भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासहित १४७ तथा आगे उनसे तन्त्र (शास्त्र) के उपदेश रूप अर्थ का चिंतन तथा इसी से स्वयं का आत्मज्ञान एवं उसके सभी धर्मादि का ज्ञान होना, जिससे परम पुरुष रूप श्रीश जो ब्रह्मारुद्रादि के नायकभूत हैं तथा परमात्मा हैं, उन सर्वान्तरात्मा का ज्ञान तथा उनके दिव्यस्वरूप का, उनके विग्रहादि रूप का, उनकी विभूतियों तथा गुणों का तथा उनके कार्यादि का ज्ञान होना, श्रीहरि के गुणों में उनके अवतारादि कार्यों में धारण किये जाने वाले भूषणादि, अस्त्र तथा उनकी पत्नी तथा उनके परिवारजन का ज्ञान तथा उनके दिव्य गुणों तथा कार्यों (जैसे हिरण्यकशिपु, रावण, शिशुपालादि के संहार करने के कार्यों) का चिन्तन करना॥१०-१२॥ विमानमण्डपोद्यानवापीकूपादिशालिनः । नानाश्चर्यमयानन्त-दिव्यप्रासादमालिनः ॥१३॥ साप्सरो भूरिसङ्घस्य सदिव्यमृगपक्षिणः । पुरस्य दिवि लोकानां लोकस्य परिचिन्तनम् ॥१४॥ तथा भगवतो व्यूहविभवार्चा-व्यवस्थितेः । अन्तःस्थितेश्च जगतां सृष्ट्यादेश्च विचिन्तनम् ॥१५॥ इसी क्रम में आगे ऐसे पुरी (नगरी) का जिसमें विमान, मण्डप, उद्यान, वापी तथा कूप विद्यमान है, जिसमें अनेक आश्चर्यकारी, अनन्त एवं दिव्य प्रासाद (मन्दिरों) की पंक्तियों से (जो) शोभित हैं, जहां अप्सराओं से पूर्ण अनेक समुदाय विद्यमान है, जहां दिव्य मृग तथा पक्षिगण हैं ऐसे दिव्य लोक (स्वर्ग) के निवासीजन तथा लोक का चिन्तन किया गया है। इसी प्रकार जहां भगवान् श्रीवासुदेव तथा इनके चतुर्व्यूह उनके रामादि अवतार मय विभव, अर्चा में श्रीवैकुण्ठनाथादि की व्यवस्था तथा जगत् में अन्तर्यामित्व तथा सृष्टि, प्रलयादि का विचार है॥१३-१५॥ प्रधानमहदादीनां तत्त्वानामवबोधनम् । अण्डानां कालतत्त्वानां लोकानां भूतसंहतेः ॥१६॥ जहाँ प्रकृति तथा महत् तत्व, इन्द्रिय तथा तन्मात्रादि तत्वों का स्वरूप, ब्रह्माण्डों लोकों तथा काल तत्वों, पञ्चमहाभूतों तथा उनसे उत्पन्न जन्तुगण का भी विचार करना है॥१६॥ परसम्बन्धविज्ञानं प्रकृतेः पुरुषस्य च । कर्मयोगस्य विज्ञानं धर्माणाञ्चाप्यशेषतः ॥१७॥ ज्ञानयोगस्य विज्ञानं भक्तियोगस्य चाखिलम् । तथैव न्यासयोगस्य साङ्गस्य परिचिन्तनम् ॥१८॥ प्रकृति तथा पुरुष के भगवत्शरीर स्वरूप तथा सम्बन्ध का विशेष चिन्तन, कर्मयोग