नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता तथाऽनादेरविद्यायाः स्वरूपस्यानिरूपणम् । हरेरालोकनान्तायास्तस्याश्चान्यनिवर्त्य-धीः ॥८०॥ फलानां चान्यतः प्राप्तिश्चिन्ता निःश्रेयसस्य च । हरेः कैङ्कर्य सम्प्राप्तिर्व्यतिरिक्तामृतत्वधीः ॥८१॥ विशेषेणाप्यनर्थेषु देहादिष्वर्थतामतिः । इत्यादयो बहुविधा महापापाः कुदृष्टयः ॥८२॥ जगत् की उत्पत्ति आदि का श्रीनारायण के अतिरिक्त किसी अन्य से निरूपण करना तथा सभी कर्म, ज्ञान तथा भक्ति योगों का तथा नित्यादि पदार्थों तथा कर्मों एवं नैमित्तिक कर्मों का भी इसी प्रकार नारायण से भिन्न उपादान के रूपों में चिन्तन करना तथा दान या दृष्टि, शंख चक्रादि अंकों, सत्सेवा आदि के तत्वों की विचिन्तना से दूर हट जाना और सभी विरोधी उपायों, तत्वों (दृष्टि, अंक, सत्सेवा के विरुद्ध उपायों का जैसे महत् तत्व आदि का स्वरूपादि विचार करना। इसी प्रकार अनादि माया स्वरूप अविद्या का स्वरूपगत विचार न करना तथा उसी अविद्या की श्रीहरि के दर्शन या प्राप्ति के बाद निवृत्ति होने की स्थिति को न मानकर किसी अन्य उपाय से निवृत्ति का ज्ञान रखना। इसी प्रकार मोक्षरूप फल की श्रीहरि के अतिरिक्त किसी दूसरी विधि से प्राप्ति मानना और श्रीहरि के दासभाव की प्राप्ति से भिन्न अमृतत्व (मोक्ष) प्राप्ति की स्थिति का चिन्तन करना या उसे मानना। ये सभी तथा इनके अतिरिक्त देहादि स्थूल पदार्थों में विशेषरूप में आत्मत्व की निष्ठा बुद्धि रखना आदि ये अनेक प्रकार के कुदृष्टि रूप महाघातक हैं जो भ्रमोत्पादक तथा श्रीहरि की भक्ति में बाधक हैं॥७८॥ हरेः प्रियतमं ज्ञानं सन्तो ज्ञानधना ह्यतः । तथैव चापचाराणां काष्ठा ज्ञानविपर्ययः ॥८३॥ अतएव श्रीहरि को एक तो सत् दृष्टि वाला ज्ञान तथा इस ज्ञान के रखने वाले सन्त ही प्रिय हैं। इसी प्रकार अपकारों की पराकाष्ठा (अधिक प्रमाण में आचरण होते रहना) इस ज्ञान की विरोधी स्थिति होती है (जो हेय है)॥८३॥ ज्ञानस्य कर्मणा गुप्तिर्हतं ज्ञानमकर्मणा । प्रवृत्त्या प्रतिषिद्धेषु ज्ञानं कर्म च नश्यति ॥८४॥ सत् ज्ञान का संरक्षण विहित कर्म के द्वारा होता है तथा कर्मों के आचरण न करने पर ज्ञान का भी हनन हो जाता है, क्योंकि यदि प्रवृत्ति इनमें अवरुद्ध हो जाए तो उनमें कर्म तथा सत्ज्ञान का भी विनाश हो जाता हैं॥८४॥