नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता सतामसेवनान्नित्यमसताञ्च निषेवणात् । क्षीयन्ते चाथ नश्यन्ति ज्ञान-वैराग्य-भक्तयः ॥९१॥ सत्सेवा के भाव से प्रेरित न होकर सज्जनों (वैष्णव सन्तों) की सेवा न करने तथा अन्य सन्तभूत असन्तों के संसर्ग तथा सेवन करने से ज्ञान, वैराग्य तथा भक्ति क्षीण होकर बाद में नष्ट हो जाते हैं॥९१॥ महापचारो देवस्य भक्तानाम्भुवि शार्ङ्गिणः । धर्मरक्षानियुक्तानां समयस्य व्यतिक्रमः ॥९२॥ श्रीहरि नारायण देव के भक्तों का पृथ्वी पर अपचार या उनकी उपेक्षारूप दोष का आचरण धर्म की रक्षा से नियुक्त जन की मर्यादा का उल्लंघन होता है॥९२॥ एते चान्ये च विविधा ह्यपचाराः सुदुःसहा । वैराग्यं वर्जनं तेषां लज्जामानमदादिभिः ॥९३॥ अतएव इन बतलाये गये तथा इसी प्रकार के दूसरे उपचार असह्य होते हैं (अतएव इनका आचरण छोड़ देना ही उचित है)। इनके प्रति वैराग्य रखना उचित है तथा इनकी वर्जना है जो लज्जा, मान तथा मद आदि के द्वारा होती है॥९३॥ वृत्तेर्हि जीवितं गुप्तिः सारो वैराग्यमुच्यते । वैराग्ययुक्ता हि नरा यजन्त्यप्रच्युतान्तराः ॥९४॥ वृत्ति का निरन्तर जीवन है उसका संरक्षण करना और संरक्षण का सारभूत तत्व वैराग्य है क्योंकि वैराग्य से युक्त मनुष्य ही बिना किसी प्रयुक्ति या आपदाओं के बीच में आये निर्बाध रूप से श्रीहरि का यजन करने में समर्थ होते हैं॥९४॥ अनुज्झितक्रियायोगा ज्ञानवैराग्यशालिनी । इति भक्तिमयी वृत्तिः पुनरेव प्रपञ्चिता ॥९५॥ जिनमें कर्मयोग निरन्तर बना रहता है तथा ज्ञान और वैराग्य समृद्ध होकर प्रकाशित है ऐसी भक्तिमयी जो वृत्ति है पुनः यहां उसे हमने और भी स्पष्ट दिखला दिया है॥९५॥ इत्थं किलात्मनो न्यासाज्जातो वृत्त्याख्यपादपः । असौ फलमयः सेव्यस्तन्न चोत्पद्यते विना ॥९६॥ इस प्रकार आत्मभर के न्यासयोग से वृत्तिरूप वृक्ष जन्म प्राप्त करता है जिसे फल से सम्पन्न रूप में अवश्य सेवन करना चाहिए जिससे पुनः उत्पत्ति (जन्मादि) की प्राप्ति न हो॥९६॥