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नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

१६६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता

पृष्ठेपृष्ठे
न चैकस्मिन्भजेत् साम्यं८१निन्दितक्रियया हाना-१२७
न जन्मनो नाध्ययनात्-९९निबोधत महाप्राज्ञः-१५०
न जातिभेदं न कुलं-२८नियोक्ता भगवान् विष्णुः-८९
न जातु परमां वृत्तिं-६८निरीश्वराः कर्मफला-१०५
न जातु मन्त्रदा नारी-३४निघृष्य मृत्स्नां विधिवत्-१११
न तथा विविधैर्दानै-१३१निवेदयेच्च भुञ्जानो-५०
न देवतान्तरपरा-४४निवेद्य वस्त्रेच नवे-११२
न परीक्ष्य वयो वन्द्या-१३१निवेद्य यदि तद्भूयः-५०
न परैः सङ्करं कुर्यात्-१३६निश्चितेऽनन्यसाध्यस्य-२६
न पापेन न पुण्येव-६९निषिद्धान्तर्गतान्येव-४३
न प्रपत्तेः परा विद्या-९८निष्पादनं रक्षणञ्च-१५१
न मत्तोन्मत्तपतित-३५निहीनान् प्राकृतेभ्योऽपि-१४४
न विद्या केवलार्थाय-९८नीचैः संश्लेषां हस्त-१५४
न विपत्तिषु वैक्लव्यं-७०नोपभोक्तव्यमन्नाद्य-९५
न विषज्वरभूतादि-६९न्यस्ताशेषभरः श्रीशे-८०
न वृत्तेरधिकामृद्धिं-६९न्यासनिर्धूतपाप्मानः-१२७
नश्यन्ति सकलाः क्लेशाः-६१न्यासलिङ्गावताङ्गेन-३०
न सांख्येन न योगेन-९३न्यासस्तीर्थाभिगमनं-१४५
नाचार्यः कुलजातोऽपि-३३न्यासस्य सर्वयोगस्य-१३७
नातिसङ्गः परिचरेत्-५०न्यासाख्यं परमं मन्त्रं-११४
नाथस्य रूपविभव-१५१न्यासिनो न्यास एव-३५
नाद्रियेत पुराणादीन्-७२न्यासे वाप्यर्चने वापि-३२
नानाकामहतज्ञाना-१०५न्यासे हि देहिनोऽपायै-१४०
नानाफलक्रियायोग-१३०पङ्क्तौ समाजे ग्रामादौ-८२
नानाविधेषु ज्ञानेषु-१४२पञ्चरात्रं महद्दिव्यं-५५
नामदासादिशब्दान्तं-११२पञ्चायुधाब्जताक्षर्यादि-१५३
नारायणैकनिष्ठा ये-९३पत्युर्ज्ञानमयी वृत्ति-१५३
नारायणैकशरणाः-९०पद्मबीजमयी माला-१५३
नारी वा पुरुषो वापि-१३२परं भागवतं वर्त्म-१०५
नास्तिकः संशयी मूढः-१४२परमाख्याथ वैयूही-११८
निक्षिप्यात्मानमात्मीय-४०परमात्मा हरिः स्वामी-१०२
निघर्षणादि विधिवत्-६१परमीप्सुस्तमेवार्थ-११४
निजधर्मानुरोधेन-६६परमैकान्तिनां धर्मः-१०४
नित्यं गुरुमुपासीत-६४परमैकान्तिनां नित्या-१३५
नित्यं विष्णुपं कर्म-११५परसम्बन्धविज्ञानं-१४७
नित्यमच्युतभक्तानां-९८परस्य पुंसः श्रीशस्य-१४६
नित्यमर्चाजपध्यान-१०२परस्य ब्रह्मणस्तस्य-५६
नित्योप्तकेशा निभृता-५४परित्यज्याखिलान्-३०
निधाय वह्नौ प्रत्येकं-१०९परिवर्हविभूषास्त्र-१४६

