भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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१६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता ज्ञान क्रिया विरहित, अकाम, अजाति और निर्गुण होकर भी सर्वज्ञ, स्वयंप्रकाश्य, सर्वव्यापी तथा सभी का पालनकर्ता है तथा जो सहजबोधगम्य भी है। योग के द्वारा लघुभूत आत्मा या जीव का संयोग परमात्मा से बनता है। यह योग अष्टांग द्वारा सिद्ध माना गया है। जो कि-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, ध्यान, धारणा, प्रत्याहार तथा समाधि नामक आठ अंग है। इनमें यम में सत्य, दया, धृति, शौच, ब्रह्मचर्य, क्षमा, आर्जव, मिताहार, अस्तेय और अहिंसा आते हैं तथा नियम में सिद्धान्तश्रवण, दान, मति, ईश्वरार्चा, सन्तोष, तप आस्तिक्य, ह्री, मन्त्रजप, व्रतोपवास आदि रखे गये हैं। योगविषयक यह सभी वैष्णव आगमिक विवरण पातञ्जलयोगशास्त्र से भिन्न हैं। आगम में प्रमाणमीमांसा भी अन्य शास्त्रों की तरह अपेक्षित रहने से इसकी पूर्ति की भावना से प्रमाणादि पर भी यहाँ विचार मिलता है। यहां प्रमाका लक्षण "यथार्थावधारणम्" दिया गया है जिसका अर्थ है वस्तु का यथार्थज्ञान प्रमा है और जो प्रमाण से ग्राह्य होती है। मनुष्य के लिये हितकर जो वस्तु प्रमाण से प्राप्त होती है वह प्रमाणार्थ कहा जाता है। यह दो प्रकार का है-इनमें एक वह जो आत्यन्तिक तथा एकान्तिक हित का आधान करता हो तथा दूसरा परोक्षरूप से हितकर होता है जिसे हितसाधन या हित कहा गया हो। परमेश्वर से तादाम्य प्राप्ति अतिशय आनन्दमयी और अत्यन्त हितकारी मानी गयी है। अतः इसकी प्राप्ति के दो मार्ग-धर्म तथा ज्ञान हैं। ज्ञान के भी दो भेद हैं-साक्षात्कार तथा परोक्ष। धर्म से ज्ञान उत्पन्न होता है जो दो प्रकार का है-प्रथम वह जो ईश्वरभक्ति की साक्षात् प्रेरणा देता हो तथा दूसरा वह जो परोक्ष रूप से प्रेरणा करता है। ईश्वर की दृष्टि से आत्मसमर्पण या हृदसंयोग परोक्ष धर्म है तथा जिस मार्ग से योगी भगवत्साक्षात्कार करता है वह साक्षात् धर्म कहलाता है जो पाञ्चरात्र ग्रन्थों में उपदिष्ट है और सात्वत-शासन कहलाता है। पुरुषार्थ भूत धर्म, अर्थ तथा काम की तरह मोक्ष भी साध्य है। यद्यपि ये तीनों भी परस्पर सहायक रहते हुए मोक्ष को साध्य बनाते हैं। वैखानस-आगम- वैखानस-आगम विखनस से प्रवर्तित था यह बतला आये हैं। छान्दोग्योपनिषद् के अर्चियान प्रकरण में वैखानस पद का शाङ्करभाष्य में अर्थ वानप्रस्थी किया गया है। वैखानसगृह्यसूत्र की तात्पर्य चिन्तामणि टीका में दशविधिहेतु निरूपण में बतलाया है कि वैखानसों को श्रीनारायण गर्भ में ही मुद्राधारण करवा देते हैं। जैसे वृक्षों में अश्वत्थ, पशुओं में कपिला गौ, पौधों में तुलसी पवित्र हैं, उसी तरह द्विजों में ब्राह्मण, तथा ब्राह्मणों में वैखानस श्रेष्ठ होते हैं। यथा- “विप्रा वैखानसाख्या ये ते स्मृताः भगवत्प्रियाः । अश्वत्थः कपिलागावस्तुलसी विखनास्तथा । द्विजेषु ब्राह्मणाः श्रेष्ठाः ब्राह्मणेषु च वैष्णवाः ॥" यद्यपि पाञ्चरात्र मत जैसे भगवद्भक्ति का उपदेशक है उसी प्रकार वैखानस भी है किन्तु दोनों में अन्तर भी है। वैखानस पूजन या अर्चा को वैदिक-पूजन कहते हैं तथा पाञ्चरात्र इसे शुद्धपूजन कहते हैं। "पुष्करसंहिता" के तन्त्रभेदनिर्णय प्रसंग में यह भेद इस प्रकार बतलाया है- 'शुद्धञ्च वैदिकञ्चेति तान्त्रिकञ्च त्रिधा भवेत् । पाञ्चरात्रेण पूजा तु शुद्धं विष्णोरिति स्मृतम् ॥ वैखानसः स्वसूत्रेण पूजयेद् विष्णुमव्ययम् । वैदिकं तदिति प्रोक्तं द्विजातीनां प्रशस्यते ॥" इसके अतिरिक्त इन दोनों में अन्य भेद भी हैं। वैखानस मत में पांच मूर्तियों की अर्चा की जाती है तथा पाञ्चरात्र केवल चार मूर्तियों के चतुर्व्यूह की अर्चना करते हैं। वैखानसमत की पांच मूर्तियां हैं-श्रीविष्णु, पुरुष, सत्य, अच्युत तथा अनिरुद्ध। पाञ्चरात्र मत की मूर्तियां है-वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध। महाभारत के अश्वमेधिक पर्व में युधिष्ठिर के प्रश्न का वासुदेव ने यह