भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 176 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 23

हिन्दीटीकासहित २१ करने के प्रसंग में मैं अपने मित्र डॉ० रुद्रदेवजी त्रिपाठी प्रकाशन सम्पादन तथा अनुसन्धान अधिकारी, ब्रजमोहन बिड़ला शोध केन्द्र, उज्जैन का आभार मानता हूँ। कालिदास अकादमी के सञ्चालक श्री प्रोफेसर श्रीनिवास "रथ" का भी इस ग्रन्थ के प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप में सहायक बन प्रेरित करने के साथ साथ प्रकाशन तक के कार्य में योगदान के कारण आभारी हूँ। कालिदास अकादमी परिवार के डॉ० जगदीश शर्मा, अनुसंधान सहकारी का तथा टंकण कार्य में सहायता के कारण श्री अवधेश श्रीवास्तव तथा श्री आर० जे० पानड़ीवाल का भी आभार मानता हूँ। इस ग्रन्थ को अपने प्रकाशनक्रम में लगाकर शीघ्र मुद्रणादि कार्य पूर्ण करवाने के कारण सर्वप्रथम श्रीमुरलीधरजी बजाज, स्वामी खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन बम्बई का तथा इसी प्रतिष्ठान के व्यवस्थापक भाई श्री ऋषिकेश शर्माजी का भी हृदय से आभारी हूँ। मुद्रणादि कार्य में रुचि लेकर समय पर कार्य पूर्ण करने के लिये वेङ्कटेश्वर प्रेस के सभी कर्मचारियों का भी आभारी हूं। उज्जैन के बालाजी पुस्तकालय के व्यवस्थापक श्रीतरुणकुमार गर्ग का मैं किन शब्दों में आभार मानूं। इसके साथ मुद्रण की या विवेचन के क्रम में रहनेवाले स्खलनों के लिये विनम्र क्षमाप्रार्थना के साथ सभी विद्वज्जन एवं पाठकों को प्रकृत ग्रन्थ को अपनाकर सहृदयता के साथ अनुग्रह रखने की साग्रह प्रार्थना करता हूं। आशा है इस ग्रन्थ का वे पूरी तत्परता से स्वागत करेंगे। सुधीजन से निवेदन के इस पद्य के साथ इस प्रकृत कथन का उपसंहार करतां हूँ। "इह प्रमादान्मति-विभ्रमाद्वा भवेत् क्वचिन्मे स्खलितं बुधैस्तत् । संशोधनीयं कृपया यदीशादन्यो न सर्वज्ञपदं प्रयाति ॥" इति निवेदकः विदुषां वशंवदः बाबूलाल शुक्ल, शास्त्री, हिन्दी व्याख्याकारः सम्पादकश्च