नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
हिन्दीटीकासहित १४५ परिशिष्टे चतुर्थोऽध्यायः ४ पुनरेवं मुनिश्रेष्ठं पप्रच्छुस्ते महर्षयः । कथं निक्षेपता वृत्तिर्विस्तारोऽस्याश्च कीदृशः ॥१॥ अथ चतुर्थाध्याय सभी महर्षिगण ने यह सुनकर फिर एक प्रश्न भारद्वाजमुनि से किया कि हे मुने! आत्मनिक्षेप के बाद अनुष्ठेय वृत्ति या आचार कैसा रखा जाए तथा इसका विस्तृत तथा तात्विकरूप क्या होता है॥१॥ भरद्वाजो महातेजाः श्रुत्वा तेषामिदं वचः । प्रत्युवाच परं हृष्टो भगवद्दास्यतत्ववित् ॥२॥ तब महातेजस्वी भरद्वाज मुनि ने उन महर्षियों के इस प्रकार के वचनों को सुनकर प्रसन्नता से हर्षित भाव में भरकर भगवद्दास्यभाव के तात्विक ज्ञान के आधार पर इस प्रकार कहा॥२॥ विशुद्धज्ञानसलिलां भक्तिकल्लोलमालिनीम् । सत्सेवनस्वादुरसां दिव्यलक्षणवारिजाम् ॥३॥ वैराग्यतीरसुभागामाचारोपवनावृताम् । वृत्त्यापगां निषेवध्वं विष्णुसागरगामिनीम् ॥४॥ हे महर्षिजन! यह वृत्तिरूप नदी ही सेवन के योग्य तथा अनुष्ठेय है। क्योंकि इसमें शुद्ध ज्ञानरूप दृष्टि ही जल है, भक्ति रूपी लहरों की मालाओं से यह भरी हुई है, सत्सेवनरूप स्वादु इसका आस्वाद है, दिव्य लक्षणों वाले ताप, पुण्ड्रादि कमल खिले हुए हैं, वैराग्य के तीर से जो रम्य भाववाली है, विहित आचाररूपी उपवनों से जो वेष्टित है और जो विष्णु रूपी सागर की ओर जाने वाली है (इसका सेवन करना चाहिए)॥३-४॥ न्यासतीर्थाभिगमनं सुदृष्टिर्यजनं हृदि । स्वकर्माण्यासनाविधिर्लक्ष्मावाहनसत्क्रिया ॥५॥ भक्तिस्तु विविधा भोगाः सत्सेवा हविरुत्तमम् । वैराग्ययोगनिर्विघ्ना यजध्वमनयेज्यया ॥६॥
१४६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता यह भगवदाराधनारूप वृत्ति ही इज्या (यजन, त्याग) है अथा अनुष्ठेय भी हैं क्योंकि इसमें प्रपत्तिरूप न्यास ही आरम्भक (ज्ञान) हेतु तीर्थाभिगमन होता है (जिसमें ज्ञान से हृद्याग पर्यन्त अङ्ग है,) जहां सुदृष्टि ही हृदयजन है, अपने कर्मों में विहित आचार ही जहां आसनविधि है। जिसमें लक्ष्य, आवाहन, मन्त्र, ज्ञान, अलंकार, भोग्य, पर्यङ्क आदि सत्कार है। भक्ति जहां अनेक विद्य गन्ध, माल्यादि भोग हैं, जहां उत्तम हविरूप है, वैराग्य ही जहां योग रूप ध्यान है, जिससे विघ्न दूर हो जाते हैं (वैराग्य के उपाय से जो विघ्नरहित है) ऐसी इस वृत्तिरूप इज्या से यजन किया जावे॥५-६॥ भूमाविव परे पुंसि न्यस्त-बीजबदात्मनि । विज्ञान-मूल-सन्तानः क्रियाचारनिबन्धनः ॥७॥ भक्ति-प्रकाण्ड-विस्तारो वैराग्यरसपेशलः । नाना-लक्षण-पुष्पाढ्यः सत्सेवनमहाफलः ॥८॥ उच्चैस्तरोऽतिविपुलः सर्वसन्तापनाशनः । सम्पद्यते सदा सेव्यो हरि-कैङ्कर्य-पादपः ॥९॥ यही वृत्ति एक ऐसा वृक्ष है जिसकी आधाररूप भूमि परमपुरुष श्रीविष्णु है जिनमें न्यस्त आत्मा बीज के समान है, जिसकी विज्ञान रूप दृष्टि ही मूल (जड़) स्थानीय है जो परम्पराशूप है, जिसकी विहित आचार रूप क्रियाएं उस जड़ की दृढ़ता तथा सुरक्षा के लिये बनाया गया पाला तथा उसके आसपास की वेदिका है, जिसकी शाखाओं का विस्तार भक्ति है, जो वैराग्य के रस (जलसेक) से जमा हुआ होकर मजबूत हो रहा है, अपने ताप, पुण्ड्र आदि लक्षणों वाले इसके सुन्दर पुष्प हैं, जो सन्तों की सेवा रूप पुष्ट फलों वाला है, जो आकाश तक ऊंचाई में फैला हुआ तथा बड़ा ही विशाल आकारवाला है तथा जो अपनी छाया से सभी आश्रित विश्राम लेने पथिकों का सभी त्रिविध सन्ताप दूर करनेवाला है तथा जो श्रीहरि का दास्य रूप वृक्ष है। अतः इस ऐसे वृक्ष का ही सेवन सर्वदा करना चाहिए॥७-९॥ आदौ गुरूणां विज्ञानमथ तन्त्रार्त्तचिन्तनम् । तत एवात्मनो ज्ञानं तद्धर्माणाञ्च सर्वशः ॥१०॥ परस्य पुंसः श्रीशस्य परेशस्य परात्मनः । स्वरूप-रूप-विभव-गुण-व्यापार-चिन्तनम् ॥११॥ परिबर्ह-विभूषास्त्र-पत्नी-परिजनात्मनाम् । सर्वेषाञ्चैव दिव्यानां गुणानामनुचिन्तनम् ॥१२॥ इसमें सर्वप्रथम अपने तत्ववेत्ता आचार्य के समीप उपसर्पण से आचार्य रूप का ज्ञान
हिन्दीटीकासहित १४७ तथा आगे उनसे तन्त्र (शास्त्र) के उपदेश रूप अर्थ का चिंतन तथा इसी से स्वयं का आत्मज्ञान एवं उसके सभी धर्मादि का ज्ञान होना, जिससे परम पुरुष रूप श्रीश जो ब्रह्मारुद्रादि के नायकभूत हैं तथा परमात्मा हैं, उन सर्वान्तरात्मा का ज्ञान तथा उनके दिव्यस्वरूप का, उनके विग्रहादि रूप का, उनकी विभूतियों तथा गुणों का तथा उनके कार्यादि का ज्ञान होना, श्रीहरि के गुणों में उनके अवतारादि कार्यों में धारण किये जाने वाले भूषणादि, अस्त्र तथा उनकी पत्नी तथा उनके परिवारजन का ज्ञान तथा उनके दिव्य गुणों तथा कार्यों (जैसे हिरण्यकशिपु, रावण, शिशुपालादि के संहार करने के कार्यों) का चिन्तन करना॥१०-१२॥ विमानमण्डपोद्यानवापीकूपादिशालिनः । नानाश्चर्यमयानन्त-दिव्यप्रासादमालिनः ॥१३॥ साप्सरो भूरिसङ्घस्य सदिव्यमृगपक्षिणः । पुरस्य दिवि लोकानां लोकस्य परिचिन्तनम् ॥१४॥ तथा भगवतो व्यूहविभवार्चा-व्यवस्थितेः । अन्तःस्थितेश्च जगतां सृष्ट्यादेश्च विचिन्तनम् ॥१५॥ इसी क्रम में आगे ऐसे पुरी (नगरी) का जिसमें विमान, मण्डप, उद्यान, वापी तथा कूप विद्यमान है, जिसमें अनेक आश्चर्यकारी, अनन्त एवं दिव्य प्रासाद (मन्दिरों) की पंक्तियों से (जो) शोभित हैं, जहां अप्सराओं से पूर्ण अनेक समुदाय विद्यमान है, जहां दिव्य मृग तथा पक्षिगण हैं ऐसे दिव्य लोक (स्वर्ग) के निवासीजन तथा लोक का चिन्तन किया गया है। इसी प्रकार जहां भगवान् श्रीवासुदेव तथा इनके चतुर्व्यूह उनके रामादि अवतार मय विभव, अर्चा में श्रीवैकुण्ठनाथादि की व्यवस्था तथा जगत् में अन्तर्यामित्व तथा सृष्टि, प्रलयादि का विचार है॥१३-१५॥ प्रधानमहदादीनां तत्त्वानामवबोधनम् । अण्डानां कालतत्त्वानां लोकानां भूतसंहतेः ॥१६॥ जहाँ प्रकृति तथा महत् तत्व, इन्द्रिय तथा तन्मात्रादि तत्वों का स्वरूप, ब्रह्माण्डों लोकों तथा काल तत्वों, पञ्चमहाभूतों तथा उनसे उत्पन्न जन्तुगण का भी विचार करना है॥१६॥ परसम्बन्धविज्ञानं प्रकृतेः पुरुषस्य च । कर्मयोगस्य विज्ञानं धर्माणाञ्चाप्यशेषतः ॥१७॥ ज्ञानयोगस्य विज्ञानं भक्तियोगस्य चाखिलम् । तथैव न्यासयोगस्य साङ्गस्य परिचिन्तनम् ॥१८॥ प्रकृति तथा पुरुष के भगवत्शरीर स्वरूप तथा सम्बन्ध का विशेष चिन्तन, कर्मयोग
१४८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता तथा विशेषरूप में धर्मों का चिन्तन, इसी प्रकार ज्ञानयोग तथा भक्तियोग का समग्र विचिन्तन करना और बाद में सांग समग्र न्यासयोग विषयक विवरण तथा इस विषय पर चिन्तन करना॥१७॥१८॥ इहैव फलरूपाया वृत्तेः सम्यक् प्रदर्शनम् । देहान्निष्क्रमणस्यापि मार्गस्य च विचिन्तनम् ॥१९॥ इस लोक में फल प्राप्ति रूप वृत्ति के पूर्णरूप से विवरण के बाद इस शरीर के छोड़ने के पश्चात् निष्क्राम प्राप्त जीव के अर्चिरादि मार्गों से उत्तमकान्तिरूप यात्रा का चिन्तन॥१९॥ दिव्यलोकस्य सम्प्राप्त्या भर्तुरालोकनार्चया । निरस्तातिशया प्रीतिः सदा तस्याश्च भावना ॥२०॥ जीवकी यात्रा के क्रम में उसका दिव्य लोक की प्राप्ति तथा अपने स्वामी इष्ट देश परमेश्वर का जो परमपद के साधन भी हैं-दर्शन प्राप्ति से निरवधि प्रीति तथा उसकी स्थिति का चिन्तन॥२०॥ भगवच्चरणाम्भोजानुभवप्रीतिजन्मनः । कैङ्कर्यस्य परा काष्ठा या तस्याश्च विचिन्तनम् ॥२१॥ और आगे दिव्यलोक में अवस्थित श्रीमन्नारायण के चरण कमलों का दर्शन, सेवा का अनुभव तथा उससे होनेवाली प्रीति की उत्पत्ति से दासभावना की परमानन्दा दात्री स्थिति की पराकाष्ठा का विचार॥२१॥ अनादेर्मोहकलनात् संसारावृत्तिहेतवः । प्रभवन्त्यात्मनां कर्म-वासनारुचयो यथा ॥२२॥ यथा रागादयो दोषा नित्यं चात्मगुणच्छिदः । कारणान्यपचारेषु क्षिपन्ति च तथा मतिः ॥२३॥ इसी क्रम में अनादिभूत माया (अविद्या) के सम्बन्ध में संसार में बार बार आकर जन्म प्राप्त करने के कारणभूत कर्मों की वासना तथा रुचि जैसी उत्पन्न होती है तथा अहिंसा आदि अध्यात्मगुणों के अनुरोधक राग आदि पुण्य पापकर्मादि के द्वारा संसार के बीजभूत तत्व बनकर दोषरूप में आते हैं तथा वे ही कारण होकर जीव को ऐसे अपचारों (पातकादि दोषों) में गिरा देते हैं, कैसी बुद्धि के उत्पन्न हो जाने की चिन्तना॥२२-२३॥ विमर्श इह दुःखानां यातनानां परत्र च । विषयाणाञ्च हेयत्वदर्शनं दृष्टिरुच्यते ॥२४॥ इस लोक में प्राप्त होनेवाली दुःखोंकी तथा परलोक में प्राप्त होनेवाली यातनाओं
हिन्दीटीकासहित १४९ का विचार तथा सुखदुःखादि सांसारिक विषयों की हेयता का प्रतिपादन करना आदि ये सभी 'दृष्टि' कहलाते हैं॥२४॥ सैषा सुदृष्टिर्वृत्याख्यतरोर्मूलमुदाहृता । अतोऽन्यथा कुदृष्टिर्हि तस्य सा मूलघातिनी ॥२५॥ यह दृष्टि ही इस वृत्तिभूत पूर्व कथित वृक्ष की मूल या जड़ मानी गयी है तथा इसके विपरीत दृष्टि कुदृष्टि कहलाती है जिससे मूल का ही विघात माना गया है॥२५॥ प्रथमासनसंस्कारो निषेको विधिपूर्वकः । संस्कारास्त्वाव्रतादेशात् तत्र भोगक्रमा हरेः ॥२६॥ वृत्तिरूप वृक्ष का मूलबन्ध तथा विहिताचार भगवदिज्या आदि के विचारक्रम में सर्वप्रथम वेदादि शास्त्राविधि से विहित गृहाश्रम में होनेवाला गर्भाधान संस्कार तथा इसी के आगे व्रतादेश तक के (पुंसवन, सीमान्तोन्नयन, जातकर्म, नामकर्म, अन्नप्राशन, चौल तथा उपनयनादि व्रतबन्ध तक) संस्कारों का उपचारक्रम श्रीहरि के उपचार के क्रम में प्रथम संस्कार माना गया है॥२६॥ द्वितीयमासनं विष्णोरस्योपनयनक्रिया । ज्ञानान्तास्तत्र संस्कारा बोद्धव्या भोगसम्पदः ॥२७॥ इसके आगे श्रीहरि के उपचार क्रम के द्वितीय संस्कार के क्रम में इसका उपनयन क्रिया से लेकर वेदारम्भ तथा समावर्तन पर्यन्त संस्कार इसके भोग सम्पत्ति के क्रम में ज्ञानासन के रूप में आते हैं॥२७॥ वैवाहिको विधिर्धर्मो यस्तृतीयं तदासनम् । गृहस्थधर्मा ये तत्र ते प्रसाधनविग्रहाः ॥२८॥ तथा धर्मभाव से अनुष्ठित विवाह संस्कार तृतीय आसन रूप है जहां गृहस्थों के आचार योग्य धर्मों का पालन होना प्रसाधनभूत अलंकार सदृश उपाचार क्रम में श्रीहरि के आता है॥२८॥ योगक्षेमविधिर्नित्यस्तच्चतुर्थमिहासनम् । ततः परेऽखिला यज्ञा हविषां विनिवेदनम् ॥२९॥ वनस्थाश्रमसम्प्राप्तिर्हरेः पञ्चममासनम् । नियमा ये च तत्र स्युस्ते वै भोगास्तदाश्रयाः ॥३०॥ इस गृहस्थ की वृत्ति के लिये भोग्यासन के रूप में जो अर्थार्ज्जनरूप योगक्षेम विधिवत् नित्य अपेक्षित है तथा जिसमें अग्निष्टोमादि यज्ञों के द्वारा (श्रीहरि एवं देवगण को), हवि समर्पण करने के आचारभूत कर्मवाला श्रीहरि के उपचार का आसन चतुर्थ स्थानीय
