नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित १९ इस प्रकार रात्र पद की व्याख्या के साथ पञ्चरात्र आगम की परम्परा में इस शास्त्र के अनेक ग्रन्थों का विवरण दिया है। तदनुसार इस शास्त्र के सात शास्त्रकर्तागण मान्य हैं। यथा- ब्राह्मं शैवञ्च कौमारं वासिष्ठं कापिलं परम्। गौतमीयं नारदीयमिदं सप्तविधं स्मृतम्॥ (वही 1/-५७) इस विवरण के अनुसार इस पञ्चरात्र शास्त्र के छः अन्य शास्त्रकर्ता भी हैं जिनके इस वैष्णव आगम पर ग्रन्थ हैं। प्रकृत ग्रन्थ इन छः ग्रन्थों के अनुशीलन की भी सूचना देता है। इस ग्रन्थ में सर्वप्रथम नारद को एक देववाणी का श्रवण होता है जिसमें श्रीहरि की उपासना का कार्य ही सर्वोपरि कहकर उसे प्राप्त करने की प्रेरणा दी गयी- “आराधितो यदि हरिस्तपसा ततः किम् नाराधितो यदि हरिस्तपसा ततः किम्। अन्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा ततः किम् नान्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा ततः किम्॥ विरम विरम ब्रह्मन् किं तपस्यासु वत्स व्रज व्रज द्विज शीघ्रं शङ्करं ज्ञानसिन्धुम्। लभ लभ हरिभक्तिं वैष्णवोक्तां सुपक्वाम् भवनिगड़निबद्धच्छेदिनों कत्र्तनीञ्च॥ (ना० प० रात्रि 1/अ० २/६-७) इस दैवी कथन को सुनकर नारद अपने पिता सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के समीप इसकी व्याख्या हेतु जाते हैं। वहां वह सनत्कुमार तथा ब्रह्मा को इन दो श्लोकों को सुनाता है। ब्रह्मा ने इनकी व्याख्या करते हुए नारद को शंकर से दीक्षा लेकर वैष्णव अर्चा आदि की पारम्परिक विधि का पालन कर भक्ति की चरितार्थता का रहस्य बतलाया तथा नारद ने भी तदनुसार बड़ी साधना के बाद भगवान् शिव से उपदेश में एकान्ती श्रीविष्णु की भक्ति का तत्व प्राप्त किया। नारद पञ्चरात्र ग्रन्थ में पांच रात्र या खण्ड हैं जिनमें प्रथमरात्र में पन्द्रह, दूसरे में आठ, तीसरे में पन्द्रह, चौथे में ग्यारह तथा पांचवे में ग्यारह अध्याय हैं। इनमें वैष्णव धर्म तथा उसके आदिदेव श्रीविष्णुरूप वासुदेवकृष्ण तथा श्रीराधा के तात्त्विक आराधना का विस्तार से विवरण रखा गया है। इसमें अपना पक्ष प्रस्तुत करने तथा उसे परमोयोगी एवं हितावह दिखलाने की भावना से आस्था जाग्रत करने के लिये ही अन्य देवों तथा धर्मों की उपासना प्रक्रिया की समीक्षा रखी है, जिसे किसी अन्य देव तथा उनकी उपासना पर प्रहार नहीं समझना चाहिए। पाञ्चरात्र-आगम के ग्रन्थों में नारदपञ्चरात्र मध्यमणि की तरह महत्वपूर्ण स्थान पर विद्यमान है। भारद्वाजसंहिता पाञ्चरात्रागम की अतिसमृद्ध ग्रन्थ सम्पत्ति रहने से इसकी चर्चा पूर्व में की जा चुकी है। यह ग्रन्थ नारदपञ्चरात्र का वार्तिक भूत परिशिष्ट है जिसमें चार अध्याय हैं तथा इन्हीं चार अध्यायों की शेषभूत तात्विक व्याख्या को परिशिष्ट में देकर इस शास्त्र की समग्र पूर्ति की गई है। भारद्वाजसंहिता मे विद्यमान द्वितीय अध्याय थोड़ा ही है तथा ऐसा माना जाता है कि यह भाग अब प्राप्य नहीं है। हमने भी भारत के मुख्य मुख्य तथा प्रामाणिक हस्तलिखित ग्रन्थों के पुस्तकालयों में खोजने पर तथा उनके सूची ग्रन्थों में देखने पर भी उक्त द्वितीय अध्याय की पूर्ण प्रति नहीं देखी। अतः श्रीवेङ्कटेश्वर प्रेस की पहिले मुद्रित प्रति के पाठ को लेकर ही सम्पादन तथा हिन्दी व्याख्या का कार्य सम्पन्न किया। आगम परम्परा में पाञ्चरात्र के प्रवर्तक मुनियों में सनत्कुमार नारदादि ब्रह्मपुत्रों से इस आगम