हिन्दीटीकासहित १६७ | पृष्ठे | | पृष्ठे | | परिपत्सु च सान्निध्यं— | १५५ | प्रभाते दिव्यलोकस्थं— | १०१ | | परीत्य सह शिष्येण— | १११ | प्रभुं भक्तपराधीनं— | ५७ | | परीवाराँश्च सेवेत— | ५८ | प्रशस्तं भगवद्भक्तं— | ५१ | | पवित्राण्यब्जबीजानि— | ६३ | प्रशासितुरशेषाणां— | २७ | | पश्चिमे स्वेन मन्त्रेण— | १०८ | प्रसादनं क्षमापञ्च— | १५४ | | पाखण्डशैवशाक्तादि— | ४५ | प्रसादनानामीशस्य— | १३० | | पातकानि समस्तानि— | ७१ | प्राकृताद्यैः परिहृतो— | १४० | | पातकेन कुदृष्टान्य— | ९६ | प्राङ्मुखस्योपविष्टस्य— | १०९ | | पादोदकं भगवतो— | ५८ | प्राज्यैः प्रियतमैर्भोगैः— | १०३ | | पीत्वानैकान्तिनां सोमं— | १२० | प्रातरुत्थाय विधिवत्— | ४९ | | पुण्येऽनुकूले समये— | ३७ | प्रातर्माध्यन्दिने साय— | १०० | | पुनरेवं मुनिश्रेष्ठ— | १४५ | प्राप्तुं लक्ष्मीपतेर्दास्यं— | १३८ | | पुरराष्ट्राभिवृद्ध्यर्थं— | ५९ | प्राप्तुमिच्छन् परां— | २८ | | पुराणान्यवगाहेत— | ५६ | प्राप्याभिगमनं दृष्ट्वा— | १३५ | | पूर्वमेव यथान्यायं— | ४९ | प्रायश्चित्तं तु परम— | ५२ | | पूर्ववत् स्थण्डिलं कृत्वा— | ११२ | प्रायेण धर्मान् व्यामिश्रान्— | १२६ | | पूर्वेषामुत्तरेषाञ्च— | १३२ | प्रायो गुणवशादेष— | २७ | | प्रकृतिं पुरुषं योगं— | ७२ | प्रीतिरूपाँस्तथा विष्णो— | ६८ | | प्रक्षाल्य चरणौ पात्रे— | ६४ | प्रीतिसंहृष्टसर्वाङ्ग— | ५७ | | प्रक्षाल्य पञ्चगव्येन— | १०९ | प्रीत्यप्रीतिसमायोगं— | ८२ | | प्रच्छादनञ्च दोषाणां— | १५५ | फलानाञ्चान्यतः प्राप्तिः— | १५८ | | प्रजापालनरूपञ्च— | ५३ | बहुजन्मकृतैः पुण्यैः— | ३९ | | प्रणयेन तथा व्यूहै— | ६२ | बालमूकजडान्धांश्च— | ३१ | | प्रणामं स्पर्शनं सेवां— | ७५ | बाह्यं दुष्टं तमोनिष्ठं— | ७३ | | प्रणामः कीर्तनं वापि— | ३१ | बाह्याः सदसतां नास्ति— | ९२ | | प्रणामाङ्गनमुख्येन— | ३० | बाह्या निर्देवताश्चैव— | ९३ | | प्रतप्तैर्भगवद्दिव्या— | १५३ | वाह्यानां जिह्मदृष्टीनां— | ८० | | प्रतिष्ठां सर्वधर्माणां— | ५४ | बाहोर्ललाटे शिरसि— | ५९ | | प्रत्येकञ्च यथारूपं— | १११ | बुद्ध्वाऽपि परमात्मानं— | १२९,१२९ | | प्रथमासनसंस्कारो— | १४९ | ब्रह्मक्षत्रविशः शूद्राः— | २८ | | प्रधानं स्थण्डिलं मध्ये— | १२३ | ब्रह्मचारी गृहस्थश्च— | ५४ | | प्रधानमहदादीनां— | १४७ | ब्रह्मरुद्रदिगीशार्क— | ६८ | | प्रपत्तिं कारयन्त्येव— | २८ | ब्रह्मरुद्रमुखा