भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 176 में से

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पृष्ठ 144

१४२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता कुदृष्टियों से अपने धर्म से न हटे तथा बिना किसी कथा के श्रीहरि के परम एकान्त्यभाव में दृढ़ता से स्थिर रहे तथा अपने धर्मादि का पालन करत रहे॥८९॥ नास्तिकः संशयी मूढ इत्यदूरतरा नराः । विज्ञाय लक्षणैस्तांस्तु सम्यग् व्यवसितस्त्यजेत् ॥९०॥ अपने साथ रहने वाले निकटस्थ नास्तिक, सन्देहशील तथा मूढ़मति के मनुष्यों क उनके लक्षणों से भली प्रकार समझते हुए ऐसे सभी कुदृष्टि जन को निश्चय क उनका साहचर्य तथा संगादि छोड़ देवे॥९०॥ मत्प्रत्यक्षन्तदेवास्ति नास्त्यन्यदिति निश्चिताः । अर्थकामपराः पापा नास्तिका देहकिङ्कराः ॥९१॥ जो मुझे प्रत्यक्ष हो वही विद्यमान या सत्य है तथा अन्य पदार्थ या ईश्वरादि अप्रत्यक्ष तत्व कुछ भी नहीं है ऐसा निश्चय दिखलाने वाले अर्थ तथा कामरूप पुरुषार्थ के सेव में रत रहनेवाले अपने शरीर के धर्म के जो दास हैं वे ‘नास्तिक’ है (तथा कुदृष्टि हैं)॥९१॥ नानाविधेषु ज्ञानेषु नराः संशयिनोऽधमाः । निश्चयं नाधिगच्छन्ति लिङ्गमात्रधराः क्वचित् ॥९२॥ इसी प्रकार अनेक प्रकार के शास्त्रज्ञानों के कारण परस्पर विपरीत कथ्यों को प्राप कर संशय में स्थित रहनेवाले होकर किसी निश्चय पर नहीं पहुँचने से ‘संशयी’ तथ अधमजन हैं। इसके अतिरिक्त कुछ व्यक्ति केवल अपने मत के अनुक वस्त्रादिवेषधारी मात्र होते हैं॥९२॥ देहात्मस्वर्गनरकपुण्यपापाविमर्शनः । गतानुगतिका मूढा नश्यन्ति पशुबुद्धयः ॥९३॥ कुछ देहात्मवादी, स्वर्ग, नरक, पुण्य तथा पाप के विचार से शून्य होते हुए केव अपने प्रविचारित मार्ग में स्थित रहनेवाले अज्ञानी हैं जो, इस वृत्ति के कारण पशु समान विवेक रहित हैं। ऐसे सभी प्रायः मोक्षप्राप्ति के अपात्र होने से अन्त में ना प्राप्त करते हैं॥९३॥ कुदृष्टयो बहुविधा वृथा वैदिकमानिनः । तथा मिथ्यादृशो बाह्याः सर्वैरेवावृतञ्जगत् ॥९४॥ नास्तिक एवं कुदृष्टिजन के अनेक प्रकार होते हैं। कुछ वृथा ही अपने को वेदज्ञान सम्पन्न मानने वाले वैष्णवविरोधी हैं, इसी प्रकार कुछ हेतु आदि के प्रयोगों मिथ्यादृष्टि का निर्माण करनेवाले बाह्य विद्वान् हैं (अवैदिकजनक)। इस प्रकार

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