नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अपने उद्देश्य या परमप्रयोजन में हानि होकर प्रमादवश पतन हो जाता है॥७९॥ न्यासे हि देहिनोऽपायैर्जायते प्रच्युतिः फलात् । वार्यत्याप्रशमनात् सा हि सद्भ्यवहार्यताम् ॥८०॥ किसी शिष्य के द्वारा आत्मा के प्रपत्तिरूप न्यास के सम्पन्न करने पर भी बाद में उपायों के प्राकृतजन संसर्गादि से बन जाने पर श्रीहरि के दास भाव की प्राप्तिरूप फल से प्रच्युति से उद्दिष्टार्थ से वंचित होना पड़ता है, अतएव प्रायश्चित्तादि से प्रशमन कर्म के आचरण तक वह प्रायश्चित रूप में शिष्टजन से बहिष्कृत होकर रहेगा तथा इस समय वह भगवत् कैङ्कर्य के अधिकार से हीन भी हो जाएगा ॥८०॥ यज्ज्ञानपूर्वं न्यसनं मन्त्रेण गुरुणा हरौ । स एव सर्वसंस्कारः प्राक्तस्मात् प्राकृताः नराः ॥८१॥ आचार्य के द्वारा मन्त्रार्थ के ज्ञान को देते हुए जो शरणागति मन्त्र से श्रीनारायण के प्रति प्रपत्ति या न्यासयोग के साथ शिष्य का समर्पण करवाया जाता है उस सभी पूर्ण संस्कार के किये गये विधान से पूर्व वह जन अवैष्णवभूत था, अतः वह तब तक प्राकृत जन था॥८१॥ प्राकृताद्यैः परिहृतो निवसेन्नासहायवान् । वसँश्चाभ्यन्तरान् प्राज्ञः संसर्गान् परिवर्जयेत् ॥८२॥ न्यासयोग प्राप्त शिष्य अकेली ही रहे वह प्राकृतादि की संगति से दूर रहे तथा अपनी कुशलबुद्धि के साथ इनसे व्यवहार रखते हुए किसी आंतरिक संसर्गवाला व्यवहार भी (जैसे साथ रहना एक साथ शयन तथा भोजन आदि व्यवहार) नहीं रखे॥८२॥ श्रद्धापूतमवैद्यस्याप्यन्नाद्यं तु कदाचन । इज्यासु विनियुञ्जीत न श्राद्धे सति किञ्चन ॥८३॥ अवैष्णवभूत श्रीहरि की प्रपत्ति न पाने वाले किसी प्राकृतजन का श्रद्धावश अर्पित अन्न (पक्व या अपक्व) या किसी श्राद्ध कर्म के या सामान्यरूप में यज्ञादि के प्रसंग में अनापत् या आपत् स्थिति में भी उपयोग न करे (इस अवैष्णव दत्त अन्न का भोजनादि में लेना या उपयोग भी फल प्राप्ति में बाधक समझना चाहिए)॥८३॥ गुणासहास्त्यजन्त्यार्या न सन्तश्चिरमंहसे । दोषासहास्त्यजन्त्येव सन्तश्च श्रेयसे परान् ॥८४॥ आर्यजन या सज्जन किसी के गुणवश ही उसका चिरकाल तक पातकादि के चलाने