१५० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता है। इस आश्रम के आगे वानप्रस्थ के प्राप्त हो जाने पर वह श्रीहरि के उपचारभूत रूप में पंचम आसन (होता) है जहां वन में स्थित रहकर आश्रम के नियत तथा उनके अनुरूप पदार्थों का भोगरूप में सेवन करना विहित है॥२९-३०॥ यत् प्रव्रजन्ति तत् षष्ठमासनं परमात्मनः । योगाख्यमतुलं शुद्धं तद्धर्मास्तित्र सत्क्रियाः ॥३१॥ इसके बाद अधिकारानुरूप जो प्रव्रजनरूप (सन्यास नामक) आश्रम है वह परमेश्वर के उपचार क्रम में षष्ठ स्थानीय है जिसका नाम योगसंस्कार है जो परमशुद्ध तथा अतुलनीय है। सन्यास के धर्मों में किये जाने वाले कर्मभूत उपचार सद्धर्मानुष्ठानरूप है जहां सत्सेवा की जाए॥३१॥ सतामुत्क्रमणादेश्च कर्तव्या विधयः परे । उद्वासनोपचारा वै भवन्ति दिवि शार्ङ्गिणः ॥३२॥ अग्नौ तु परमे व्योम्नि ध्यायेतां नित्यमच्युतम् । वैश्यत्वे चार्णवगतं शूद्रत्वे तु भुवि स्थितम् ॥३३॥ ऐसे सन्त के प्राणों के उत्सर्ग के उपरान्त उसकी उत्तरकालिक विधियों को सम्पन्न करना चाहिए। जिसमें श्रीहरि को अर्पित उद्वासनादि उपचार होते हैं। इसमें अग्नि तथा परम आकाश में स्थित अच्युत का ध्यान करते हैं (क्रमशः) ब्राह्मण तथा क्षत्रिय के लिये और वैश्य के लिये समुद्र में स्थित तथा शुद्र के लिये पृथ्वी पर स्थित अच्युत का ध्यान करते हैं॥३२-३३॥ इत्थं वर्णाश्रमादीनां नित्यनैमित्तिकादिकम् । विहितं कर्म सकलं विष्णोराराधनं परम् ॥३४॥ इस प्रकार वर्ण तथा आश्रम आदि के नित्य एवं वैमित्रिक सम्पूर्ण विहित कर्म श्री विष्णु की परमाराधना है॥३४॥ निबोधत महाप्राज्ञस्तदेतदखिलं पुनः । वृत्त्याख्यस्य तरोरेव सुदृढं मूलबन्धनम् ॥३५॥ हे मुनिगण! इस सभी को निश्चित रूप में आपको समझाना आवश्यक है जो कि वृत्तिनामक वृक्ष के सुदृढ़ मूलबन्ध के रूप में सदा अव स्थित है॥३५॥ त्यागेन कर्मणां स्वस्य निषिद्धकरणेन च । आज्ञातिक्रमणं यत् तन्मूलबन्धोपघातकम् ॥३६॥ तथा अपने विहित कर्मों के परित्याग से तथा कर्मों के आचरण करने से जो श्रीहरि की आज्ञा का अतिक्रमण होता है वह वृत्तिवृक्ष के मूल बन्ध का उपघात करनेवाला होता है॥३६॥
हिन्दीटीकासहित १५१ विहितैवमुपावृत्तिर्विशुद्धपरिवारके । विशुद्धे ब्रह्मणि परे प्रीत्या सा भक्तिरुच्यते ॥३७॥ अतएव विशुद्ध भावादि सम्पन्न परिवारवाले (देवतान्तर्यामिभाव सहित) अपने स्वरूप में अवस्थित परब्रह्म में जो वृत्ति आराधनात्मक रूप में विधिपूर्वक बतलायी गयी है वही, अतिप्रीति से सम्पन्न की जाए तो भक्ति कहलाती है॥३७॥ श्रुतिस्मृतीतिहासाद्यैर्दिव्यार्षागमविस्तरैः । ब्रह्मसूत्रपदैर्मन्त्रैः सन्निबन्धैः सयुक्तिभिः ॥३८॥ नाथस्य रूपविभवस्वरूपगुणकर्मणाम् । कीर्तनं ख्यापनं चिन्ता भृशं व्यक्तिषु चादरः ॥३९॥ स्तुतिर्नतिः परिक्रमः प्रीतिरात्मनिवेदनम् । उपहाराच्छेषरतिः समीपपरिवर्तनम् ॥४०॥ दिव्यार्चायतन-ग्राम-पुर-राष्ट्रादिसम्पदाम् । निष्पादनं तथारामतटाकादि-प्रकल्पनम् ॥४१॥ स्थापनार्चन-यात्रादिमङ्गलानां प्रवर्तनम् । आस्थानासनयोग्यानां पात्रोपकरणस्य च ॥४२॥ स्नानप्रसाधनहविः शय्यान्तः पुरसम्पदाम् । सङ्ग्राममृगयाणाञ्च क्रीडोपकरणस्य च ॥४३॥ दिव्यानां मानुषाणाञ्च सेवकानां पृथक् पृथक् । अन्येषाञ्चैव भोगानां चेतनाचेतनात्मनाम् ॥४४॥ निष्पादनं रक्षणञ्च संस्क्रियोपनयादि च । भक्त्या च नियतौत्सुक्यं स्वयमाराधनक्रियाः ॥४५॥ श्रुति, स्मृति तथा इतिहास पुराण आदि के तथा श्रीहरि के उद्गारभूत वैष्णव तन्त्रादि के, ऋषियों के उपदेशों से प्रवर्तित संहिताओं के विस्तार से ब्रह्मसूत्र के मन्त्रभूत निबन्धनों से तथा विद्वानों के द्वारा निर्मित न्यायतत्व जैसे शास्त्रीय निबन्धों तथा उनकी तर्कपूर्ण युक्ति आदि से श्रीनारायण के रूप, विभव, स्वरूप, गुण तथा कर्मों का जिसमें उनके विग्रह, विभूति, स्वरूप, गुण तथा चेष्टाओं पर विमर्श है तथा उनके नाम का उच्चारण, दूसरे भर को उसका प्रतिपादित रूप प्रख्यापन करना, उसी की चिन्ता रखना तथा अर्चावतार रूप व्यक्तिमें आदर दिखलाना। उन्हीं के स्तोत्र तथा उन्हीं के प्रति प्रणामादि का साष्टांग अर्पण करना, उन्हीं की प्रदक्षिणा करना, स्तुत्यादि से संतुष्ट होकर उनमें प्रीति रखना, उन्हीं के प्रति अपना आत्मनिवेदन प्रस्तुत करना तथा उन्हें ही नवैद्यादि उपहार प्रदान कर उसी के
१५२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अर्पित भक्त अन्न को लेने में रति तथा अर्चावतार के आसपास ही चलते फिरते तथा विद्यमान रहना, दिव्यार्चायतन का निष्पादन अर्थात् निर्माण करवाना (जहां श्रीहरि की अर्चा का धाम न हो), ऐसे ग्राम का, पुर (नगर) तथा राष्ट्र का निष्पादन करना जहां श्रीहरि की अर्चाधाम रहे, तथा इसी प्रकार उपवन, तटाक आदि का श्रीहरि के अर्चाधाम या नाम पर निष्पादन करवाना, श्रीहरि के विग्रह का स्थापन, नित्य आराधन, पक्ष, उत्सव, मासोत्सव आदि के समय श्रीहरि की उत्सवयात्रा या ग्रामप्रदक्षिणादि का निष्पादन करवाना, श्रीहरि के आस्थान या मन्दिर में आसन आदि योग्य वस्तुओं तथा अन्य पात्रादि उपकरणों का दानरूप में निष्पादन करना तथा प्रेरित कर दूसरों से भी ऐसा ही दानादि करवाना तथा उस आस्थान में उपयोगार्थ स्नान, प्रसाधन के उपयोगी पदार्थ या अलंकार, हवि, पदार्थ, शय्यादि वस्तु, अन्तःपुर के उपयोगी समृद्ध उपकरण, संग्राम तथा मृगया के उपयुक्त पदार्थ तथा श्रीहरि के उपयुक्त (श्रीहरि के हेतु) उपकरण भूत पदार्थों का आस्थान में प्रेषण करवाना, इसी प्रकार दिव्य इष्ट के, मानवों के तथा सेवकों आदि के उपयुक्त भोग्य पदार्थों तथा भोज्यपदार्थों का (जो चेतन एवं अचेतन रूप हैं) तदर्थ भिजवाना, इन पदार्थों का उत्पादन करवाना, इनका संरक्षण करना, इनकी संस्काररूप निगरानी करते हुए इन्हें शुद्ध रखवाना, निश्चित उत्सुकता के साथ भक्तिपूर्वक यह सभी स्वयं करने का कार्य भी आराधना किया (भक्ति का कार्य) है॥