भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासहित १५ रहस्यों को मानता है। इसके अनुसार जगत् सुदर्शन से उत्पन्न है अतः जगत् की सभी शक्तियां सुदर्शन के रूप हैं। जैसा कि कहा भी है- “सुदर्शनाह्वया देवी सर्वकृत्यकरी विभोः । तन्मयं विद्धि सामर्थ्यं सर्वं सर्वपदार्थजम् ॥ धर्मस्यार्थस्य कामस्य मुक्तेर्बन्धत्रयस्य च । यद्यत् स्वकार्यसामर्थ्यं तत्तत् सौदर्शनं वपुः ॥” अर्थात् सुदर्शन की शक्ति चेतन तथा जड़ समस्त पदार्थों में तथा बन्धन और मोक्ष के रूप में प्रकट है। जो भी उत्पन्न करने की शक्ति रखता है वह सुदर्शन शक्ति का ही प्रकटीकरण है। मन्त्र भी शुद्धचैतन्यरूप श्रीविष्णु की शक्ति है। घण्टों की दीर्घ ध्वनि के रूप में सर्वप्रथम जो अभिव्यक्ति होती है वह “नाद” कहलाती है जिसे केवल योगी ही सुन सकते हैं या यह उन्हें ही प्रत्यक्ष होती है। दूसरी अभिव्यक्ति सागर से बूँद की तरह होनेवाली मानी गयी है जिसे “बिन्दु” माना गया। “बिन्दु” में नाम तथा उसके द्वारा संकेतित शक्ति का तादात्म्य होता है। इसके बाद नामी का उदय होता है जो शब्द-ब्रह्मन् है। इस प्रकार प्रत्येक वर्ण की उत्पत्ति के साथ तदनुरूप अर्थशक्ति (नाम्युदय) भी उत्पन्न होती है। बिन्दु शक्ति के स्वर तथा व्यञ्जन उत्पन्न होते हैं। जिनकी वैष्णव मान्यता यह है कि श्रीविष्णु की कुण्डलिनी शक्ति के भ्रमण या नृत्य के १४ प्रकार के प्रयत्नों से १४ स्वरों की उत्पत्ति हो जाती है। यह शक्ति जब मूलाधार से उठकर नाभिप्रदेश तक रहती है तो यह “पश्यन्ती” कहलाती है। योगी ही इसका अनुभव कर सकते हैं। आगे जब वही हृदय कमल की ओर बढ़ती है और कण्ठ द्वारा व्यक्त शब्दरूप में प्रकट होती है। स्वरशक्ति सुषुमा नाड़ी में से चलती है तथा इस प्रकार भिन्न भिन्न व्यञ्जनों की ध्वनियां जगत् की भिन्न शक्तियों के आदर्शरूप है, वे भिन्न भिन्न देवताओं की शक्तियों की अध्यक्ष होती हैं। इनमें से कुछ वर्णों का भिन्न क्रम तथा व्यूह में समुच्चय जिसे चक्र या कमल कहते हैं विभिन्नप्रकार वाली जटिल शक्तियों का प्रतिनिधि माना जाता है। इन चक्रों की अर्चना और ध्यान करने से चक्र में निहित शक्ति को वश में किया जाता है। यहां प्रत्येक चक्र तथा मन्त्र के साथ भिन्न भिन्न देवताओं का सम्बन्ध रहता है। पाञ्चरात्र ग्रन्थों के अधिकांश भाग इन चक्र तथा देवताओं के वर्णन तथा इनकी अर्चाक्रम, इनके अनुरूप देव प्रतिमा तथा इनके मन्दिर निर्माण के विवरण से भरे हुए हैं। पाञ्चरात्र आगम में भक्त को योगी बनने की बात कही जा चुकी है। अतः इनके ग्रन्थों में भी योग विषयक विवरण रखा जाता है। जिसमें नाड़ीतन्त्र का वर्णन शरीरस्थ नाड़ियों आदि का योग के साधनार्थ विवरण है। यह वर्णन शाक्ततन्त्र से तथा आयुर्वेद के नाड़ी विवरण से भिन्न है और अपनी स्वतंत्र स्थिति रखता है। वैष्णव-आगम में योग को जीवात्मा का परमात्मा के साथ संयोग माना जाता है। इनका मत है कि अन्तिम ध्येय की प्राप्ति के दो मार्ग हैं-इनमें एक है श्रीविष्णु की कोई एक शक्ति के रूप में ध्यान लगाकर उसमें आत्मसमर्पण करना जिसे छद्मबुयोग कहा जाता है। यहां किसी एक विशेषरूप परमन्त्र द्वारा ध्यान केन्द्रित किया जात है। दूसरा मार्ग योग का है। यहां जीवात्मा के दो प्रकार माने गये है। इनमें एक वह जो प्रकृति से प्रभावित हैं तथा दूसरा दह जो प्रकृति के प्रभाव से परे हैं। यहां यह भी माना गया कि परमेश्वर से कर्म और ज्ञान के द्वारा तादात्म्य स्थापित किया जा सकता है। कर्म के भी दो प्रकार माने गये हैं जिनमें एक इच्छाप्रेरित या प्रवर्तक और दूसरा इच्छा से रहित या निवर्तक कहलाता है। इनमें से दूसरे प्रकार का कर्म मुक्ति प्राप्त करवा सकता है और प्रथम रूप का कर्म इच्छा की फल-प्राप्ति तक सीमित है। परमात्मा जिसके अनन्त कल्याणकारी गुण हैं तथा जो सूक्ष्म, अनादि, अनन्त एवं अविकारी है। जो नटीव कुण्डली शक्तिराद्या विष्णोर्विजृम्भते । (अहि० ११/२५) विष्णुशक्तिमया वर्णाः विष्णुसङ्कल्पजृम्भिताः अधिष्ठिता यथा भावैस्तथा तन्मे निशामय ।। ("अहि० १७/३")