नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित १४९ का विचार तथा सुखदुःखादि सांसारिक विषयों की हेयता का प्रतिपादन करना आदि ये सभी 'दृष्टि' कहलाते हैं॥२४॥ सैषा सुदृष्टिर्वृत्याख्यतरोर्मूलमुदाहृता । अतोऽन्यथा कुदृष्टिर्हि तस्य सा मूलघातिनी ॥२५॥ यह दृष्टि ही इस वृत्तिभूत पूर्व कथित वृक्ष की मूल या जड़ मानी गयी है तथा इसके विपरीत दृष्टि कुदृष्टि कहलाती है जिससे मूल का ही विघात माना गया है॥२५॥ प्रथमासनसंस्कारो निषेको विधिपूर्वकः । संस्कारास्त्वाव्रतादेशात् तत्र भोगक्रमा हरेः ॥२६॥ वृत्तिरूप वृक्ष का मूलबन्ध तथा विहिताचार भगवदिज्या आदि के विचारक्रम में सर्वप्रथम वेदादि शास्त्राविधि से विहित गृहाश्रम में होनेवाला गर्भाधान संस्कार तथा इसी के आगे व्रतादेश तक के (पुंसवन, सीमान्तोन्नयन, जातकर्म, नामकर्म, अन्नप्राशन, चौल तथा उपनयनादि व्रतबन्ध तक) संस्कारों का उपचारक्रम श्रीहरि के उपचार के क्रम में प्रथम संस्कार माना गया है॥२६॥ द्वितीयमासनं विष्णोरस्योपनयनक्रिया । ज्ञानान्तास्तत्र संस्कारा बोद्धव्या भोगसम्पदः ॥२७॥ इसके आगे श्रीहरि के उपचार क्रम के द्वितीय संस्कार के क्रम में इसका उपनयन क्रिया से लेकर वेदारम्भ तथा समावर्तन पर्यन्त संस्कार इसके भोग सम्पत्ति के क्रम में ज्ञानासन के रूप में आते हैं॥२७॥ वैवाहिको विधिर्धर्मो यस्तृतीयं तदासनम् । गृहस्थधर्मा ये तत्र ते प्रसाधनविग्रहाः ॥२८॥ तथा धर्मभाव से अनुष्ठित विवाह संस्कार तृतीय आसन रूप है जहां गृहस्थों के आचार योग्य धर्मों का पालन होना प्रसाधनभूत अलंकार सदृश उपाचार क्रम में श्रीहरि के आता है॥२८॥ योगक्षेमविधिर्नित्यस्तच्चतुर्थमिहासनम् । ततः परेऽखिला यज्ञा हविषां विनिवेदनम् ॥२९॥ वनस्थाश्रमसम्प्राप्तिर्हरेः पञ्चममासनम् । नियमा ये च तत्र स्युस्ते वै भोगास्तदाश्रयाः ॥३०॥ इस गृहस्थ की वृत्ति के लिये भोग्यासन के रूप में जो अर्थार्ज्जनरूप योगक्षेम विधिवत् नित्य अपेक्षित है तथा जिसमें अग्निष्टोमादि यज्ञों के द्वारा (श्रीहरि एवं देवगण को), हवि समर्पण करने के आचारभूत कर्मवाला श्रीहरि के उपचार का आसन चतुर्थ स्थानीय