नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित १७ समाधान दिया था- युधिष्ठिर उवाच-कथं त्वमर्चनीयोऽसि मूर्तयः कीदृशाश्च ते । वैखानसाः कथं ब्रूयुः कथं वा पाञ्चरात्रिकाः ॥ श्रीभगवानुवाच-शृणु पाण्डव तत्सर्वमर्चनाक्रममात्मनः । स्थितं मां मन्वतस्तस्मिन्नर्चयेत् सुसमाहितः । विष्णुञ्च पुरुषं सत्यमच्युतञ्च युधिष्ठिर । अनिरुद्धञ्च मां प्राहुर्वैखानसविदो जनाः । अन्ये त्वेवं विजानन्ति मां राजन् पाञ्चरात्रिकाः । वासुदेवञ्च राजेन्द्र सङ्कर्षणमथापि वा । प्रद्युम्नञ्चानिरुद्धञ्च चतुर्मूर्ति प्रचक्षते ॥ इति ॥ इन दोनों सम्प्रदायों में श्रीविष्णु की अर्चा का अतिशय महत्वपूर्ण स्थान है। वेदों में यज्ञ को विष्णुरूप कहा गया है-यज्ञोह वै विष्णुः- अतः श्रीविष्णु पूजन भी यज्ञ ही है। दोनों सम्प्रदाय यज्ञ तथा देवालय की समता बतलाते हैं कि यज्ञशाला में अग्निस्थापन है तो देवालय में विष्णुस्थापन है। यज्ञशाला में हिरण्यकलश स्थापन है तो बिम्बपीठ पर रत्नकलश स्थापित रहता है। अग्नि पांच है-गार्हपत्य, आहवनीय, अन्वाहार्य, सभ्य तथा आवसथ्य। विग्रह भी पांच हैं-ध्रुव, कौतुक, उत्सव, स्नपन तथा बलि। जैसे श्रौतकर्म में गार्हपत्य अग्नि से आहवनीय अग्नि को लेते हैं वैसे ही ध्रुव विग्रहसे परमात्मा को कौतुक विग्रह में ले जाया जाता है। जैसा सभ्याग्नि तथा आवसथ्याग्नि को छोड़ कर त्रेताग्नि प्रसिद्ध है वैसे ही कौतुक तथा स्नपन को छोड़ कर शेष तीन ध्रुव, उत्सव तथा बलि विग्रह अधिक प्रसिद्ध हैं। परमेश्वर श्रीविष्णु की अर्चा दो प्रकार से की जाती है-समूर्त अर्चन तथा अमूर्त अर्चन। इनमें समूर्त अर्चन विग्रहों में तथा अमूर्त अर्चन होमादि यज्ञ में विष्णु की रखी जाती है। यहां भी स्वार्थ अर्चना स्वगृह में एवं परार्थ अर्चना जगत्-कल्याणार्थ देवालयों में होती है। आहिताग्नि को जैसे अग्नि में आहुति देने का अधिकार रहने पर अनाहिताग्नि पूरुष उसे सामग्री देकर भी वैसा फल प्राप्त कर सकता है वैसे ही अर्चना के अनधिकारी व्यक्ति अधिकारी व्यक्ति को विग्रह के लिये पूजन सामग्री आदि उपकरण प्रस्तुत कर स्वपुण्य फलप्राप्ति करते हैं। देवालय इसी उद्देश्य से हैं कि सभी देवार्चन अथवा यज्ञ के फल को प्राप्त कर सकें। जैसे यज्ञ में पञ्चाग्नि होती हैं उसी प्रकार वैखानस मत के अनुसार देवालय मे पांच विग्रह होते हैं। यथा-ध्रुव, कौतुक, उत्सव, स्नपन तथा बलि। ये पाँच विग्रह वैखानस सम्प्रदाय में मान्य हैं। पाञ्चरात्र सम्प्रदाय में छः विग्रह तथा अर्चा मान्य है। ये हैं-ध्रुवार्चा, कमार्चा, उत्सवार्चा, बल्यार्चा, तीर्थार्चा तथा शयनार्चा। इनके अन्य नाम हैं- कमार्चा, बल्यार्चा, यात्रार्चा, कृत्रिममाल्यार्चा, यागार्चा तथा स्नानार्चा। परमेश्वर का विग्रह अचल तथा चल माना जाता है अतः अचल के पूजनार्थ ध्रुव विग्रह स्थापित करते हैं। इन विग्रहों के नाम से इनका प्रयोजन भी अभिव्यक्त होता है। समग्र संवत्सर में अनेक उत्सव रहते हैं जिनमें प्रभु देवालय से बाहर भी गजवाहन, गरुड़ वाहन आदि दशाओं में यात्रा आदि रूप में जाते हैं तदर्थ उत्सव विग्रह होता है। इसी प्रकार स्नान, बलि तथा शयन के लिये भी पृथक् पृथक् तत्तद् विग्रह नियत होते हैं। स्नपन विग्रह में पूजा के समय ध्रुवबेर से कुश के द्वारा सम्बन्ध स्थापित कर स्नपन विग्रह में प्रभु की प्रतिष्ठा कर स्नानार्चन के बाद पुनः ध्रुवबेर में स्थापित करने की विधि होती है। ध्रुवबेर प्रधान होता है तथा चार या पांच बेर ध्रुवबेर सें पूर्वाद्रिक्रम से स्थापित की जाती है। ये बेर या विग्रह तीन प्रकार के माने जाते हैं-चित्र, चित्रार्थ तथा चित्राभास। जो विग्रह अपने मान, प्रमाण, उन्मान, परिमाण, उपमान तथा लम्बमान से युक्त हो वह चित्रबिम्ब या चित्रवेर है।