३८-४५॥ इत्येतत् सकलं काण्डस्कन्धशाखादलाङ्कुरम् । देवतान्तरभक्तिस्तु निरासस्तस्य हाऽशनिः ॥४६॥ इस प्रकार यह भी उस तरु की शाखा, टहनियां, ऊपर पहुंचनेवाली शाखाएं उसके पत्ते तथा अंकुर रूप विस्तार है परन्तु अन्य या अनेक देवताओं की भक्ति इस वृक्ष पर गिरनेवाली बिजली समझाना चाहिए (जो इस वृक्ष को क्षति पहुंचाती है)॥४६॥ अथ पुष्पं फलञ्चास्य लक्ष्म सत्सेवनन्तथा । युक्तोऽप्यन्यैर्विना पुष्पैः फलैरवति कस्तरुः ॥४७॥ इस वृत्तिरूप वृक्ष का 'पुष्प' होता है पंचलक्ष्म (चिन्ह) तथा सत्सेवन इसका फल माना जाता है अतएव यदि वृक्ष पुष्प तथा फल से युक्त न हो तो उसकी रक्षा कौन करेगा (अतः पुष्प तथा फलों के लिये वृक्ष का रक्षण करना आवश्यक है)॥४७॥
हिन्दीटीकासहित १५३ प्रतप्तैर्भगवद्दिव्यायुधैर्गात्रेषु लाञ्छनम् । सततञ्च हरिक्षेत्रोद्भू-मृत्स्नोर्ध्वपुण्ड्रकः ॥४८॥ पद्मबीजमयी माला तुलसीदिव्यचूर्णकम् । पवित्रञ्चाथ कौपीनं व्यतिस्यूता च मेखला ॥४९॥ लक्षणों में शरीर के उपयुक्त स्थानों पर अग्रजन्मा जन को श्रीहरि के प्रतप्त दिव्यायुधों का लाञ्छन अंकित करवाना चाहिए तथा सदैव श्रीहरि के पुण्यक्षेत्रों से लायी गयी मृत्तिका से ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाना चाहिए, कमल के बीजों की बनी हुई माला को तथा तुलसी हरिद्रा के चूर्ण को (मस्तक पर) धारण करना चाहिए, शुभ्र धौत एवं पवित्र कौपीन तथा कटिसूत्र का धारण करना चाहिए॥४८-४९॥ पञ्चायुधाब्जताक्ष्र्यादिलक्षणाभरणादिकम् । वेषश्चानुल्बणः शौक्ल्यं दन्तहृत्पुण्ड्रवाससाम् ॥५०॥ विष्णोस्तत्संश्रयाणांञ्च चेतनाचेतनात्मनाम् । आख्या व्यपदेशश्च लक्षणानि सतां विदुः ॥५१॥ शरीर पर श्रीहरि के पंचायुध शंख, गरुत्मादि लक्षणों वाले अलंकार तथा उष्णीय आदि को धारण करना चाहिए तथा शुक्ल वर्णके सूक्ष्म वस्त्रादि का परिशुद्धरूप में धारण तथा दन्त, हृदयपुण्ड्र तथा वस्त्रों को शुभ्ररूप में रखना तथा श्रीविष्णु के नाम से उन्हीं के आश्रित चेतन तथा अचेतन रूपवाले व्यक्तियों नामों से व्यवहार रखना ये लक्षण संतों के होते हैं॥५०-५१॥ लक्ष्मणामपचारेण विरुद्धानाञ्च धारणात् । कैङ्कर्यामोदसम्पत्तिर्नश्येन्मोहश्च जायते ॥५२॥ इन लक्षणों के धारण न करने पर अपचार से तथा अन्य देवगण के चिन्हादि के धारण करने पर वृत्ति के कैङ्कर्यामोदन सम्पदा का विघात होता है तथा इससे मोह रूप भ्रम की भी सम्भावना (या स्थिति) निर्मित हो जाती है॥५२॥ पत्युर्ज्ञानमयी वृत्तिर्विष्णोः प्रियमिहोच्यते । ये सन्ति तत्र निरतास्ते सन्त इति कीर्तिताः ॥५३॥ सर्वात्मना हि या वृत्तिस्तेषु भक्तिमयी परा । सा भक्तेः परमा काष्ठा वृत्तेश्च परमात्मनि ॥५४॥ आचार्यवद्दैवतवन्मातृवत्पितृवत्स्ववत् । सुहृद्वत् स्वामिवत् सन्तो दृष्टव्या राजवत् तथा ॥५५॥ अब स्वामी श्रीनारायण की ज्ञानमयी तथा प्रिय वृत्ति को बतलाते हैं। जो श्रीविष्णु के आराधक इस इष्टज्ञान की दृष्टि रखते हुए अपने आराध्य में निरत रहें उन्हें
१५४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता सत्जन या सन्त कहते हैं। तथा इनमें जो भक्तिमयी उत्कृष्ट वृत्ति सर्वात्मना अपने इष्ट परमात्मा में पराकाष्ठा तक पहुँच जाती हो वही भक्ति की पराकाष्ठा रूप सद्वृत्ति हैं। संत आचार्यों को समान, अपने आराध्य देव के समान, माता और पिता के समान, अपने विश्वस्त मित्र की तरह, अपने स्वामी के समान तथा अपने शासक नृप के समान देखते हुए उनके अनुरूप प्रीति रखना चाहिए॥५३-५५॥ श्रुत्वैव सहसोत्थानम्प्रत्युत्थानं सुदूरतः । दर्शनानुभवप्रीतिः प्रणिपातोऽभिवादनम् ॥५६॥ इनके आगमन को सुनते ही बिना किसी विलम्ब के अपने स्थान से उठ जाना चाहिए तथा दूर तक आगे चलकर इनकी अगवानी करना चाहिए, इनके दर्शन के साथ अपनी प्रीति का अनुभव तथा उन्हें आदरपूर्वक नमस्कार अथवा अभिवादन करना चाहिए॥५६॥ नीचैः संश्लेषणं हस्तदानं मार्गप्रदर्शनम् । पश्चात्पार्श्वपुरोयानञ्जयालोकाभिभाषणम् ॥५७॥ झुककर विनयपूर्वक उनके हाथ को लेते हुए किसी बात को बतलाना चाहिए तथा बाद में उनकी बाजू से आगे चलकर उनकी जय का उद्घोषण आदि करना चाहिए॥५७॥ गृहोपनयनञ्चान्तर्देशक्रमणमासनम् । पादावनेजनञ्चार्घ्योपहारः स्वागतादि च ॥५८॥ उन्हें अपने निवास पर लाना चाहिए तथा घर के सभी कक्षादि स्थानों पर उन्हें ले जाना चाहिए तथा योग्य आसन पर उन्हें बिठाकर उनके पादप्रक्षालन, अर्घ्योपहार तथा स्वागतादि प्रस्तुत करना चाहिए॥५८॥ प्रसादनं क्षमापणञ्च प्रीतिसङ्कथनानि च । उपासनं प्रश्रयणमात्मात्मीय निवेदनम् ॥५९॥ उनके प्रसादन हेतु प्रसीद जैसे शब्दों का कथन विनयपूर्वक करना चाहिए तथा क्षमा प्रार्थना कर प्रीतिपूर्वक संभाषण करना चाहिए, उनके समीप ही स्वयं को बैठना, विनय तथा आत्मीयभाव का निवेदन करना चाहिए॥५९॥ आज्ञाम्यर्थनमालोकनिर्देशवचनादरः । साधनं सम्पदादिष्टादरोऽनिष्टनिवर्तनम् ॥६०॥ किसी कार्य के होने पर उनसे आज्ञा कीजिये कहना, उनके द्वारा देखने आने पर उनके आज्ञा वचनों पर आदर करते हुए उनके लिये शाकफलादि भोजनयोग्य सामग्री का पकाना आदि कार्य के साथ ( इष्ट आदर तथा उसी से अपना अनिष्ट का
