भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 176 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 145

हिन्दीटीकासहित १४३ अनेक जन से संसार आच्छादित है। अतः ठीक से इस आवरण में से अपने दृष्टि प्रकाश के अनुसार परीक्षा कर ऐसे मनुष्यों की संगति से दूर रहें॥९४॥ वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञाः नारायणपरायणाः । धन्याः केचन तेभ्योऽपि तेषामादेशवृत्तिनः ॥९५॥ और जो वेद तथा वेदांगो के तात्त्विक आशयों के विज्ञाता हों, जो श्रीनारायण के प्रति वेदों की निष्ठा के जानने वाले हैं, वे ही धन्य हैं तथा उनसे जो उपदेश लेकर वृत्ति में स्थित हो वे भी धन्य हैं तथा दुर्लभ हैं॥९५॥ आदिष्टाः पुण्ड्रमन्त्रार्चा-नाम-ताप-पराङ्मुखाः । धूतावधूतनिर्धूत-विधूतोद्धृत-संज्ञकाः ॥९६॥ जो वैष्णवाभिमत पुण्ड्र, मन्त्र, अर्चा, नाम, ताप नामक पंचसंस्कारों से रहित हैं उन्हें क्रमशः धूत, अवधूत, निर्धूत, विधूत तथा उद्धृत के रूप में शास्त्रकारों ने बतलाया है॥९६॥ आदिष्टा एव चान्यार्चामन्त्रपुण्ड्राङ्कनामकाः । राक्षसासुरवेताल-व्याल-प्रेता नराधमाः ॥९७॥ इसी प्रकार जो अन्य अर्चानादि में लीन हैं उन्हें राक्षस, अन्य मन्त्रादि का जपादि करने वाले असुर, अन्य पुण्ड्रादि धारी बेताल, अन्य देवता के शस्त्रादि चिन्हों के धारण करनेवाले व्याल तथा अन्य नाम को धारण करनेवाले 'प्रेत' हैं, ऐसा भी आगमादि शास्त्रों में निर्दिष्ट किया गया है॥९७॥ तथा स्वकर्मशास्त्रेशगुरु-सत्सङ्गवर्जिताः । ऊना हीना स्रस्ता नष्टा दग्धा ज्ञेयास्समाख्यया ॥९८॥ भिन्नोऽन्यनाथो भिन्नोऽन्यफलो भिन्नोऽथनिन्द्यकृत् । भग्नोऽन्यदेशिकादेशोऽनृतोऽन्यजनसंश्रयः ॥९९॥ इसी प्रकार जो अपने कर्म तथा विहिताचार से हीन हों वे 'ऊन' शास्त्र तथा दृष्टि से रहित वे 'हीन', जो इष्ट श्रीश से रहित हैं वे 'स्रस्त' जो गुरु प्राप्ति से वंचित हैं वे 'नष्ट', जो सत्संग से हीन है वे 'दग्ध' इन नामों से भी शास्त्रकारों ने दिखलाये हैं। इसी प्रकार जिसका आराध्य अन्य देवता हो वह 'भिन्न' जिसका फल मोक्ष से अन्य है वह 'अन्यफल, और जो निन्द्य कर्मकारी है वह 'निन्द्य' जो अनेक विद्वान् गुरुजन की आज्ञाएं माने वह 'भग्न' तथा जो दूसरे देवताओं का यजन करे वह 'अनज्ञ' नाम से शास्त्र में दिखलाया गया है॥९८-९९॥