भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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पृष्ठ 155

हिन्दीटीकासहित १५३ प्रतप्तैर्भगवद्दिव्यायुधैर्गात्रेषु लाञ्छनम् । सततञ्च हरिक्षेत्रोद्भू-मृत्स्नोर्ध्वपुण्ड्रकः ॥४८॥ पद्मबीजमयी माला तुलसीदिव्यचूर्णकम् । पवित्रञ्चाथ कौपीनं व्यतिस्यूता च मेखला ॥४९॥ लक्षणों में शरीर के उपयुक्त स्थानों पर अग्रजन्मा जन को श्रीहरि के प्रतप्त दिव्यायुधों का लाञ्छन अंकित करवाना चाहिए तथा सदैव श्रीहरि के पुण्यक्षेत्रों से लायी गयी मृत्तिका से ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाना चाहिए, कमल के बीजों की बनी हुई माला को तथा तुलसी हरिद्रा के चूर्ण को (मस्तक पर) धारण करना चाहिए, शुभ्र धौत एवं पवित्र कौपीन तथा कटिसूत्र का धारण करना चाहिए॥४८-४९॥ पञ्चायुधाब्जताक्ष्र्यादिलक्षणाभरणादिकम् । वेषश्चानुल्बणः शौक्ल्यं दन्तहृत्पुण्ड्रवाससाम् ॥५०॥ विष्णोस्तत्संश्रयाणांञ्च चेतनाचेतनात्मनाम् । आख्या व्यपदेशश्च लक्षणानि सतां विदुः ॥५१॥ शरीर पर श्रीहरि के पंचायुध शंख, गरुत्मादि लक्षणों वाले अलंकार तथा उष्णीय आदि को धारण करना चाहिए तथा शुक्ल वर्णके सूक्ष्म वस्त्रादि का परिशुद्धरूप में धारण तथा दन्त, हृदयपुण्ड्र तथा वस्त्रों को शुभ्ररूप में रखना तथा श्रीविष्णु के नाम से उन्हीं के आश्रित चेतन तथा अचेतन रूपवाले व्यक्तियों नामों से व्यवहार रखना ये लक्षण संतों के होते हैं॥५०-५१॥ लक्ष्मणामपचारेण विरुद्धानाञ्च धारणात् । कैङ्कर्यामोदसम्पत्तिर्नश्येन्मोहश्च जायते ॥५२॥ इन लक्षणों के धारण न करने पर अपचार से तथा अन्य देवगण के चिन्हादि के धारण करने पर वृत्ति के कैङ्कर्यामोदन सम्पदा का विघात होता है तथा इससे मोह रूप भ्रम की भी सम्भावना (या स्थिति) निर्मित हो जाती है॥५२॥ पत्युर्ज्ञानमयी वृत्तिर्विष्णोः प्रियमिहोच्यते । ये सन्ति तत्र निरतास्ते सन्त इति कीर्तिताः ॥५३॥ सर्वात्मना हि या वृत्तिस्तेषु भक्तिमयी परा । सा भक्तेः परमा काष्ठा वृत्तेश्च परमात्मनि ॥५४॥ आचार्यवद्दैवतवन्मातृवत्पितृवत्स्ववत् । सुहृद्वत् स्वामिवत् सन्तो दृष्टव्या राजवत् तथा ॥५५॥ अब स्वामी श्रीनारायण की ज्ञानमयी तथा प्रिय वृत्ति को बतलाते हैं। जो श्रीविष्णु के आराधक इस इष्टज्ञान की दृष्टि रखते हुए अपने आराध्य में निरत रहें उन्हें