भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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१५० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता है। इस आश्रम के आगे वानप्रस्थ के प्राप्त हो जाने पर वह श्रीहरि के उपचारभूत रूप में पंचम आसन (होता) है जहां वन में स्थित रहकर आश्रम के नियत तथा उनके अनुरूप पदार्थों का भोगरूप में सेवन करना विहित है॥२९-३०॥ यत् प्रव्रजन्ति तत् षष्ठमासनं परमात्मनः । योगाख्यमतुलं शुद्धं तद्धर्मास्तित्र सत्क्रियाः ॥३१॥ इसके बाद अधिकारानुरूप जो प्रव्रजनरूप (सन्यास नामक) आश्रम है वह परमेश्वर के उपचार क्रम में षष्ठ स्थानीय है जिसका नाम योगसंस्कार है जो परमशुद्ध तथा अतुलनीय है। सन्यास के धर्मों में किये जाने वाले कर्मभूत उपचार सद्धर्मानुष्ठानरूप है जहां सत्सेवा की जाए॥३१॥ सतामुत्क्रमणादेश्च कर्तव्या विधयः परे । उद्वासनोपचारा वै भवन्ति दिवि शार्ङ्गिणः ॥३२॥ अग्नौ तु परमे व्योम्नि ध्यायेतां नित्यमच्युतम् । वैश्यत्वे चार्णवगतं शूद्रत्वे तु भुवि स्थितम् ॥३३॥ ऐसे सन्त के प्राणों के उत्सर्ग के उपरान्त उसकी उत्तरकालिक विधियों को सम्पन्न करना चाहिए। जिसमें श्रीहरि को अर्पित उद्वासनादि उपचार होते हैं। इसमें अग्नि तथा परम आकाश में स्थित अच्युत का ध्यान करते हैं (क्रमशः) ब्राह्मण तथा क्षत्रिय के लिये और वैश्य के लिये समुद्र में स्थित तथा शुद्र के लिये पृथ्वी पर स्थित अच्युत का ध्यान करते हैं॥३२-३३॥ इत्थं वर्णाश्रमादीनां नित्यनैमित्तिकादिकम् । विहितं कर्म सकलं विष्णोराराधनं परम् ॥३४॥ इस प्रकार वर्ण तथा आश्रम आदि के नित्य एवं वैमित्रिक सम्पूर्ण विहित कर्म श्री विष्णु की परमाराधना है॥३४॥ निबोधत महाप्राज्ञस्तदेतदखिलं पुनः । वृत्त्याख्यस्य तरोरेव सुदृढं मूलबन्धनम् ॥३५॥ हे मुनिगण! इस सभी को निश्चित रूप में आपको समझाना आवश्यक है जो कि वृत्तिनामक वृक्ष के सुदृढ़ मूलबन्ध के रूप में सदा अव स्थित है॥३५॥ त्यागेन कर्मणां स्वस्य निषिद्धकरणेन च । आज्ञातिक्रमणं यत् तन्मूलबन्धोपघातकम् ॥३६॥ तथा अपने विहित कर्मों के परित्याग से तथा कर्मों के आचरण करने से जो श्रीहरि की आज्ञा का अतिक्रमण होता है वह वृत्तिवृक्ष के मूल बन्ध का उपघात करनेवाला होता है॥३६॥