नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता सत्जन या सन्त कहते हैं। तथा इनमें जो भक्तिमयी उत्कृष्ट वृत्ति सर्वात्मना अपने इष्ट परमात्मा में पराकाष्ठा तक पहुँच जाती हो वही भक्ति की पराकाष्ठा रूप सद्वृत्ति हैं। संत आचार्यों को समान, अपने आराध्य देव के समान, माता और पिता के समान, अपने विश्वस्त मित्र की तरह, अपने स्वामी के समान तथा अपने शासक नृप के समान देखते हुए उनके अनुरूप प्रीति रखना चाहिए॥५३-५५॥ श्रुत्वैव सहसोत्थानम्प्रत्युत्थानं सुदूरतः । दर्शनानुभवप्रीतिः प्रणिपातोऽभिवादनम् ॥५६॥ इनके आगमन को सुनते ही बिना किसी विलम्ब के अपने स्थान से उठ जाना चाहिए तथा दूर तक आगे चलकर इनकी अगवानी करना चाहिए, इनके दर्शन के साथ अपनी प्रीति का अनुभव तथा उन्हें आदरपूर्वक नमस्कार अथवा अभिवादन करना चाहिए॥५६॥ नीचैः संश्लेषणं हस्तदानं मार्गप्रदर्शनम् । पश्चात्पार्श्वपुरोयानञ्जयालोकाभिभाषणम् ॥५७॥ झुककर विनयपूर्वक उनके हाथ को लेते हुए किसी बात को बतलाना चाहिए तथा बाद में उनकी बाजू से आगे चलकर उनकी जय का उद्घोषण आदि करना चाहिए॥५७॥ गृहोपनयनञ्चान्तर्देशक्रमणमासनम् । पादावनेजनञ्चार्घ्योपहारः स्वागतादि च ॥५८॥ उन्हें अपने निवास पर लाना चाहिए तथा घर के सभी कक्षादि स्थानों पर उन्हें ले जाना चाहिए तथा योग्य आसन पर उन्हें बिठाकर उनके पादप्रक्षालन, अर्घ्योपहार तथा स्वागतादि प्रस्तुत करना चाहिए॥५८॥ प्रसादनं क्षमापणञ्च प्रीतिसङ्कथनानि च । उपासनं प्रश्रयणमात्मात्मीय निवेदनम् ॥५९॥ उनके प्रसादन हेतु प्रसीद जैसे शब्दों का कथन विनयपूर्वक करना चाहिए तथा क्षमा प्रार्थना कर प्रीतिपूर्वक संभाषण करना चाहिए, उनके समीप ही स्वयं को बैठना, विनय तथा आत्मीयभाव का निवेदन करना चाहिए॥५९॥ आज्ञाम्यर्थनमालोकनिर्देशवचनादरः । साधनं सम्पदादिष्टादरोऽनिष्टनिवर्तनम् ॥६०॥ किसी कार्य के होने पर उनसे आज्ञा कीजिये कहना, उनके द्वारा देखने आने पर उनके आज्ञा वचनों पर आदर करते हुए उनके लिये शाकफलादि भोजनयोग्य सामग्री का पकाना आदि कार्य के साथ ( इष्ट आदर तथा उसी से अपना अनिष्ट का