नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 157, कुल 176 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिवारण बतलाना चाहिए)॥६०॥ विरहानर्थपीडावमाननाद्यसहिष्णुता । दास्याभिमानोऽनुव्रज्या श्रवणं कीर्तनं स्मृतिः ॥६१॥ भक्तिज्ञानसमाचारवैराग्याद्यनुमोदनम् । सङ्गेच्छोपगमनमन्वक्स्थानासनादिकम् ॥६२॥ उनके विरुद्ध की, उनकी अर्थहानि की, उनकी पीड़ा की, उनके किसी द्वेषी जन द्वारा किये गये तिरस्कार की असहिष्णुता का निवेदन करना चाहिए तथा उनके दास्य का अपना निश्चय तथा उसका अभिमान बतला कर उसके अनुगमन, उनके योगक्षेम तथा गुणों का श्रवण, स्वयं उनकी बातों का तथा नामादि का उल्लेख कर बात करना तथा उनकी पिछले गौरव का स्मरण करना, उनके द्वारा आचरित या बुद्ध भक्ति, ज्ञान का तथा वैराग्यमय आचारादि का अनुमोदन करना, उन्हीं के उद्देश्य से उनके समीप जाना तथा उनके पीछे स्थित होना, बैठना आदि करना चाहिए॥६१-६२॥ समानसुखदुःखत्वं मिथश्चार्थ-विचिन्तनम् । क्रियाकाले तु वरणं सदस्याग्रे तु पूजनम् ॥६३॥ परिषत्सु च सान्निध्यं संविदाञ्च प्रवर्तनम् । तथास्यानुज्ञापूर्वञ्च सर्वार्थेषु प्रवृत्तयः ॥६४॥ उनके सुख तथा दुःखों में अपनी समान स्थिति निदर्शित करना, परस्पर किसी शास्त्रादि अर्थ पर विचार करना (या उसमें सहयोग करना) स्वयं के यज्ञादि अनुष्ठानों के सम्पादन में उनका योग्य स्थिति में वरण करना, श्रेष्ठ सदस्य के रूप में उनकी अनुरूप अर्चना, परिषद् या सभा में उनके समीप रहना, उनकी किसी शास्त्रादि प्रतिज्ञा के होने पर उनका विषयादि प्रवर्तन करना तथा सभी अपेक्षित कार्यों में उनकी आदेशमयी अनुज्ञा के अनुरूप कार्यों का सम्पादन करना॥६३-६४॥ प्रच्छादनञ्च दोषाणां गुणानां ख्यापनन्तथा । क्वचिच्चैवाप्यधर्मेण कृच्छ्रेणाप्यर्थसाधनम् ॥६५॥ एताश्चान्याश्च विविधा वृत्तयो रसनिर्भराः । विष्णुभक्तेषु वृत्त्याख्यतरोर्हि फलसम्पदः ॥६६॥ उनके स्खलन या दोषों का प्रच्छादन करना तथा गुणों का प्रख्यापन करना तथा आवश्यक होने पर किसी अवसर पर कष्ट के उपस्थित हो जाने पर किसी अधर्म की भी किञ्चिद् वृत्ति का आश्रय लेकर उद्दिष्ट अर्थ साधन कर लेना। ये सभी तथा इन्हीं के