देवा— | १५६ | | प्रपत्तिरानुकूल्यस्य— | २९ | ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः— | ५९ | | प्रपत्तेर्ह्यात्मनिक्षेपो— | ४२ | ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यै— | ४९ | | प्रपन्नमपि यं कञ्चित्— | १३१ | भक्तिज्ञानसमाचार— | १५५ | | प्रपन्नस्यापि हि पुन— | ४४ | भक्तिप्रकाण्डविस्तारो— | १४६ | | प्रपन्नैश्चान्यभजना— | ८१ | भक्तिस्तु विविधा भोगा.— | १४५ | | प्रपित्सुर्मन्त्रनिरतं— | ३३ | भगवच्चरणाम्भोजा— | १४८ |

१६८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता पृष्ठे | पृष्ठे भगवद्रूपिणं ध्यात्वा— ११२ | यथा यथा निषेवेत— १३३ भजने चान्यदेवानां— ११९ | यथा रागादयो दोषा— १४८ भरद्वाजो महातेजाः— १४५ | यथार्हं विहितैस्तस्तैः— ४८ भर्तुरासनदानाद्यै— १३४ | यथैव भगवान् विष्णु— १३१ भविष्यन्ति कलौ केचि— १०५ | यथैवाश्रमणः पूर्वे— १२८ भावनानान्तु कालुष्यात्— ९२ | यदीच्छन् प्रतिकूलानि— ३० भाषाख्या लौकिकाः मन्त्रा— ३६ | यदैकान्त्यङ्गता विष्णौ— ८९ भिन्नोऽन्यनाथो— १४३ | यन्येकदिवसे पञ्च— ११७ भूमाविव परे पुंसि— १४६ | यद्वा परमसंस्काराः— १३४ भूयः स्फुटतरं वक्ष्ये— १२५ | यश्चायमात्मनिक्षेपः— १३० भूय एवार्षिभिः पृष्टो— ८८ | यश्चेमां संहितां पुण्यां— ८७ भोजयेद्वैष्णवान् नित्यं— ५० | यस्तु प्राप्य गुरोर्विद्यां— ९७ मत्प्रत्यक्षं तदेवास्ति— १४२ | यां सिद्धिं वैष्णवैर्मन्त्रैः— ३६ मन्त्रं नियतमग्न्याणां— ३७ | यात्रादिषु च सेवेत— ५७ मन्त्रवत्तु हुतं— ११५ | यायाच्छुद्धेन मार्गेण— १२८ मन्त्रसंस्कारमुक्तस्य— ११८ | यास्तत्र तत्र श्रूयन्ते— १०३ मन्यते च स्वकीयान्नः— ४० | या स्वधर्मेष्वभिरतिः— ४१ मरणं जन्मने यस्य— ९८ | युग्मैर्विवर्तितं रौद्र— ७८ महापचागे देवस्य— १६० | ये च भागवता मन्त्रा— ५१ महाभागवतो मन्त्रैः— १३६ | ये च भुक्तोज्झिता भोगा— ५८ मत्स्यं कूर्मं वराहञ्च— १२२ | ये चोपकुर्वते ज्ञानं— ६६ मुनयः सत्वनिष्ठानां— ९३ | ये तु वाकन्निष्ठनिष्ठाः— ९० मूलजं गन्धसारादि— ७७ | ये त्ववैष्णवभर्त्तव्या— ९६ मूलस्कन्धमया वेदा— ५६ | ये नात्मानमनात्मानं— ९७ य आत्मनां परो वेद्य— १५१ | येषां शास्त्रेषु गाढापि— १३९ यः प्रपन्नोऽपि लक्ष्मीशं—— ७७ | योऽसौ मन्त्रवरं— ६५ यः शरण्यमशेषाणां— १३० | योगक्षेमविधिर्नित्य— १४९ यजस्व नित्यमात्मेशं— ११५ | योजयिष्यन् गुरुः शिष्यं— ११५ यजेच्छुद्धानशुद्धान् वा— ९२ | यो दिव्यशास्त्रमन्त्रेषु— ९६ यजेत पुरुषं साक्षा— ४९ | राजसांस्तामसांश्चैव— ७८ यज्ज्ञानपूर्वं न्यसनं— १४० | रौद्रव्रतादिनियतै— ७७ यत्तु विश्वपतेर्विष्णो— १३० | लक्षणानामकरणे— ११९ यत्प्रव्रजन्ति तत् षष्ठ— १५० | लक्षणानि स्फुटान्येव— ६३ यत्र काव्ययवा देशे— ९८ | लक्षणानि हि पुष्पाणि— १५९ यत्राविविक्तैः शब्दैस्तु— १०३ | लक्ष्मणामपचारेण— १५३ यथा कामफला यज्ञा— १२९ | लोभाद् वा वा यदि वा मोहात्— १३९ यथानुजीवी नृपतिं— ६४ | वदन्ति धर्मान् व्यामिश्रान्— १२५ यथा पूर्वाकृतीन्नित्या— १०१ | वदन्तोऽपि गुणान् विष्णो— १३३ यथा पृथग्विधा वर्णा— ८९ | वनस्थाश्रमसम्प्राप्ति— १४९

हिन्दीटीकासहित १६९ पृष्ठे | पृष्ठे वर्जयेत् प्रतिषिद्धानि- ७० | वृक्षादीनाञ्च सर्वेषां- ७६ वर्जयेदन्यदेवानां- ७४ | वृत्तिं सन्तोऽनुभूयेमां- १६१ वर्ज्याः पाषण्डशैवाद्यै- ७४ | वृत्तिर्भगवतां हि- ११७ वर्णाश्रमपराश्चैव- ५४ | वृत्तिश्च विहिताचार- ४० वर्तुलं तिर्यगच्छिद्रं- ७६ | वृत्तेर्हिजीवितं गुप्ति- १६० वासःस्रग्गन्धधूपादि- १०१ | वृत्यङ्गमेवञ्च ततो- ८६ वासुदेवं प्रपन्नानां- ३९ | वृद्धानाचारसम्पन्ना- ६६ विद्यार्थसम्प्रयोगोऽपि- ८१ | वृद्धानाञ्चैव मुक्तानां- १५७ विद्या विभूषणं पुंस- ९९ | वेदवेदाङ्गतत्व- १०२,१४३ विनिन्दितः प्रशस्तो वा- ७० | वेदवेदान्तविज्ञानं- ४२ विनैव प्रतिषिद्धेन- ६९ | वेदवेद्यः स भगवान्- ५६ विपरीतार्थतत्वानि- १५६ | वेदानां सोपनिषदां- १५७ विप्रानैकान्तिनः प्राज्ञा- १२१ | वैदिका इव चाप्यन्ये- १४१ विमर्श इह दुःखानां- १४८ | वैदिकास्तान्त्रिकाश्चैव- ३५,३६ विमानमण्डपोद्यान- १४७ | वैराग्यतीरसुभगा- १४५ विरहानर्थपीडावमान- १५५ | वैवाहिको विधिर्धर्मो- १४९ विवाहयज्ञाध्ययन- ९५ | वैष्णवस्याङ्गशय्यायां- ९८ विशिष्टः परमैकान्ती- ८३ | व्यवस्थां पदवर्णादि- ५५ विशुद्धं वैष्णवं बिम्बं- १३६ | व्यामिश्रं पञ्चरात्रेऽपि- १२६ विशुद्धज्ञानकर्माणः- ९० | व्यामिश्रांश्चापि शुद्धांश्च- १२९ विशुद्धज्ञानसलिलां- १४५ | व्यामुग्धमतयः केचित्- १२५ विशुद्धपरिवारस्य- १२७ | व्यूहांश्चतुर्षु तान्- १११ विशुद्धयेद्विष्णुभक्तस्य- ५२ | व्रज तस्यैव चरणौ- ११४ विशेषाद्विष्णुभक्तेषु- ७९ | शङ्खचक्रप्रधानं हि- ६० विशेषेणाप्यनर्थेषु- १५८ | शङ्खचक्रोर्ध्वपुण्ड्राद्यै- ७५ विश्वात्मन्यात्मनो न्यासं- ३४ | शरण्यमिज्यं लक्ष्मीशं- ७१ विष्णोस्तत्संश्रयणाञ्च- १५३ | शान्तिं पुण्येपु देशेषु- १२१ विष्ण्वर्चनरहिते ग्रामे- ७३ | शान्तोऽनसूयुः श्रद्धावान्- ३५ विष्णोः सेवेत तीर्थानि- ५२ | शालग्रामशिलायान्तु- १३५ विष्णोरायतनान्नौ वा- ६० | शास्त्रादिषु सुदृष्टापि- ३२ विष्णोरूर्ध्वतया क्षेत्रे- ६१ | शिष्टैर्वर्णाश्रमादीनां- ५५ विष्णोर्ध्यानप्रणामार्चा- ६८ | शिष्यपुत्रकलत्राणां- १०० विष्णोर्निवेदितान्नाद्यै- ५२ | शुद्धव्यामिश्रपात्राणां- १३७ विष्णोर्विद्वेषयुक्तस्य- १५९ | शुद्धादीनान्तु धर्माणां- १२७ विष्वक्सेनः स्मृतो नेता- ६८ | शुद्धो मिश्रस्तथान्यौ वा- १२७ विहिताचरणं कर्म- ४३ | शुश्रूषमाणः शूद्रोऽपि- ५३ विहितान्तर्गतान्येव- ४३ | श्रद्धापूतभवैद्यस्य- १४० विहितैवमुपावृत्ति- १५१ | श्रीभूमिलीलासहितं- ११५ वीर्यं स्वकर्मधीर्दृष्टिः- १३३ | श्रुतिभिः पञ्चरात्रेण- १५६

१७० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता पृष्ठे | पृष्ठे श्रुतिस्मृतीतिहासाद्यै— १५१ | सर्वेषामुपचाराणा— १३५ श्रुत्वा तु सकलान् धर्मान्— २५ | सर्वैश्च लक्षणैर्युक्त— ९६ श्रुत्वादौ नारदात् सम्य— ८७ | स शिष्योऽथ गुरुः— ११४ श्रुत्वैव सहसोत्थान— १५४ | साङ्गान् वेदानधीयीत— ५४ श्रूयतां सम्प्रवक्ष्यामि— २६ | सात्विकं नाम शुद्धानां— ७८ श्रूयते यत्र यष्टव्या— ९० | साधनत्वाभिमत्या— ४५ श्रौतदिव्यार्षकल्पानां— ११६ | साप्सरो भूरिसङ्घस्य— १४७ संवत्सरमुपासीत— १३८ | सामान्या च विभक्ता च— १३३ संहारादिक्रमं कुर्या— ११४ | सुसूक्ष्मत्वादूहापत्वा— १६१ संहितोपनिषद्वस्मिं— ८६ | सेव्योऽयं कर्महस्ता— १३३ स एकान्त्यन्यविमुखो— ८० | सैषा सुदृष्टिर्व्याख्य— १४९ स एवोपर्युपर्यस्य— ४१ | स्तुतिर्नतिः परिक्रामः— १५१ सकृदेव कृतो न्यासो— १३२ | स्तोत्राणि कल्पनामानि— ५६ स च सर्वेषु लोकेषु— ८४ | स्त्रियः शूद्रादयश्चैव— ३४ सतां निषेवणं वापि— १३४ | स्त्रीणाञ्च पतिमित्रा— ३५ सतां पादोदकं पात्रे— १३७ | स्थानानि सैकतान्यत्र— ११० सतामनवकाशत्वात्— ९५ | स्थाने हेत्याहुतीनान्तु— ११३ सतामसेवनान्नित्य— १६० | स्थापनार्चनयात्रादि— १५१ सतामाचार्यमुख्यानां— १५६ | स्नानञ्च गुरुणा यत्र— ६५ सतामुत्क्रमणादेश्च— १५० | ज्ञातेभ्यश्च यथाकामं— १२१ सत्वजा मानसी— ३१ | स्नानप्रसाधनहविः— १५१ सत्सेवनमसत्सेवा— १०४ | स्वतः सङ्कल्पतश्चापि— १२८ सद्ब्रह्म वासुदेवाख्यै— १०२ | स्वपापसम्भवादेव— ३८ सन्तः सतोऽनुगृह्णन्ति— १०१ | स्वयं