नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित १५९ अचिन्ता च विनिन्दा च मतिपूर्वञ्च वर्जनम् । विहितानाञ्च धर्माणां सर्वज्ञात्मावघातकम् ॥८५॥ स्वरूपस्य विनाशाय रुचिर्निन्द्येषु कर्मसु । विषयेषु च सर्वेषु लौल्यं विष-मधु-स्पृहा ॥८६॥ विष्णोर्विद्वेषयुक्तस्य वैमुख्यं प्रतिपत्तिषु । प्रवृत्तिश्चापचारेषु सम्यगात्मविनाशनम् ॥८७॥ इसलिए वास्तविक तत्वों का चिन्तन न करना, ऐसी धर्मादि प्रवृत्ति की निन्दा या तर्कादि के सहारे से ऐसे तत्वों का बुद्धिपूर्वक प्रतिरोध करना तथा विहित धर्म तथा कर्माचरणों का ऐसी सर्वत्र आत्स्या से विघात करना उसके स्वरूप के नाश करनेवाला है। इसी प्रकार जो निन्द्य (त्याज्य) कर्मों में रुचि रखना तथा सभी विषयादि में रुचि तथा लौल्य वृत्ति रखना विषपूर्ण मधु की स्पृहा के करने जैसी विघातक होती है। इसके अतिरिक्त जो श्रीनारायण के प्रति द्वेषभाव या अनास्था से युक्त है तथा इनके सम्यक् ज्ञान से जो विमुख है, जो दोषों या अपचारों में स्वार्थवश प्रवृत्ति रख रहा हो तो ये सभी कार्य आत्मविनाशक होते हैं॥८५-८७॥ अन्य-तान्त्रिकदेवानां संसर्गप्रतिपत्तिषु । प्रवृत्तिरच्युतैकान्त्यनियमाध्वरनाशिनी ॥८८॥ इसी प्रकार अन्य तन्त्रादि में निर्दिष्ट उपास्य देवों में निष्ठा, उनके उपासकों के साथ संसर्ग तथा उनकी आचार तथा कर्मादि विधि में ज्ञान तथा ज्ञानपूर्वक प्रवृत्ति रखना ये सभी कार्य श्रीनारायण के अनन्यभाव (एकात्य) के नियमरूप यज्ञ को विनाश करनेवाले कहे गये हैं॥८८॥ लक्षणानि हि पुष्पाणि मुकुन्दचरणार्चने । तदभावपरीभावौ प्रध्वंसनकरावुभौ ॥८९॥ शंखचक्रादि अंकनरूप लक्षणों का धारण करना श्रीहरि के चरणों में अर्पित अर्चना के पुष्प हैं तथा इनको न धारण करना या इनका तिरस्कार करना, ये दोनों कार्य श्रीनारायण के एकान्त्यभाव के विघातक हैं॥८९॥ अन्यपुण्ड्राङ्कनादीनां धारणं दृष्टिनाशनम् । परचिह्नव्रणं गात्रे भ्रंशाय नरकाय च ॥९०॥ अन्य आगमों में बतलाए हुए चिन्ह तथा पुण्ड्रादि का अंकन तथा धारण करना श्रीहरि की दृष्टि में विघातक है। अतएव दूसरे चिन्हों का शरीर पर रहना केवल व्रणमात्र है जो उसका पतन करता और नरक प्राप्ति करवाने वाला होता है॥९०॥