निवारण बतलाना चाहिए)॥६०॥ विरहानर्थपीडावमाननाद्यसहिष्णुता । दास्याभिमानोऽनुव्रज्या श्रवणं कीर्तनं स्मृतिः ॥६१॥ भक्तिज्ञानसमाचारवैराग्याद्यनुमोदनम् । सङ्गेच्छोपगमनमन्वक्स्थानासनादिकम् ॥६२॥ उनके विरुद्ध की, उनकी अर्थहानि की, उनकी पीड़ा की, उनके किसी द्वेषी जन द्वारा किये गये तिरस्कार की असहिष्णुता का निवेदन करना चाहिए तथा उनके दास्य का अपना निश्चय तथा उसका अभिमान बतला कर उसके अनुगमन, उनके योगक्षेम तथा गुणों का श्रवण, स्वयं उनकी बातों का तथा नामादि का उल्लेख कर बात करना तथा उनकी पिछले गौरव का स्मरण करना, उनके द्वारा आचरित या बुद्ध भक्ति, ज्ञान का तथा वैराग्यमय आचारादि का अनुमोदन करना, उन्हीं के उद्देश्य से उनके समीप जाना तथा उनके पीछे स्थित होना, बैठना आदि करना चाहिए॥६१-६२॥ समानसुखदुःखत्वं मिथश्चार्थ-विचिन्तनम् । क्रियाकाले तु वरणं सदस्याग्रे तु पूजनम् ॥६३॥ परिषत्सु च सान्निध्यं संविदाञ्च प्रवर्तनम् । तथास्यानुज्ञापूर्वञ्च सर्वार्थेषु प्रवृत्तयः ॥६४॥ उनके सुख तथा दुःखों में अपनी समान स्थिति निदर्शित करना, परस्पर किसी शास्त्रादि अर्थ पर विचार करना (या उसमें सहयोग करना) स्वयं के यज्ञादि अनुष्ठानों के सम्पादन में उनका योग्य स्थिति में वरण करना, श्रेष्ठ सदस्य के रूप में उनकी अनुरूप अर्चना, परिषद् या सभा में उनके समीप रहना, उनकी किसी शास्त्रादि प्रतिज्ञा के होने पर उनका विषयादि प्रवर्तन करना तथा सभी अपेक्षित कार्यों में उनकी आदेशमयी अनुज्ञा के अनुरूप कार्यों का सम्पादन करना॥६३-६४॥ प्रच्छादनञ्च दोषाणां गुणानां ख्यापनन्तथा । क्वचिच्चैवाप्यधर्मेण कृच्छ्रेणाप्यर्थसाधनम् ॥६५॥ एताश्चान्याश्च विविधा वृत्तयो रसनिर्भराः । विष्णुभक्तेषु वृत्त्याख्यतरोर्हि फलसम्पदः ॥६६॥ उनके स्खलन या दोषों का प्रच्छादन करना तथा गुणों का प्रख्यापन करना तथा आवश्यक होने पर किसी अवसर पर कष्ट के उपस्थित हो जाने पर किसी अधर्म की भी किञ्चिद् वृत्ति का आश्रय लेकर उद्दिष्ट अर्थ साधन कर लेना। ये सभी तथा इन्हीं के
१५६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता समान कुछ दूसरी भी भक्ति से प्रेरित तथा संचालित वृत्तियां है जिनकी प्रवृत्ति रखी जाए। ये ही विष्णु भक्तों में वृत्तिनामक वृक्ष की रसपूर्ण फलवृत्ति या सम्पत्ति कहलाती है॥६५-६६॥ सतामाचार्यमुख्यानामपचाराः पृथग्विधाः । असतामिव संसर्गात्ससूलफलनाशनाः ॥६७॥ सन्तभूत वैष्णव तथा आचार्यों के विषय में होनेवाले अपचारों को अलग रूपवाले समझना चाहिए जो असज्जन के संसर्गवत् मूलसहित फल के विघातक होते हैं॥६७॥ दास्यामृतरसास्वादतृर्षादत्यन्तमेशितुः । वैरस्येन विरुद्धानां हानं वैराग्यमुच्यते ॥६८॥ परमेश्वर श्रीहरि के दास्यरूप अमृत के आस्वादन की तृष्णा के कारण अत्यन्त विरस लगने वाले संसार के त्याग करनेवाला तथा संसार को विघ्न माननेवाला भाव 'वैराग्य' कहलाता है॥६८॥ श्रुतिभिः पञ्चरात्रेण स्मृतिभिस्तत्वदर्शिभिः । दर्शितान्यर्थतत्वानि न हि मन्दधियो विदुः ॥६९॥ ब्रह्मरुद्रमुखा देवा विविधाश्च महर्षयः । मनुष्या नागयक्षाश्च सिद्धविद्याधरास्तथा ॥७०॥ तत्तत्कार्योपपत्त्यर्थ शासनाच्च जगत्पतेः । रजस्तमोऽभिभूत्या च जगुः शास्त्राण्यनेकंशः ॥७१॥ विपरीतार्थतत्वानि क्षुद्रनानाफलानि च । अपवर्गकथावन्ति मोहनान्यद्भुतानि च ॥७२॥ तत्वदर्शीजन के द्वारा वेदादि, पञ्चरात्र, स्मृति, पुराण तथा इतिहासादि के द्वारा दृष्टितत्व या अपेक्षित अर्थों का तात्विक रूप दिखलाया गया है परन्तु उसे मन्दबुद्धि जन तात्विकरस में समझने में अक्षम हैं। अतएव जगत्पति श्रीविष्णु के निदेश के कारण ब्रह्मा तथा रुद्र आदि देवों ने तथा अनेक विभिन्न मतों वाले महर्षिगण ने, मनुष्य, नाग, यक्ष, सिद्ध, विद्याधर आदि ने अपेक्षित अनेक कार्यों तथा प्रयोजनों को प्राप्त करने के लिये तथा रजोगुण एवं तमोगुण से अभिभूत क्रियाओं से युक्त अनेक उपाय भूत ऐसे तन्त्रादि शास्त्रों का कथन किया जिनमें वास्तविकता से परे विपरीत अर्थ तथा तत्वों का मिश्रण भरा हुआ है तथा जिनके लिये अनेक छोटे छोटे उद्देश्यों की पूर्ति देनेवाले फल हैं तथा जिनमें मोक्ष प्राप्ति तक की बाते कहीं हुई हैं, ऐसे अद्भुत एवं बुद्धि को मोहित करनेवाले विवरण या अर्थ उनमें कहे गये हैं॥६९-७२॥
