नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता तथा विशेषरूप में धर्मों का चिन्तन, इसी प्रकार ज्ञानयोग तथा भक्तियोग का समग्र विचिन्तन करना और बाद में सांग समग्र न्यासयोग विषयक विवरण तथा इस विषय पर चिन्तन करना॥१७॥१८॥ इहैव फलरूपाया वृत्तेः सम्यक् प्रदर्शनम् । देहान्निष्क्रमणस्यापि मार्गस्य च विचिन्तनम् ॥१९॥ इस लोक में फल प्राप्ति रूप वृत्ति के पूर्णरूप से विवरण के बाद इस शरीर के छोड़ने के पश्चात् निष्क्राम प्राप्त जीव के अर्चिरादि मार्गों से उत्तमकान्तिरूप यात्रा का चिन्तन॥१९॥ दिव्यलोकस्य सम्प्राप्त्या भर्तुरालोकनार्चया । निरस्तातिशया प्रीतिः सदा तस्याश्च भावना ॥२०॥ जीवकी यात्रा के क्रम में उसका दिव्य लोक की प्राप्ति तथा अपने स्वामी इष्ट देश परमेश्वर का जो परमपद के साधन भी हैं-दर्शन प्राप्ति से निरवधि प्रीति तथा उसकी स्थिति का चिन्तन॥२०॥ भगवच्चरणाम्भोजानुभवप्रीतिजन्मनः । कैङ्कर्यस्य परा काष्ठा या तस्याश्च विचिन्तनम् ॥२१॥ और आगे दिव्यलोक में अवस्थित श्रीमन्नारायण के चरण कमलों का दर्शन, सेवा का अनुभव तथा उससे होनेवाली प्रीति की उत्पत्ति से दासभावना की परमानन्दा दात्री स्थिति की पराकाष्ठा का विचार॥२१॥ अनादेर्मोहकलनात् संसारावृत्तिहेतवः । प्रभवन्त्यात्मनां कर्म-वासनारुचयो यथा ॥२२॥ यथा रागादयो दोषा नित्यं चात्मगुणच्छिदः । कारणान्यपचारेषु क्षिपन्ति च तथा मतिः ॥२३॥ इसी क्रम में अनादिभूत माया (अविद्या) के सम्बन्ध में संसार में बार बार आकर जन्म प्राप्त करने के कारणभूत कर्मों की वासना तथा रुचि जैसी उत्पन्न होती है तथा अहिंसा आदि अध्यात्मगुणों के अनुरोधक राग आदि पुण्य पापकर्मादि के द्वारा संसार के बीजभूत तत्व बनकर दोषरूप में आते हैं तथा वे ही कारण होकर जीव को ऐसे अपचारों (पातकादि दोषों) में गिरा देते हैं, कैसी बुद्धि के उत्पन्न हो जाने की चिन्तना॥२२-२३॥ विमर्श इह दुःखानां यातनानां परत्र च । विषयाणाञ्च हेयत्वदर्शनं दृष्टिरुच्यते ॥२४॥ इस लोक में प्राप्त होनेवाली दुःखोंकी तथा परलोक में प्राप्त होनेवाली यातनाओं