नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित १६१ सुसूक्ष्मत्वाद्दुरापत्त्वान्महत्त्वाद् गौरवादपि । ममायं परमो धर्मः प्रोक्तः स्थित्यै पुनः पुनः ॥९७॥ अत्यन्त सूक्ष्म रहनेवाले, कष्ट से प्राप्त होनेवाले, महत्व सम्पन्न तथा गौरव पूर्ण होने के कारण मैंने इस परमतत्वभूत धर्म को बार बार इसीलिये दिखलाया कि इसकी स्थिति दृढ़ हो सके॥९७॥ वृत्तिं सन्तोऽनुभूयेमामनुरूपां हि चात्मनः । परत्र चानुमोदन्ते परमेण विपश्चिताः ॥९८॥ इति श्रीनारदपञ्चरात्रे भारद्वाजसंहितायां परिशिष्टे चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ सज्जन सन्तजन आत्मा के अनुरूप इस वृत्ति का अनुभव करने पर उस वैकुण्ठ लोक में परमज्ञान के साथ प्रसन्नभाव से आनन्द प्राप्त करते रहेंगे॥९८॥ इति श्रीनारदपञ्चरात्र की भारद्वाजसंहिता के परिशिष्टभूत चतुर्थ अध्याय की ‘तत्त्वप्रकाशिका’ नामक हिन्दी व्याख्या समाप्त शुभमस्तु