भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

१५६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता समान कुछ दूसरी भी भक्ति से प्रेरित तथा संचालित वृत्तियां है जिनकी प्रवृत्ति रखी जाए। ये ही विष्णु भक्तों में वृत्तिनामक वृक्ष की रसपूर्ण फलवृत्ति या सम्पत्ति कहलाती है॥६५-६६॥ सतामाचार्यमुख्यानामपचाराः पृथग्विधाः । असतामिव संसर्गात्ससूलफलनाशनाः ॥६७॥ सन्तभूत वैष्णव तथा आचार्यों के विषय में होनेवाले अपचारों को अलग रूपवाले समझना चाहिए जो असज्जन के संसर्गवत् मूलसहित फल के विघातक होते हैं॥६७॥ दास्यामृतरसास्वादतृर्षादत्यन्तमेशितुः । वैरस्येन विरुद्धानां हानं वैराग्यमुच्यते ॥६८॥ परमेश्वर श्रीहरि के दास्यरूप अमृत के आस्वादन की तृष्णा के कारण अत्यन्त विरस लगने वाले संसार के त्याग करनेवाला तथा संसार को विघ्न माननेवाला भाव 'वैराग्य' कहलाता है॥६८॥ श्रुतिभिः पञ्चरात्रेण स्मृतिभिस्तत्वदर्शिभिः । दर्शितान्यर्थतत्वानि न हि मन्दधियो विदुः ॥६९॥ ब्रह्मरुद्रमुखा देवा विविधाश्च महर्षयः । मनुष्या नागयक्षाश्च सिद्धविद्याधरास्तथा ॥७०॥ तत्तत्कार्योपपत्त्यर्थ शासनाच्च जगत्पतेः । रजस्तमोऽभिभूत्या च जगुः शास्त्राण्यनेकंशः ॥७१॥ विपरीतार्थतत्वानि क्षुद्रनानाफलानि च । अपवर्गकथावन्ति मोहनान्यद्भुतानि च ॥७२॥ तत्वदर्शीजन के द्वारा वेदादि, पञ्चरात्र, स्मृति, पुराण तथा इतिहासादि के द्वारा दृष्टितत्व या अपेक्षित अर्थों का तात्विक रूप दिखलाया गया है परन्तु उसे मन्दबुद्धि जन तात्विकरस में समझने में अक्षम हैं। अतएव जगत्पति श्रीविष्णु के निदेश के कारण ब्रह्मा तथा रुद्र आदि देवों ने तथा अनेक विभिन्न मतों वाले महर्षिगण ने, मनुष्य, नाग, यक्ष, सिद्ध, विद्याधर आदि ने अपेक्षित अनेक कार्यों तथा प्रयोजनों को प्राप्त करने के लिये तथा रजोगुण एवं तमोगुण से अभिभूत क्रियाओं से युक्त अनेक उपाय भूत ऐसे तन्त्रादि शास्त्रों का कथन किया जिनमें वास्तविकता से परे विपरीत अर्थ तथा तत्वों का मिश्रण भरा हुआ है तथा जिनके लिये अनेक छोटे छोटे उद्देश्यों की पूर्ति देनेवाले फल हैं तथा जिनमें मोक्ष प्राप्ति तक की बाते कहीं हुई हैं, ऐसे अद्भुत एवं बुद्धि को मोहित करनेवाले विवरण या अर्थ उनमें कहे गये हैं॥६९-७२॥