नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता इस बिम्ब में प्रभु के सभी अवयव दृश्य होते हैं तथा यह बिम्ब लौकिक तथा पारलौकिक सभी फलों का प्रदान करनेवाला होता है। चित्रार्थ में सर्वावयव अर्द्धदृश्य होते हैं अतः यह बिम्ब केवल लौकिक फलों का प्रदाता होता है। चित्राभास वह है जिसमें ऊंचाई और लम्बाई के मान पर अधिक विचार न रखते हुए वस्त्र, काष्ठफलक या भित्ति पर अंकित किया जाता है। पुनः ये विग्रह वैखानसों के मत में तीन तथा पाञ्चरात्रों के मत में चार प्रकार की स्थिति के कारण चार प्रकार के होते हैं। खड़ीमूर्ति, आसनबद्ध या बैठी हुई मूर्ति तथा शयानमूर्ति। ये तीन भेद वैखानस मानते हैं। इन भेदों के साथ पांचरात्र में यानग या वाहन पर स्थिति वाले विग्रह का चौथा भेद माना गया है। ये सभी विग्रह भोग, योग नीर तथा अभिचारिक भेद से प्रत्येक की एक दूसरे से भिन्नता रखते हैं। पाञ्चरात्र ग्रन्थों में इन भेदों के अतिरिक्त कुछ विशेष भेदों की कल्पना भी की गई है जिन्हें विस्तार भय से यहाँ नहीं दिया जा रहा है, उन्हें यथास्थान जिज्ञासु तथा विशेषार्थ के अन्वेषकजन तत्तत् स्थानों पर शास्त्रग्रन्थों का अवलोकन करें। इसमें कामना भेद से तत्तद् विग्रहों की अर्चा की स्थिति मानी गयी है। यज्ञों से होनेवाले अर्थव्ययों तथा असुविधाओं को ध्यान में रखकर वैखानस तथा पाञ्चरात्र आगमों में जगत्हितार्थ तथा कामनापूर्ति एवं उद्दिष्टफलों की उपलब्धि के लिये विग्रहार्चन का विधान अधिकरूप से किया जाता है जिनकी विधियां इन आगमों के अनुगत पद्धतिग्रन्थों में विद्यमान हैं तथा उनके प्रयोगों का समय समय पर अर्चा में उपयोग किया जाता है जिनका ज्ञान सम्बद्ध आचार्य रखते हैं। नारदपञ्चरात्र- पिछले पृष्ठों में पाञ्चरात्र-आगम की चर्चा की जा चुकी है। “नारद पञ्चरात्र" का वैष्णवागम के अन्तर्गत एक विशिष्ट स्थान तो है ही इसकी गणना भी प्राचीनतम आगमग्रन्थों में की जाती है। इतिहास के विद्वानों के मत में श्रीमद्भागवत ग्रन्थ ही इससे प्राचीन माना गया है जिसकी तात्विक रूप में भक्तिसिद्धान्त के साथ अर्चादि विधानादि से संयुक्त पाञ्चरात्र आगम में शास्त्रीय स्थिति को दिखलाया गया था। इसमें सर्वाधिक बल श्रीवासुदेव की दास्य-भक्ति तथा इसी से मुक्ति की प्राप्ति पर दिया गया है। इसके प्रतिपाद्य विषयों में श्रीकृष्ण, श्रीगोपाल तथा श्रीराधा की प्रशस्ति, इनकी अर्चा तथा इन्हीं के आगमोक्त सहस्रनाम, कवच तथा न्यास आदि का विधान दिखलाया गया है। इसकी मान्यता है कि श्रीकृष्ण की आराधना के बाद भक्त को सभी पदार्थों की प्राप्ति संभव है। इसमें भगवान् शिव के द्वारा दिये गये नारद को उपदेश तथा मन्त्र आदि में श्रीकृष्ण की आराधना को मोक्षप्राप्ति का परम साधन निरूपित किया गया है। नारद स्वयं इस पाञ्चरात्र आगमग्रन्थ का उपक्रम इस प्रकार करते हैं- "वेदेभ्यो दधिसिन्धुभ्यः चतुर्थः सुमनोहरम् । तज्ज्ञानमन्थान्दण्डेन सन्निर्मथ्य नवं नवम् । नवनीतं समुद्धृत्य नत्वा शम्भोः पदाम्बुजम् ॥ विधिपुत्रो नारदोऽहं पञ्चरात्रं समारभे ॥ (ना० प० रात्रि। अ० १/१०-११) यह कथन इस शास्त्र की समृद्ध एवं प्रामाणिकता को दिखलाने के साथ साथ नारदप्रोक्त स्थिति की ओर भी संकेत करता है। पाञ्चरात्र पद की व्याख्या भी इसमें स्वयं ग्रन्थकार ने ही की है। यथा- "रात्रञ्च ज्ञानवचनं ज्ञानं पञ्चविधं स्मृतम् । तेनेदं पञ्चरात्रञ्च प्रवदन्ति मनीषिणः । ज्ञानं परमतत्त्वञ्च मृत्युञ्जयजरापहम् ॥ (रा० । अ० १/४४-४५)