देहानुकूलानि— ६५ सन्तोऽनुपनतारब्ध— १३७ | स्वयं ब्रह्माणि निक्षिप्तान्— ११३ सप्तपूरुषविज्ञेये— ३३ | स्वयं वा भक्तिसम्पन्नो— ३३ समर्पितात्मनः श्रीशे— १३१ | स्वरूपरूपविभव— ५७ समानसुखदुःखत्वं— १५५ | स्वरूपस्य विनाशाय— १५९ समाप्तानि च कर्माणि— ४८ | स्वल्पापि हन्ति भूयांसं— १०४ समाश्रितो दास्यरतिः— ५४ | स्वाध्यायेनापि विदुषा— १३६ समित्पुष्प हविस्तोय— ९५ | स्वाभाविकोऽस्य सम्बन्धः— ४१ सम्भूय च कुले श्लाघ्ये— १३३ | स्वेशसम्बन्धविज्ञानं— ८० सर्वत्राग्निमुखस्यान्ते— १२२ | हरेः प्रियतमं ज्ञानं— १५८ सर्वपातकसम्प्राप्तौ— १२० | हरेः शुद्धतनोः शुद्धं— १२६ सर्वभूतान्तरात्मान— १२५ | हरेरालोकहीनानां— १५७ सर्वमङ्गलसंयुक्त— ११० | हरेराश्रितवात्सल्य— ५८ सर्वसंस्कारसंस्कारो— १०२ | हविर्निवेद्य देवाय— १०९ सर्वात्मना हि या वृत्तिः— १५३ | हीनाः परमसंस्कारैः— ११८ सर्वेषां याग एवायं— १३५ | हीनाहीनतमाश्रैव— ३१

कर्मकाण्ड सम्बन्धी हमारे कुछ प्रकाशन अन्त्येष्टि श्राद्ध कर्म पद्धति (संस्कृत) पत्राकार व पुस्तकाकार उपाकर्म पद्धति मूल "श्रावणी कर्म" के लिये परमोपयोगी ग्रह शांति-हिन्दी टीका सहित (शुक्ल यजुर्वेदोक्त)—इसमें मातृस्थापन पूजन आभ्युदीपक श्राद्ध पद्धति और ग्रहशांति है। यह यज्ञोपवीत तथा विवाहादि शुभ कर्म में बहुत उपयोगी है गौडीय श्राद्ध प्रकाश महानिबन्ध—स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत, (मूलमात्र, पत्राकार) सभी श्राद्ध, पितृकर्म संबंधी सभी वैष्णवादि पूजनादिकों का अपूर्व संग्रह नित्य कर्म प्रयोग माला—स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत, नित्य नियम के ६२ विषयों सहित। संस्कृत में प्रेत मञ्जरी—हिन्दी टीका सहित। वैतरणी दान प्रेतदाहविधि, दशाहादि श्राद्ध, एकादशाहश्राद्ध, वृषोत्सर्ग, शय्यादानादि सपिंडी श्राद्ध, षोडश, मासिक श्राद्ध प्रयोग, त्रयोदशाहपद दानादि है। पुस्तकाकार व पत्राकार दोनों में उपलब्ध व्रतोद्यापन प्रकाश—स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत। मूलमात्र पत्राकार व सजिल्द में उपलब्ध सुगम विवाह पद्धति—(गंगाधारी)—हिन्दीटीकासहित सर्वदेव प्रतिष्ठा प्रकाश—पं० चतुर्थीलालजीकृत। सम्पूर्ण देवताओं की सर्वोत्तम प्रतिष्ठा विधि और प्रतिष्ठोपयोगी अनेकों प्रकार के कुंड, मण्डल, यंत्र आदि के चित्र बनाने तथा रंग पूरने की विधि भी है। संस्कार