नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित १५१ विहितैवमुपावृत्तिर्विशुद्धपरिवारके । विशुद्धे ब्रह्मणि परे प्रीत्या सा भक्तिरुच्यते ॥३७॥ अतएव विशुद्ध भावादि सम्पन्न परिवारवाले (देवतान्तर्यामिभाव सहित) अपने स्वरूप में अवस्थित परब्रह्म में जो वृत्ति आराधनात्मक रूप में विधिपूर्वक बतलायी गयी है वही, अतिप्रीति से सम्पन्न की जाए तो भक्ति कहलाती है॥३७॥ श्रुतिस्मृतीतिहासाद्यैर्दिव्यार्षागमविस्तरैः । ब्रह्मसूत्रपदैर्मन्त्रैः सन्निबन्धैः सयुक्तिभिः ॥३८॥ नाथस्य रूपविभवस्वरूपगुणकर्मणाम् । कीर्तनं ख्यापनं चिन्ता भृशं व्यक्तिषु चादरः ॥३९॥ स्तुतिर्नतिः परिक्रमः प्रीतिरात्मनिवेदनम् । उपहाराच्छेषरतिः समीपपरिवर्तनम् ॥४०॥ दिव्यार्चायतन-ग्राम-पुर-राष्ट्रादिसम्पदाम् । निष्पादनं तथारामतटाकादि-प्रकल्पनम् ॥४१॥ स्थापनार्चन-यात्रादिमङ्गलानां प्रवर्तनम् । आस्थानासनयोग्यानां पात्रोपकरणस्य च ॥४२॥ स्नानप्रसाधनहविः शय्यान्तः पुरसम्पदाम् । सङ्ग्राममृगयाणाञ्च क्रीडोपकरणस्य च ॥४३॥ दिव्यानां मानुषाणाञ्च सेवकानां पृथक् पृथक् । अन्येषाञ्चैव भोगानां चेतनाचेतनात्मनाम् ॥४४॥ निष्पादनं रक्षणञ्च संस्क्रियोपनयादि च । भक्त्या च नियतौत्सुक्यं स्वयमाराधनक्रियाः ॥४५॥ श्रुति, स्मृति तथा इतिहास पुराण आदि के तथा श्रीहरि के उद्गारभूत वैष्णव तन्त्रादि के, ऋषियों के उपदेशों से प्रवर्तित संहिताओं के विस्तार से ब्रह्मसूत्र के मन्त्रभूत निबन्धनों से तथा विद्वानों के द्वारा निर्मित न्यायतत्व जैसे शास्त्रीय निबन्धों तथा उनकी तर्कपूर्ण युक्ति आदि से श्रीनारायण के रूप, विभव, स्वरूप, गुण तथा कर्मों का जिसमें उनके विग्रह, विभूति, स्वरूप, गुण तथा चेष्टाओं पर विमर्श है तथा उनके नाम का उच्चारण, दूसरे भर को उसका प्रतिपादित रूप प्रख्यापन करना, उसी की चिन्ता रखना तथा अर्चावतार रूप व्यक्तिमें आदर दिखलाना। उन्हीं के स्तोत्र तथा उन्हीं के प्रति प्रणामादि का साष्टांग अर्पण करना, उन्हीं की प्रदक्षिणा करना, स्तुत्यादि से संतुष्ट होकर उनमें प्रीति रखना, उन्हीं के प्रति अपना आत्मनिवेदन प्रस्तुत करना तथा उन्हें ही नवैद्यादि उपहार प्रदान कर उसी के