत्ति ही इज्या (यजन, त्याग) है अथा अनुष्ठेय भी हैं क्योंकि इसमें प्रपत्तिरूप न्यास ही आरम्भक (ज्ञान) हेतु तीर्थाभिगमन होता है (जिसमें ज्ञान से हृद्याग पर्यन्त अङ्ग है,) जहां सुदृष्टि ही हृदयजन है, अपने कर्मों में विहित आचार ही जहां आसनविधि है। जिसमें लक्ष्य, आवाहन, मन्त्र, ज्ञान, अलंकार, भोग्य, पर्यङ्क आदि सत्कार है। भक्ति जहां अनेक विद्य गन्ध, माल्यादि भोग हैं, जहां उत्तम हविरूप है, वैराग्य ही जहां योग रूप ध्यान है, जिससे विघ्न दूर हो जाते हैं (वैराग्य के उपाय से जो विघ्नरहित है) ऐसी इस वृत्तिरूप इज्या से यजन किया जावे॥५-६॥ भूमाविव परे पुंसि न्यस्त-बीजबदात्मनि । विज्ञान-मूल-सन्तानः क्रियाचारनिबन्धनः ॥७॥ भक्ति-प्रकाण्ड-विस्तारो वैराग्यरसपेशलः । नाना-लक्षण-पुष्पाढ्यः सत्सेवनमहाफलः ॥८॥ उच्चैस्तरोऽतिविपुलः सर्वसन्तापनाशनः । सम्पद्यते सदा सेव्यो हरि-कैङ्कर्य-पादपः ॥९॥ यही वृत्ति एक ऐसा वृक्ष है जिसकी आधाररूप भूमि परमपुरुष श्रीविष्णु है जिनमें न्यस्त आत्मा बीज के समान है, जिसकी विज्ञान रूप दृष्टि ही मूल (जड़) स्थानीय है जो परम्पराशूप है, जिसकी विहित आचार रूप क्रियाएं उस जड़ की दृढ़ता तथा सुरक्षा के लिये बनाया गया पाला तथा उसके आसपास की वेदिका है, जिसकी शाखाओं का विस्तार भक्ति है, जो वैराग्य के रस (जलसेक) से जमा हुआ होकर मजबूत हो रहा है, अपने ताप, पुण्ड्र आदि लक्षणों वाले इसके सुन्दर पुष्प हैं, जो सन्तों की सेवा रूप पुष्ट फलों वाला है, जो आकाश तक ऊंचाई में फैला हुआ तथा बड़ा ही विशाल आकारवाला है तथा जो अपनी छाया से सभी आश्रित विश्राम लेने पथिकों का सभी त्रिविध सन्ताप दूर करनेवाला है तथा जो श्रीहरि का दास्य रूप वृक्ष है। अतः इस ऐसे वृक्ष का ही सेवन सर्वदा करना चाहिए॥७-९॥ आदौ गुरूणां विज्ञानमथ तन्त्रार्त्तचिन्तनम् । तत एवात्मनो ज्ञानं तद्धर्माणाञ्च सर्वशः ॥१०॥ परस्य पुंसः श्रीशस्य परेशस्य परात्मनः । स्वरूप-रूप-विभव-गुण-व्यापार-चिन्तनम् ॥११॥ परिबर्ह-विभूषास्त्र-पत्नी-परिजनात्मनाम् । सर्वेषाञ्चैव दिव्यानां गुणानामनुचिन्तनम् ॥१२॥ इसमें सर्वप्रथम अपने तत्ववेत्ता आचार्य के समीप उपसर्पण से आचार्य रूप का ज्ञान