हिन्दीटीकासहित १५७ अपरेषामपि पुनस्तत्तन्मार्गानुसारिणाम् । धर्मवादच्छलोपेता ये च स्युर्ग्रन्थविस्तराः ॥७३॥ हरेरालोकहीनानामद्यापि किल पश्यत । तेषु तेष्ववगाहेन भवन्ति ज्ञानविप्लवाः ॥७४॥ इसके अतिरिक्त कुछ अन्य हैरण्यगर्भ, पशुपत आदि आगमों के जो पूर्वकथित शास्त्रों से भिन्न हैं तथा ये धर्मवाद के छलों से भरे हुए हैं। इनके समान ही अन्य जो ग्रन्थ तथा उनके तात्विक विस्तार मूलक ग्रन्थ है वे भी धर्मवाद का भ्रम उत्पन्न करनेवाले हैं। ये सभी श्रीविष्णु के तात्विक ज्ञानमय प्रकाश से रहित हैं जिन पर श्रीहरि की दृष्टि नहीं तथा ऐसे अनेक प्रबन्ध ग्रन्थ तथा उनके विस्तार से तात्पर्य दिखलाने वाले प्रबन्धों के अनुशीलन करने से ज्ञान का विप्लव होता है यह तत्व ध्यान देने योग्य हैं॥७३-७४॥ वेदानां सोपनिषदां पौरुषेयत्वचिन्तनम् । पञ्चरात्रे च सकले तन्त्रान्तरसमत्वधीः ॥७५॥ ऐसे ग्रन्थों तथा प्रबन्धादि में उपनिषद् के सहित सभी वेदों को पौरुषेय प्रतिपादित करने की मति या तर्कादि दिये गये हैं। समग्र पञ्चरात्र जैसे आगम या तन्त्र को इसी आधार पर अन्य तन्त्रोंकी समान कोटि में रखकर उनके समान रूप से मानने की बुद्धि होती है॥७५॥ वृद्धानाञ्चैव मुक्तानां नित्यानाञ्च तथात्मनाम् । अच्युतादन्यशेषत्वशङ्का च समताभ्रमः ॥७६॥ जिन शिवादि देवों में अच्युत श्रीनारायण की समता बुद्धि आ जाती है तथा वृद्ध, मुक्त तथा नित्यभूत जीवों की अन्य शेष के समान स्थिति की आशंका को दिखलाकर जहाँ समता कही है॥७६॥ तस्य चान्येशितव्यत्वबुद्धिर्विश्वपृथक्त्वधीः । विभूति-गुण-रूपादि विशेषविरहभ्रमः ॥७७॥ और इस प्रकार उन श्रीनारायण का अन्य इष्टदेव के समान ही महत्व तथा ज्ञान को दिया जाता है तथा उनकी विभूति, गुण तथा रूपादि विशेष से रहित तत्व से विश्व से अपृथत्व की बुद्धि दिखलाकर भ्रम उत्पन्न किया जाता है॥७७॥ अन्यतो जगदुत्पत्तिस्थितिप्रलयचिन्तनम् । योगानाञ्चैव सर्वेषां नित्यादेः कर्मणस्तथा ॥७८॥ ज्ञान-भक्त्यङ्ग-सत्सेवा तत्वानां चाविचिन्तनम् । विरुद्धानाञ्च सर्वेषामपायत्वविमर्शनम् ॥७९॥
१५८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता तथाऽनादेरविद्यायाः स्वरूपस्यानिरूपणम् । हरेरालोकनान्तायास्तस्याश्चान्यनिवर्त्य-धीः ॥८०॥ फलानां चान्यतः प्राप्तिश्चिन्ता निःश्रेयसस्य च । हरेः कैङ्कर्य सम्प्राप्तिर्व्यतिरिक्तामृतत्वधीः ॥८१॥ विशेषेणाप्यनर्थेषु देहादिष्वर्थतामतिः । इत्यादयो बहुविधा महापापाः कुदृष्टयः ॥८२॥ जगत् की उत्पत्ति आदि का श्रीनारायण के अतिरिक्त किसी अन्य से निरूपण करना तथा सभी कर्म, ज्ञान तथा भक्ति योगों का तथा नित्यादि पदार्थों तथा कर्मों एवं नैमित्तिक कर्मों का भी इसी प्रकार नारायण से भिन्न उपादान के रूपों में चिन्तन करना तथा दान या दृष्टि, शंख चक्रादि अंकों, सत्सेवा आदि के तत्वों की विचिन्तना से दूर हट जाना और सभी विरोधी उपायों, तत्वों (दृष्टि, अंक, सत्सेवा के विरुद्ध उपायों का जैसे महत् तत्व आदि का स्वरूपादि विचार करना। इसी प्रकार अनादि माया स्वरूप अविद्या का स्वरूपगत विचार न करना तथा उसी अविद्या की श्रीहरि के दर्शन या प्राप्ति के बाद निवृत्ति होने की स्थिति को न मानकर किसी अन्य उपाय से निवृत्ति का ज्ञान रखना। इसी प्रकार मोक्षरूप फल की श्रीहरि के अतिरिक्त किसी दूसरी विधि से प्राप्ति मानना और श्रीहरि के दासभाव की प्राप्ति से भिन्न अमृतत्व (मोक्ष) प्राप्ति की स्थिति का चिन्तन करना या उसे मानना। ये सभी तथा इनके अतिरिक्त देहादि स्थूल पदार्थों में विशेषरूप में आत्मत्व की निष्ठा बुद्धि रखना आदि ये अनेक प्रकार के कुदृष्टि रूप महाघातक हैं जो भ्रमोत्पादक तथा श्रीहरि की भक्ति में बाधक हैं॥७८॥ हरेः प्रियतमं ज्ञानं सन्तो ज्ञानधना ह्यतः । तथैव चापचाराणां काष्ठा ज्ञानविपर्ययः ॥८३॥ अतएव श्रीहरि को एक तो सत् दृष्टि वाला ज्ञान तथा इस ज्ञान के रखने वाले सन्त ही प्रिय हैं। इसी प्रकार अपकारों की पराकाष्ठा (अधिक प्रमाण में आचरण होते रहना) इस ज्ञान की विरोधी स्थिति होती है (जो हेय है)॥८३॥ ज्ञानस्य कर्मणा गुप्तिर्हतं ज्ञानमकर्मणा । प्रवृत्त्या प्रतिषिद्धेषु ज्ञानं कर्म च नश्यति ॥८४॥ सत् ज्ञान का संरक्षण विहित कर्म के द्वारा होता है तथा कर्मों के आचरण न करने पर ज्ञान का भी हनन हो जाता है, क्योंकि यदि प्रवृत्ति इनमें अवरुद्ध हो जाए तो उनमें कर्म तथा सत्ज्ञान का भी विनाश हो जाता हैं॥८४॥
हिन्दीटीकासहित १५९ अचिन्ता च विनिन्दा च मतिपूर्वञ्च वर्जनम् । विहितानाञ्च धर्माणां सर्वज्ञात्मावघातकम् ॥८५॥ स्वरूपस्य विनाशाय रुचिर्निन्द्येषु कर्मसु । विषयेषु च सर्वेषु लौल्यं विष-मधु-स्पृहा ॥८६॥ विष्णोर्विद्वेषयुक्तस्य वैमुख्यं प्रतिपत्तिषु । प्रवृत्तिश्चापचारेषु सम्यगात्मविनाशनम् ॥८७॥ इसलिए वास्तविक तत्वों का चिन्तन न करना, ऐसी धर्मादि प्रवृत्ति की निन्दा या तर्कादि के सहारे से ऐसे तत्वों का बुद्धिपूर्वक प्रतिरोध करना तथा विहित धर्म तथा कर्माचरणों का ऐसी सर्वत्र आत्स्या से विघात करना उसके स्वरूप के नाश करनेवाला है। इसी प्रकार जो निन्द्य (त्याज्य) कर्मों में रुचि रखना तथा सभी विषयादि में रुचि तथा लौल्य वृत्ति रखना विषपूर्ण मधु की स्पृहा के करने जैसी विघातक होती है। इसके अतिरिक्त जो श्रीनारायण के प्रति द्वेषभाव या अनास्था से युक्त है तथा इनके सम्यक् ज्ञान से जो विमुख है, जो दोषों या अपचारों में स्वार्थवश प्रवृत्ति रख रहा हो तो ये सभी कार्य आत्मविनाशक होते हैं॥८५-८७॥ अन्य-तान्त्रिकदेवानां संसर्गप्रतिपत्तिषु । प्रवृत्तिरच्युतैकान्त्यनियमाध्वरनाशिनी ॥८८॥ इसी प्रकार अन्य तन्त्रादि में निर्दिष्ट उपास्य देवों में निष्ठा, उनके उपासकों के साथ संसर्ग तथा उनकी आचार तथा कर्मादि विधि में ज्ञान तथा ज्ञानपूर्वक प्रवृत्ति रखना ये सभी कार्य श्रीनारायण के अनन्यभाव (एकात्य) के नियमरूप यज्ञ को विनाश करनेवाले कहे गये हैं॥८८॥ लक्षणानि हि पुष्पाणि मुकुन्दचरणार्चने । तदभावपरीभावौ प्रध्वंसनकरावुभौ ॥८९॥ शंखचक्रादि अंकनरूप लक्षणों का धारण करना श्रीहरि के चरणों में अर्पित अर्चना के पुष्प हैं तथा इनको न धारण करना या इनका तिरस्कार करना, ये दोनों कार्य श्रीनारायण के एकान्त्यभाव के विघातक हैं॥८९॥ अन्यपुण्ड्राङ्कनादीनां धारणं दृष्टिनाशनम् । परचिह्नव्रणं गात्रे भ्रंशाय नरकाय च ॥९०॥ अन्य आगमों में बतलाए हुए चिन्ह तथा पुण्ड्रादि का अंकन तथा धारण करना श्रीहरि की दृष्टि में विघातक है। अतएव दूसरे चिन्हों का शरीर पर रहना केवल व्रणमात्र है जो उसका पतन करता और नरक प्राप्ति करवाने वाला होता है॥९०॥
