नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता का ज्ञान भारद्वाज मुनि ने प्राप्त किया था जो पांच मुनियों में एक थे तथा इसी कारण यह पाञ्चरात्र कहलाया इसे पूर्व में बतला चुके हैं। इसी क्रम में पाञ्चरात्र के कुछ अनुन्मीलित उपासनादि के तत्वों की साधकादि भक्तों के लिये "भारद्वाजसंहिता" में चर्चा है जो नारदपञ्चरात्र (ग्रन्थ) में नहीं है। इसी कारण यह संहिता वार्तिक के समान आदर पा रही है। इसके भी परिशिष्ट में चारों अध्यायों के चर्चित तथ्यों पर और विवेचन है जो संहिता में संक्षेप में दिखलाया गया था। भारद्वाज संहिता के प्रथमाध्याय में मुख्यरूपसे न्यासयोग या भगवत्प्रपत्ति को ईश्वर की प्राप्ति तथा मोक्ष के लिये परमोपयोगी दिखलाकर शिष्य या साधक को न्यासयोग की दीक्षा प्रदान करने की विधि तथा वृत्ति आदि का विस्तार से विवरण दिया गया है। इस क्रम में इस दीक्षा तथा उपासना के लिये अधिकारी सभी वर्ण तथा स्त्री, शूद्र, म्लेच्छ आदि जातियों को भी मान्य किया गया है जो सभी तन्त्र एवं आगम परम्परा का अनुसरण करने वाला मत है। इन सभी के लिये दीक्षाप्रदाता गुरु पात्रानुरूप वैदिक, तान्त्रिक तथा भाषा मन्त्रों में से उपयुक्त मन्त्र का उपदेश देकर उन्हें श्रीहरि की प्रपत्ति अथवा न्यासयोग की दीक्षा सम्पन्न करवाता है। इसी क्रम में द्वितीयाध्याय में प्रपत्ति के अंगों की विवृत्ति है परन्तु परम्परा में द्वितीयाध्याय लुप्त है। तृतीयाध्याय में न्यासयोग प्राप्त कर लेने वाले आराधक के अर्चा तथा अन्य दैनिक तथा नैतिक कार्यों तथा विधानों का विवरण है तथा उसके द्वारा मुद्रा तप्त चक्रादि के अंकन तथा ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण की विधि बतलायी गई है जिससे भक्ति में परिनिष्ठता आ सके। चतुर्थाध्याय में आराधक के लिये वृत्ति तथा उसके अंगों का विस्तार से विवरण दिया गया है। भारद्वाज-संहिता के इन चारों अध्यायों पर परिशिष्ट के चार अध्याय और लगाये गये हैं जिनमें चारों अध्यायों में उपदिष्ट तत्वों के विषय में छोड़े गये तात्विक विवरणों को लेकर पाञ्चरात्र आगम की परम्परा तथा रहस्यों का स्पष्टीकरण किया गया है। वैष्णव परम्परा में पाञ्चरात्र आगम को दिव्यशास्त्र माना गया है तथा इसका श्रवण तथा अनुचिन्तन उपासक को अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि वैराग्य, ज्ञान तथा भक्ति के परिपाक के द्वारा ही परमेश्वर की प्राप्ति तथा मुक्ति मिलती है। इस ग्रन्थ की इस प्रकार संक्षिप्त चर्चा के साथ प्रकृत ग्रन्थ के अध्ययन तथा चिन्तन की ओर स्वतः प्रवृत्ति बनकर उपासकों एवं पाठकों का इस शास्त्र में प्रवेश होगा ऐसी आशा है। प्रकृत संस्करण नारदपञ्चरात्र-भारद्वाजसंहिता का वैष्णव आगम के क्षेत्र में विशिष्ट स्थान था परन्तु यह ग्रन्थ पूर्व में भी खेमराज श्रीकृष्णदास के वेङ्कटेश्वर प्रेस द्वारा प्रकाशित होकर लगभग तीस वर्षों से अनुपलब्ध रहा। जब इस ग्रन्थ का मुद्रण हुआ था उस समय वह संस्कृत भाषा में छपा था। इतने वर्षों के अन्तराल के पश्चात् इस ग्रन्थ की पुनः प्रकाशन की योजना पुनः प्रकाशक ने ऐसी बनाई कि हिन्दी व्याख्या के साथ यह ग्रन्थ प्रकाशित होकर सर्वजन हितार्थ बनें। यह कार्य करने का प्रकाशक का प्रस्ताव मैंने सहर्ष स्वीकार कर इस ग्रन्थ पर "तत्वप्रकाशिका" नामक हिन्दी व्याख्या तैयार की तथा अपेक्षित टिप्पणी तथा श्लोकानुक्रमणिका आदि के साथ "प्रस्तावना" से युक्त करते हुए यह ग्रन्थ प्रस्तुत कर दिया। प्रस्तावना भाग में इस शास्त्र के ऐतिहासिक तथा अन्य सभी पक्षों की चर्चा रखकर अनुशीलन कर्ताओं की अपेक्षा की पूर्ति के साथ अब यह प्रकाशित करवाया जा रहा है। इससे सुधीजन अवश्य संतुष्ट होंगे यही आशा है। आभार सर्वप्रथम नारदपञ्चरात्र तथा भारद्वाजसंहिता के अनुसन्धान अनुशीलन में सहायता करने वाले पञ्चरात्र आगम के विविध ग्रन्थों के रचयिताओं, सम्पादकों तथा ग्रन्थकारों का आभार मानता हू जिनके कारण प्रकृत ग्रन्थ इस रूप को प्राप्त कर सका। इसके हिन्दी व्याख्यादि के लेखनक्रम में सहायत