भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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१४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता इसके अतिरिक्त वासुदेव के दो रूप और भी हैं जिन्हें आवेशावतार तथा साक्षात् अवतार कहा गया है। आवेशावतार दो प्रकार के हैं—स्वरूपावेश तथा शक्त्यावेश। साक्षात् अवतार की उत्पत्ति दीपक के दूसरे दीपक के जलने की तरह सीधे और अविलम्ब होती है। ये सांसारिक अवतार से भिन्न हैं तथा मुमुक्षु जन के उपास्य भी हैं। परशुराम, आत्रेय, कपिल, व्यास, अर्जुन, पावक आदि सभी आवेशावतार हैं तथा मुख्यरूप से आराध्य नहीं माने जाते हैं। इसी प्रकार आगे प्रत्येक व्यूह से तीन उपव्यूह प्रकट होते हैं। इनमें वासुदेव से केशव, नारायण और माधव, संकर्षण से गोविन्द, विष्णु तथा मधुसूदन, प्रद्युम्न से त्रिविक्रम, वामन तथा श्रीधर और अनिरुद्ध से हृषीकेश, पद्मनाभ तथा दामोदर प्रकट होते हैं। इसके अतिरिक्त विभवावतार भी होते हैं जिनकी संख्या आगम में ३९ मानी गयी है तथा समस्त विभवातारों की उत्पत्ति अनिरुद्ध से होती है। एक अन्य प्रकार और भी है जो अर्चावतार कहलाते हैं तथा इन सभी का विस्तार से आगम में विवरण भी दिया गया है। परमेश्वर वासुदेव अपनी शक्ति श्री से युक्त रहते हैं। आगम में इनकी तीन सहधर्मिणी देवियाँ लक्ष्मी, भूमि तथा नीला का उल्लेख मिलता है। ये तीन इच्छा, क्रिया तथा साक्षात् शक्तिरूप हैं। लक्ष्मी को विष्णु की अन्तिम तथा नित्य शक्ति माना गया है। यही परमशक्ति संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध के रूप में प्रकट हैं। ये भिन्नशक्तियां अभिव्यक्त होने पर ही गोचर होती हैं किन्तु जब ये अव्यक्त दशा में होती हैं तब भी श्रीविष्णु में लक्ष्मीरूप से परमशक्ति के रूप में अवस्थित रहती हैं। व्यक्त, अव्यक्त, पुरुष, काल तथा योग का श्रीलक्ष्मी में ही निवास रहता है। लक्ष्मी ही ऐसी परमा शक्ति हैं जिसमें सभीका लय होता है। मुक्त जीव इसी मातृशक्ति लक्ष्मी में प्रवेश करते हैं जो श्रीविष्णु का परमधाम है। यह स्वरूप से आनन्दमयी है तथा इसके अन्तराल में आनन्त तत्व है तथा यही उत्पत्ति, स्थिति, संहार, अनुग्रह तथा निग्रह रूपी पांच कार्यों की करनेवाली मानी गयी है। इस शक्ति का अंशमात्र भाव्य तथा भावक शक्ति के रूप में व्यक्त होता है। जिसमें भावक शक्ति सुदर्शन के नाम से तथा भाव्य जगत् के रूप में प्रकट होती है,जिसका उद्देश्य भी संसार है। इस प्रकार विष्णु से एकात्मता का अर्थ सुदर्शन से तादाम्य या श्री लक्ष्मी में प्रवेश होकर लीनता प्राप्त करना है। पाञ्चरात्र मत में एक भक्त या उपासक के लिये उपादेय तत्व है ईश्वर प्राप्ति के लिये साधन भूत प्रपत्ति, न्यास या शरणागति का सिद्धान्त। यहां शरणागति की व्याख्या इस प्रकार है कि हम जीव होने से पाप तथा दोषों में लिप्त हैं तथा श्रीविष्णु के अनुग्रह के प्राप्त न होने से भटके हुए हैं तथा सर्वथा निराधार हैं। इस विश्वास से परमेश्वर के अनुग्रह की याचना करना शरणागति है। जो साधक भक्त या पुरुष प्रपत्ति के इसी मार्ग को ग्रहण करता है उसे सभी जैसे तप, यज्ञ, तीर्थाटन, दान आदि से समग्र फल की अनायास प्राप्ति होकर बिना अन्य साधन के सरलता से मोक्ष या मुक्ति की प्राप्ति हो जाती है। प्रपत्ति मार्ग अपनाने के लिए केवल एक भाव ही अपेक्षित होता है कि साधक या भक्त श्रीविष्णु पर सर्वथा आश्रित रहे हैं और अपने को सर्वदा नितान्त निराधार समझे। इस भावना में दृढ़ता से आस्था तथा विश्वास करते हुए जब साधक या भक्त श्रीविष्णु की आराधना में रत रहता है तो फिर उसे कोई अन्य प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं होती है तथा उसका अभीष्ट कार्य ईश्वर ही सब कुछ कर देता है। यह प्रपत्ति एक प्रकार का उपाय ज्ञान है, उपाय नहीं है। यह एक प्रकार की धारणा या मति है, कर्म नहीं है। यही बात इस प्रकार समझी जा सकती है कि यह एक तरणी है जिसमें यात्री बैठता है और मल्लाह उसे पार कर देता है। यह तत्व पाञ्चरात्र आगम में परम्परा के अनुगत श्रुति, पुराण आदि सभी से अविरोध रखता है तथा वैष्णवमत का परिचायक सुदृढ़ आधार तत्व भी है। पाञ्चरात्र मत वैदिक तथा तान्त्रिक सिद्धान्तों का आधार लेकर प्रवृत्त रहने से मन्त्र के गुह्य

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