१६० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता सतामसेवनान्नित्यमसताञ्च निषेवणात् । क्षीयन्ते चाथ नश्यन्ति ज्ञान-वैराग्य-भक्तयः ॥९१॥ सत्सेवा के भाव से प्रेरित न होकर सज्जनों (वैष्णव सन्तों) की सेवा न करने तथा अन्य सन्तभूत असन्तों के संसर्ग तथा सेवन करने से ज्ञान, वैराग्य तथा भक्ति क्षीण होकर बाद में नष्ट हो जाते हैं॥९१॥ महापचारो देवस्य भक्तानाम्भुवि शार्ङ्गिणः । धर्मरक्षानियुक्तानां समयस्य व्यतिक्रमः ॥९२॥ श्रीहरि नारायण देव के भक्तों का पृथ्वी पर अपचार या उनकी उपेक्षारूप दोष का आचरण धर्म की रक्षा से नियुक्त जन की मर्यादा का उल्लंघन होता है॥९२॥ एते चान्ये च विविधा ह्यपचाराः सुदुःसहा । वैराग्यं वर्जनं तेषां लज्जामानमदादिभिः ॥९३॥ अतएव इन बतलाये गये तथा इसी प्रकार के दूसरे उपचार असह्य होते हैं (अतएव इनका आचरण छोड़ देना ही उचित है)। इनके प्रति वैराग्य रखना उचित है तथा इनकी वर्जना है जो लज्जा, मान तथा मद आदि के द्वारा होती है॥९३॥ वृत्तेर्हि जीवितं गुप्तिः सारो वैराग्यमुच्यते । वैराग्ययुक्ता हि नरा यजन्त्यप्रच्युतान्तराः ॥९४॥ वृत्ति का निरन्तर जीवन है उसका संरक्षण करना और संरक्षण का सारभूत तत्व वैराग्य है क्योंकि वैराग्य से युक्त मनुष्य ही बिना किसी प्रयुक्ति या आपदाओं के बीच में आये निर्बाध रूप से श्रीहरि का यजन करने में समर्थ होते हैं॥९४॥ अनुज्झितक्रियायोगा ज्ञानवैराग्यशालिनी । इति भक्तिमयी वृत्तिः पुनरेव प्रपञ्चिता ॥९५॥ जिनमें कर्मयोग निरन्तर बना रहता है तथा ज्ञान और वैराग्य समृद्ध होकर प्रकाशित है ऐसी भक्तिमयी जो वृत्ति है पुनः यहां उसे हमने और भी स्पष्ट दिखला दिया है॥९५॥ इत्थं किलात्मनो न्यासाज्जातो वृत्त्याख्यपादपः । असौ फलमयः सेव्यस्तन्न चोत्पद्यते विना ॥९६॥ इस प्रकार आत्मभर के न्यासयोग से वृत्तिरूप वृक्ष जन्म प्राप्त करता है जिसे फल से सम्पन्न रूप में अवश्य सेवन करना चाहिए जिससे पुनः उत्पत्ति (जन्मादि) की प्राप्ति न हो॥९६॥
हिन्दीटीकासहित १६१ सुसूक्ष्मत्वाद्दुरापत्त्वान्महत्त्वाद् गौरवादपि । ममायं परमो धर्मः प्रोक्तः स्थित्यै पुनः पुनः ॥९७॥ अत्यन्त सूक्ष्म रहनेवाले, कष्ट से प्राप्त होनेवाले, महत्व सम्पन्न तथा गौरव पूर्ण होने के कारण मैंने इस परमतत्वभूत धर्म को बार बार इसीलिये दिखलाया कि इसकी स्थिति दृढ़ हो सके॥९७॥ वृत्तिं सन्तोऽनुभूयेमामनुरूपां हि चात्मनः । परत्र चानुमोदन्ते परमेण विपश्चिताः ॥९८॥ इति श्रीनारदपञ्चरात्रे भारद्वाजसंहितायां परिशिष्टे चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ सज्जन सन्तजन आत्मा के अनुरूप इस वृत्ति का अनुभव करने पर उस वैकुण्ठ लोक में परमज्ञान के साथ प्रसन्नभाव से आनन्द प्राप्त करते रहेंगे॥९८॥ इति श्रीनारदपञ्चरात्र की भारद्वाजसंहिता के परिशिष्टभूत चतुर्थ अध्याय की ‘तत्त्वप्रकाशिका’ नामक हिन्दी व्याख्या समाप्त शुभमस्तु
नारदपञ्चरात्र-भारद्वाजसंहितास्थ-पद्यानामनुक्रमणिका पृष्ठे | पृष्ठे अङ्कितं क्वचिदप्येवं ६० | अनेनैव हि कर्माद्याः २६ अगम्यागमनं हिंसा ७० | अन्ते चैषां प्रकुर्वीत १२१ अग्नीषोमौ हि चक्राब्जौ ६० | अन्यचिह्नाङ्कितान् ७६ अग्नौ तु परमे व्योम्नि १५० | अन्यतन्त्रैकसिद्धानि ७१ अङ्गभावेन शुद्धानां ९२ | अन्यतान्त्रिकदेवानां १५९ अचिन्ता च विनिन्दा १४९ | अन्यतो जगदुत्पत्ति १५७ अजिह्वा सात्विकी १३९ | अन्यथैवाभिमन्यते ८९ अज्ञैःकुदृष्टिभि ९५ | अन्यपुण्ड्राङ्कनादीनां १५९ अतः प्रपत्तिरेवेह ४२ | अन्ये त्ववैष्णवाः सर्वे ८० अतोऽन्यत्राशु ३८ | अन्येषां त्रिदशादीनां ७२ अतो देहस्य कालु ४६ | अन्वयादपि चैकस्य ३१ अत्र केचित् परं तत्वं ८८ | अपचाराँश्च विविधान् ७३ अथ कश्चिदनुग्राह्य १३८ | अपचारे गुरूणाञ्च १२० अथ पुष्पं फलञ्चास्य १५२ | अपदिश्य पितॄन् देवान् ९५ अथ वृत्तिमिमां ८३ | अपरत्वेन चाप्येता ९२ अथ स्त्रीशूद्रसङ्कीर्णा ३७ | अपराधेषु सर्वेषु ११८ अथ स्वकर्मनिरतः ४८ | अपरीक्ष्य चिरं क्षेत्रं १३९ अथानुकूल्यमुख्या ४७ | अपरेषामपि पुन १५७ अयेह बान्धवास्तस्य ८५ | अपिचेत् सेवनपरो ९७ अथैतत् परमर्षीणां १३२ | अबुद्ध्वा परमात्मानं १२९ अथैनममरास्तत्र ८४ | अभक्तमच्युतस्यापि ८२ अथैवं ब्राह्मणो विद्वा ५३ | अभागवतसंसर्गो ४५ अथौपनिषदं चार्थं ५५ | अभीप्सन् विविधान् ३० अधिकप्रीतिरर्चाया ५० | अभ्यर्थितो जगद्धात्र्या ८५ अधिकैः सदृशैर्वापि ६६ | अयञ्च योगो वेदेपु २६ अनन्तज्ञानशक्त्यादि २७ | अयुक्सूत्रैर्व्यतीस्यूतं ६३ अनन्यरतिरव्यन्तं ४१ | अर्चादिष्वर्चयन् ४१ अनादेर्मोहकलना १४८ | अर्चिरादिकया गत्या ८४ अनादेर्वासनायोगा ३८ | अर्च्योऽर्चायां हरि १३५ अनिष्टानां निवृत्त्यर्थ ५९ | अविज्ञातार्थतत्वस्य ३० अनीश्वरोऽहमीशो १०६ | अविज्ञाय सदा शुद्धं ३८ अनुकूलेऽहर्निशुभे ११३ | अवैष्णवं न वन्देत ८२ अनुज्झित क्रियोयोगा १६० | अवैष्णवस्य भुक्तवान्नं १२० अनुज्ञाताः स्त्रियश्चैव १०७ | अवैष्णवात् स्वधर्मस्थात् ८०