प्रकाश—स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत। इसमें षोडश संस्कार, लुप्त संस्कार प्रायश्चित, व्रात्यप्रायश्चित प्रयोग, पुनरुपनमन प्रकार इत्यादि सभी विषय है। मूल मात्र संस्कृत में। सजिल्द वासिष्ठी हवन पद्धति—हिन्दी टीका सहित विष्णु पूजन विधि—हिन्दी टीका सहित विवाह सोपांगविधि—'वालोवोधिनी' नामक हिन्दी टीका सहित शांति प्रकाश—स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत। इसमें गणपत्यादि पूजन, पुण्याह वाचन, कलश स्थापनादि और विनायकादि ३० शांति प्रयोग तथा वास्तु शांति तथा वास्तु शांति प्रयोगादि समन्त्रक हैं। मूल मात्र पत्राकार सकाम शिवपूजन विधान हिन्दीटीकासहित—वैदिक, तांत्रिक मन्त्रों से शिव पूजन स्वस्तिवाचन (पुण्याहवाचन) प्रायः समस्त शुभकर्मों में पढ़ा जाता है। संध्योपासन—हिन्दीटीकासहित देवर्षि पितृतर्पण सहित हरिद्रामातृका पूजा—विवाहादि मंगल करने योग्य (चातुर्थीलाली) उपनयनपद्धति—सटिप्पणीका नवीन आवश्यक विषयों से अलंकृत 'यज्ञोपवीत संस्कार' कराने के लिये परमोयोगी

हमारे यहाँ से प्रकाशित कुछ रामानुज सम्प्रदाय-ग्रंथ अर्चावतार स्थल वैभव दर्पण-दिव्य देश तीर्थ यात्रा हि.टी.स. आल्वन्दार स्तोत्र-सान्वय हिन्दी टीका सहित ............ रामपटल-हिन्दीटीका सहित ............. द्राविडाम्नाय दिव्यप्रबंध-(संस्कृत अनुवाद) अनुवादक श्रीकांची जगदाचार्यसिंहासनाधीश प्रतिवादिभयंकर श्रीमदण्णङ्गराचार्य। सुदर्शनशतक-हिन्दी टीका और सुदर्शनकवच............ (बृहत्) स्तोत्ररत्नावली-प्रथम भाग ............. श्री गोंदाभक्ति चालीसा-(नवीन प्रकाशन) .......... धर्म शास्त्र-ग्रंथ आन्हिक कर्म सूत्रावली (मूलमात्र) शुक्ल यजुर्वेदी माध्यनन्दिन वाजसनेयि शाखा क्लों के लिये परमोपयोगी ........ कर्मविपाक-(नक्षत्र चरणगत) हिन्दी टीका सहित ........ धर्मसिन्धु-पं० मिहिरचन्द्रजी कृत हि .टी . सहित तथा पूर्वोक्त सर्वालंकारों से विभूषित। निर्णय सिन्धु-पं. ज्वालाप्रसाद मिश्रकृत- हि.टी . सहित ब्राह्मणोत्पत्ति मार्तण्ड भा .टी (बृहज्ज्योतिषार्णवान्तर्गत षष्ठ मिश्रस्कन्धोक्त) हिन्दी टीका सहित ........ व्रतराज-(दैवज्ञ कुल भूषण, याज्ञिक शिरोमणि संगमेश्वरोपाव्ह श्री विश्वनाथ शर्मा विरचित) सौभाग्य लक्ष्मी-हि .टी . सहित। इसमें लक्ष्मीदेवी के प्रसन्न करने के आधनीत स्त्रभूतो, कवच व सदाचारों का वर्णन है।

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