नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अर्पित भक्त अन्न को लेने में रति तथा अर्चावतार के आसपास ही चलते फिरते तथा विद्यमान रहना, दिव्यार्चायतन का निष्पादन अर्थात् निर्माण करवाना (जहां श्रीहरि की अर्चा का धाम न हो), ऐसे ग्राम का, पुर (नगर) तथा राष्ट्र का निष्पादन करना जहां श्रीहरि की अर्चाधाम रहे, तथा इसी प्रकार उपवन, तटाक आदि का श्रीहरि के अर्चाधाम या नाम पर निष्पादन करवाना, श्रीहरि के विग्रह का स्थापन, नित्य आराधन, पक्ष, उत्सव, मासोत्सव आदि के समय श्रीहरि की उत्सवयात्रा या ग्रामप्रदक्षिणादि का निष्पादन करवाना, श्रीहरि के आस्थान या मन्दिर में आसन आदि योग्य वस्तुओं तथा अन्य पात्रादि उपकरणों का दानरूप में निष्पादन करना तथा प्रेरित कर दूसरों से भी ऐसा ही दानादि करवाना तथा उस आस्थान में उपयोगार्थ स्नान, प्रसाधन के उपयोगी पदार्थ या अलंकार, हवि, पदार्थ, शय्यादि वस्तु, अन्तःपुर के उपयोगी समृद्ध उपकरण, संग्राम तथा मृगया के उपयुक्त पदार्थ तथा श्रीहरि के उपयुक्त (श्रीहरि के हेतु) उपकरण भूत पदार्थों का आस्थान में प्रेषण करवाना, इसी प्रकार दिव्य इष्ट के, मानवों के तथा सेवकों आदि के उपयुक्त भोग्य पदार्थों तथा भोज्यपदार्थों का (जो चेतन एवं अचेतन रूप हैं) तदर्थ भिजवाना, इन पदार्थों का उत्पादन करवाना, इनका संरक्षण करना, इनकी संस्काररूप निगरानी करते हुए इन्हें शुद्ध रखवाना, निश्चित उत्सुकता के साथ भक्तिपूर्वक यह सभी स्वयं करने का कार्य भी आराधना किया (भक्ति का कार्य) है॥३८-४५॥ इत्येतत् सकलं काण्डस्कन्धशाखादलाङ्कुरम् । देवतान्तरभक्तिस्तु निरासस्तस्य हाऽशनिः ॥४६॥ इस प्रकार यह भी उस तरु की शाखा, टहनियां, ऊपर पहुंचनेवाली शाखाएं उसके पत्ते तथा अंकुर रूप विस्तार है परन्तु अन्य या अनेक देवताओं की भक्ति इस वृक्ष पर गिरनेवाली बिजली समझाना चाहिए (जो इस वृक्ष को क्षति पहुंचाती है)॥४६॥ अथ पुष्पं फलञ्चास्य लक्ष्म सत्सेवनन्तथा । युक्तोऽप्यन्यैर्विना पुष्पैः फलैरवति कस्तरुः ॥४७॥ इस वृत्तिरूप वृक्ष का 'पुष्प' होता है पंचलक्ष्म (चिन्ह) तथा सत्सेवन इसका फल माना जाता है अतएव यदि वृक्ष पुष्प तथा फल से युक्त न हो तो उसकी रक्षा कौन करेगा (अतः पुष्प तथा फलों के लिये वृक्ष का रक्षण करना आवश्यक है)॥४७॥