हिन्दीटीकासहित १६३ पृष्ठे | पृष्ठे अवैष्णवाद्द्वैष्णवाद् वा १०१ | इत्थं किलात्मनोन्यासा १६० अवैष्णवेभ्यो यत् किञ्चित् १११ | इत्थं प्रसादाद्देवर्षे ८६ अशक्तमपि च स्मर्तु ८३ | इत्थं वर्णाश्रमादीनां १५० अशुद्धा ब्रह्मरुद्राद्या ९१ | इत्येतत परमं गुह्यं ८६ अशुभं रुक्षमासक्तं ७६ | इत्येतत् सकलं काण्डं १५२ अष्टमात् षोडशाब्दाद् वा १०० | इत्यैतैर्लक्षणैर्युक्ता ९४ अष्टोत्तरशतावृत्त्या १२१ | इत्येवं शान्तयः प्रोक्ता १२३ असच्छास्त्राभियोगे तु १२० | इह श्रुत्यादिनियता ३९ असतः प्रतिगृह्णीयात् ११९ | इहैव फलरूपाया १४८ असतां गुणकर्माणि ८३ | ईशभक्तिफलोपाया ८९ असद्दृष्टिं परिहरेत् ५० | ईशे न्यस्तभराणां हि १३२ अस्वन्त्र्नाः सदा नार्यः १३४ | उक्तान्येतानि कर्माणि ८३ अहमस्मि तवैवेति २७ | उच्चैस्तरोदति विपुलो १४६ आचार्यप्रमुखान्नित्यं १२४ | उपवीतं सदा ब्राह्म ७८ आचार्यवद्दैवतवान् १५३ | उपवेश्याथ देवेशं ११० आचार्यश्रोपसन्नाय ३७ | उपासनाविधौ धर्मा ८५ आचार्यायाहरेदर्थान् ६३ | उपासितगुरोर्वर्ष १०८ आचार्योऽपि तथा शिष्यं ६६ | उपास्य वैष्णवान्नित्यं ११५ आज्ञामभ्यर्थनमालोक १५४ | उपेत्यायतनं विष्णो ५७ आतिष्ठेत् पारमैकान्त्य १२४ | ऊर्ध्वपुण्ड्रं ललाटे तु ६२ आत्मनो ह्यतिनीचस्य ६५ | ऊर्ध्वपुण्ड्रान्तरालस्याँ १०० आत्मानं निक्षिपति २९ | ऊनधीः समताशङ्का ४५ आत्यन्तिकमनिष्टानां २७ | ऋचा दक्षिणतः कुर्या १०८ आदिष्टा एव चान्यार्चा १४३ | ऋजूनि स्फुटपार्श्वानि ६१ आदिष्टा पुण्ड्रमन्त्रार्चा १४३ | ऋद्ध्या समृद्ध्या कीर्त्या १२३ आदौ गुरूणां विज्ञान १४६ | एकदेशयुतोऽप्यन्य ११७ आनन्त्याच्चतुरो १२२ | एकस्यापि हि धर्मस्य १०४ आनुकूल्यस्य संसर्गा ४३ | एकां पुनश्च सर्वेण १०९ आप्लुतः सम्मितालाप ८४ | एकान्ती शक्तितः कुर्वन् ४५ आब्रह्मलोकाल्लोकानां १०६ | एकायना व्रजन्तोऽपि १२८ आमा ह्यतप्ततनवः १०० | एकायने ह्यधिकृता १२७ आरम्भे कर्मणां सिद्धयै १०४ | एकैकं वापि नैकान्ती ९३ आर्त्तानामाशुफलदा २१ | एतानन्यांश्च विविधा ४६ आसनेषु यथाकामं १२१ | एताश्चान्याश्च विविधा १५५ इच्छाप्रकृत्यनुगुणे ६४ | एते चान्ये च विविधा १६० इति भागवतस्योक्ताः ४६ | एवं गदा धनुः खड्गं १०९ इति संस्कारसम्पन्नः १२३ | एवं चतुर्विधामेनां ४४ इति हस्तपदे सांख्यं ८६ | एवं नित्यानि कर्माणि ५३ इतिहासपुराणज्ञः १०२ | एवं विद्वानेकदापि १३६
१६४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता पृष्ठे | पृष्ठे एवं विधस्वधर्मेण १०६ | गुणासहास्त्यजन्त्यार्या- १४० एवं स्वकर्मणि ज्ञाने ६७ | गुरुणा योऽभिमन्येत- ३२ एषां नामानि रूपाणि १११ | गुरुरस्य परं स्थैर्य- १३८ एषा च त्रिविधा ज्ञेया २९ | गुरुंस्तदर्चान् शिष्यान्- १२३ ऐच्छञ्च नियतञ्चेति १२८ | गुरूणामन्तिमतिथौ- ८५ करणे प्रतिषिद्धानां ११९ | गुरोरपह्नवात् त्यागात्- ७९ करिष्यन् वैष्णव नाम ११२ | गुरोश्च पत्नीपुत्रादि- ६६ करेण स्पर्शयन् गात्रं ३६ | गृहे यस्यान्यदेवार्चा- ७४ कर्म ज्ञानञ्च भक्तिश्च १०५ | गृहोपनयनश्वान्त- १५४ कल्पिताः कर्मबन्धेन १२५ | चक्राम्बुजगदाशार्ङ्ग- ७५ कामं मतानि चान्येषां ७३ | चतुरो वासुदेवादीन्- १२२ कामं लोकप्रमाणस्य- ३२ | चतुर्भुजमुदाराङ्गं- ५७ किमप्यत्राभिजायन्ते- ३४ | चतुष्टयी महाशान्ति- ११८ कुदृष्टयो बहुविधा- १४२ | छन्दांसि सरहस्यानि- ७१ कुदृष्टिकल्पितान् देवा- १२३ | ज्ञानं ज्ञेयञ्च तत्वेन- ७१ कुर्यात् सर्वत्र कर्मान्ते- ११० | ज्ञानन्तु स्वपरोपाय- ७१ कुर्याद् रक्षाविधानञ्च- ७७ | ज्ञानकर्मक्रियामन्त्र- ८५ कुर्वन्ति वैष्णवार्थाय- १०३ | ज्ञानतस्त्वनुपेतस्य- ३२ कुर्वाणश्च सदा वृत्ति- ५८ | ज्ञानभक्त्यङ्गसत्सेवा- १५७ कुर्वीत परमां भक्ति- ६४ | ज्ञानयोगस्य विज्ञानं- १४७ कृतानुकूल्यसङ्क- २९ | ज्ञानस्य कर्मणा गुप्ति- १५८ कृता यज्ञाः समस्ताश्च- ५२ | ज्ञानानन्दमयोज्ञन्तो- १०६ कृतिनां वीतमोहानां- ३९ | ज्ञानानन्दमयो नित्यः- १०६ कृत्वानुयागं कुर्वीत- ५१ | ततः परिगृहीतेन- ११६ कृत्वाभिगमनं पूर्व- ५१ | ततः प्राप्य जगन्नाथं- ८४ कृत्वा मन्त्रान्वयं तत्र- १३७ | ततः शुद्धं परं ब्रह्म- ९१ केचित्तु सत्वसम्पन्ना- ८८ | ततः समर्पिते शेषे- ११५ केचिच्चतुर्णां पूर्वेषां- ११६ | ततः सम्पूज्य देवेशं- ११३ केचित् सर्वेश्वरं- ३८ | ततः स्वकाले स्वाध्याय- ११६ केनोपायेन भगवन्- २५ | ततश्च देवदेवेशं- ४९ केशवादीन् द्वादशसु- १११ | ततश्च व्यापकान् मन्त्रा- ११४ क्रमाच्च वृद्धयमानन्तं- १३८ | ततो दिव्यञ्च हारिद्र- ६३ क्रमाप्तभगवन्मन्त्र- १०१ | ततो न्यासस्य चाङ्गानां- ८६ क्रियते चास्य पुत्राद्यैः- ८५ | तत्तत्कार्योपपत्त्यर्थं- १५६ क्रोधलोभमदालस्य- ९४ | तत्र तत्र स्मरन् मन्त्रै- ६२ क्षीर्णायुर्ज्ञानशक्तिवा- १०५ | तत्रान्यतमहोमान्ते- ११६ गजाननाद्यैः सहितं- १२२ | तथा कुदृष्टिकृपण- १२३ गायेदास्फोटये नृत्यैत्- ५८ | तथानादेरविद्याया- १५८ गीतवादित्रघण्टादि- ७४ | तथा भगवतो व्यूह- १४७