नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
DevanagariHindipublished176 पृष्ठ
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१६६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
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|---|---|---|---|
| न चैकस्मिन्भजेत् साम्यं | ८१ | निन्दितक्रियया हाना- | १२७ |
| न जन्मनो नाध्ययनात्- | ९९ | निबोधत महाप्राज्ञः- | १५० |
| न जातिभेदं न कुलं- | २८ | नियोक्ता भगवान् विष्णुः- | ८९ |
| न जातु परमां वृत्तिं- | ६८ | निरीश्वराः कर्मफला- | १०५ |
| न जातु मन्त्रदा नारी- | ३४ | निघृष्य मृत्स्नां विधिवत्- | १११ |
| न तथा विविधैर्दानै- | १३१ | निवेदयेच्च भुञ्जानो- | ५० |
| न देवतान्तरपरा- | ४४ | निवेद्य वस्त्रेच नवे- | ११२ |
| न परीक्ष्य वयो वन्द्या- | १३१ | निवेद्य यदि तद्भूयः- | ५० |
| न परैः सङ्करं कुर्यात्- | १३६ | निश्चितेऽनन्यसाध्यस्य- | २६ |
| न पापेन न पुण्येव- | ६९ | निषिद्धान्तर्गतान्येव- | ४३ |
| न प्रपत्तेः परा विद्या- | ९८ | निष्पादनं रक्षणञ्च- | १५१ |
| न मत्तोन्मत्तपतित- | ३५ | निहीनान् प्राकृतेभ्योऽपि- | १४४ |
| न विद्या केवलार्थाय- | ९८ | नीचैः संश्लेषां हस्त- | १५४ |
| न विपत्तिषु वैक्लव्यं- | ७० | नोपभोक्तव्यमन्नाद्य- | ९५ |
| न विषज्वरभूतादि- | ६९ | न्यस्ताशेषभरः श्रीशे- | ८० |
| न वृत्तेरधिकामृद्धिं- | ६९ | न्यासनिर्धूतपाप्मानः- | १२७ |
| नश्यन्ति सकलाः क्लेशाः- | ६१ | न्यासलिङ्गावताङ्गेन- | ३० |
| न सांख्येन न योगेन- | ९३ | न्यासस्तीर्थाभिगमनं- | १४५ |
| नाचार्यः कुलजातोऽपि- | ३३ | न्यासस्य सर्वयोगस्य- | १३७ |
| नातिसङ्गः परिचरेत्- | ५० | न्यासाख्यं परमं मन्त्रं- | ११४ |
| नाथस्य रूपविभव- | १५१ | न्यासिनो न्यास एव- | ३५ |
| नाद्रियेत पुराणादीन्- | ७२ | न्यासे वाप्यर्चने वापि- | ३२ |
| नानाकामहतज्ञाना- | १०५ | न्यासे हि देहिनोऽपायै- | १४० |
| नानाफलक्रियायोग- | १३० | पङ्क्तौ समाजे ग्रामादौ- | ८२ |
| नानाविधेषु ज्ञानेषु- | १४२ | पञ्चरात्रं महद्दिव्यं- | ५५ |
| नामदासादिशब्दान्तं- | ११२ | पञ्चायुधाब्जताक्षर्यादि- | १५३ |
| नारायणैकनिष्ठा ये- | ९३ | पत्युर्ज्ञानमयी वृत्ति- | १५३ |
| नारायणैकशरणाः- | ९० | पद्मबीजमयी माला- | १५३ |
| नारी वा पुरुषो वापि- | १३२ | परं भागवतं वर्त्म- | १०५ |
| नास्तिकः संशयी मूढः- | १४२ | परमाख्याथ वैयूही- | ११८ |
| निक्षिप्यात्मानमात्मीय- | ४० | परमात्मा हरिः स्वामी- | १०२ |
| निघर्षणादि विधिवत्- | ६१ | परमीप्सुस्तमेवार्थ- | ११४ |
| निजधर्मानुरोधेन- | ६६ | परमैकान्तिनां धर्मः- | १०४ |
| नित्यं गुरुमुपासीत- | ६४ | परमैकान्तिनां नित्या- | १३५ |
| नित्यं विष्णुपं कर्म- | ११५ | परसम्बन्धविज्ञानं- | १४७ |
| नित्यमच्युतभक्तानां- | ९८ | परस्य पुंसः श्रीशस्य- | १४६ |
| नित्यमर्चाजपध्यान- | १०२ | परस्य ब्रह्मणस्तस्य- | ५६ |
| नित्योप्तकेशा निभृता- | ५४ | परित्यज्याखिलान्- | ३० |
| निधाय वह्नौ प्रत्येकं- | १०९ | परिवर्हविभूषास्त्र- | १४६ |