नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 159, कुल 176 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित १५७ अपरेषामपि पुनस्तत्तन्मार्गानुसारिणाम् । धर्मवादच्छलोपेता ये च स्युर्ग्रन्थविस्तराः ॥७३॥ हरेरालोकहीनानामद्यापि किल पश्यत । तेषु तेष्ववगाहेन भवन्ति ज्ञानविप्लवाः ॥७४॥ इसके अतिरिक्त कुछ अन्य हैरण्यगर्भ, पशुपत आदि आगमों के जो पूर्वकथित शास्त्रों से भिन्न हैं तथा ये धर्मवाद के छलों से भरे हुए हैं। इनके समान ही अन्य जो ग्रन्थ तथा उनके तात्विक विस्तार मूलक ग्रन्थ है वे भी धर्मवाद का भ्रम उत्पन्न करनेवाले हैं। ये सभी श्रीविष्णु के तात्विक ज्ञानमय प्रकाश से रहित हैं जिन पर श्रीहरि की दृष्टि नहीं तथा ऐसे अनेक प्रबन्ध ग्रन्थ तथा उनके विस्तार से तात्पर्य दिखलाने वाले प्रबन्धों के अनुशीलन करने से ज्ञान का विप्लव होता है यह तत्व ध्यान देने योग्य हैं॥७३-७४॥ वेदानां सोपनिषदां पौरुषेयत्वचिन्तनम् । पञ्चरात्रे च सकले तन्त्रान्तरसमत्वधीः ॥७५॥ ऐसे ग्रन्थों तथा प्रबन्धादि में उपनिषद् के सहित सभी वेदों को पौरुषेय प्रतिपादित करने की मति या तर्कादि दिये गये हैं। समग्र पञ्चरात्र जैसे आगम या तन्त्र को इसी आधार पर अन्य तन्त्रोंकी समान कोटि में रखकर उनके समान रूप से मानने की बुद्धि होती है॥७५॥ वृद्धानाञ्चैव मुक्तानां नित्यानाञ्च तथात्मनाम् । अच्युतादन्यशेषत्वशङ्का च समताभ्रमः ॥७६॥ जिन शिवादि देवों में अच्युत श्रीनारायण की समता बुद्धि आ जाती है तथा वृद्ध, मुक्त तथा नित्यभूत जीवों की अन्य शेष के समान स्थिति की आशंका को दिखलाकर जहाँ समता कही है॥७६॥ तस्य चान्येशितव्यत्वबुद्धिर्विश्वपृथक्त्वधीः । विभूति-गुण-रूपादि विशेषविरहभ्रमः ॥७७॥ और इस प्रकार उन श्रीनारायण का अन्य इष्टदेव के समान ही महत्व तथा ज्ञान को दिया जाता है तथा उनकी विभूति, गुण तथा रूपादि विशेष से रहित तत्व से विश्व से अपृथत्व की बुद्धि दिखलाकर भ्रम उत्पन्न किया जाता है॥७७॥ अन्यतो जगदुत्पत्तिस्थितिप्रलयचिन्तनम् । योगानाञ्चैव सर्वेषां नित्यादेः कर्मणस्तथा ॥७८॥ ज्ञान-भक्त्यङ्ग-सत्सेवा तत्वानां चाविचिन्तनम् । विरुद्धानाञ्च सर्वेषामपायत्वविमर्शनम् ॥७९॥