भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासहित १३ क्यारूप ज्ञान के निरन्तर अभ्यास से सत्ताख्य ज्ञान पूर्ण तथा परिपक्व होता है। इस प्रकार योगाभ्यास के द्वारा अन्त में साधक या योगी ब्रह्मरंध्र के द्वार से निकल जाता है और अपने देह का परित्याग कर अन्त में मूल सत्यभूत वासुदेव के साथ एकरस हो जाता है। "विष्णुसंहिता" में ईश्वर की पांच शक्तियों का उल्लेख है जिनके द्वारा ईश्वर अपने को प्रकट करता है। इस प्रकार प्रकृति की शक्तियां ईश्वर में निहित हैं तथा क्षेत्र या प्रकृति क्षेत्रज्ञ या रूपभूत ईश्वर से अभिन्न हैं। इनमें प्रथमशक्ति चित्शक्ति है जो समस्त क्रियाओं की अपरिणामी आधार है। द्वितीय भोगशक्ति है जो पुरुषरूप में है। तीसरी कारणशक्ति है जो विश्व के विविधरूपों में प्रकट होती है। चौथी शक्ति इन्द्रियों के विषय ग्रहण करवा कर ज्ञानरूपता देती है तथा पांचवी शक्ति ज्ञान क्रियात्मक होती है जिसे सर्वा कहा जाता है। अतः पुरुष तथा भोग्य प्रकृति ये दोनों स्वतन्त्र तत्व न होकर ईश्वर की ही शक्ति मात्र हैं। परमेश्वर से समरस होने के लिये प्राणायामके क्रम से आगे अनेक ध्यानादि करने भी आवश्यक हैं। भक्ति का अर्थ यहां ईश्वराभिमुखीकरण है जिसको आगे बढ़ाने का साधन योग साधना है। यहां भक्त को योगी माना गया है तथा योग द्वारा प्राप्त ज्ञान ही सर्वोच्च है क्योंकि योग के ज्ञान के बिना अनुष्ठित कर्म इष्टफल नहीं दे पाते हैं। योग का अर्थ ही चित्त का विषय पर बिना क्षोभ से समाहित होना (कहा गया) है। अतः जब चित्त कर्म करने में दृढ़ता से स्थिर हो जाए तो यही कर्मयोग और जब यही ज्ञान पर अस्खलित रूप से सक्त या स्थिर हो तो ज्ञानयोग हो जाता है। योगी या भक्त इन दोनों योगों को साधते हुए जब श्रीविष्णु की शरण लेता है तो उसे एकात्मता की प्राप्ति होती है। यहां उसकी वृत्तिभूत इस चिन्तनासे चित्त में निर्मल भक्ति का जन्म होता है जिससे आसक्ति की जड़ों का नाश होकर अन्त में समस्त इच्छाओं से तथा राग से छुटकारा पाकर वह मुक्ति प्राप्त कर लेता है। यहां कर्मयोग तथा ज्ञानयोग में से किसे चुना जाए इस बिन्दु पर यही दिखलाया है कि इस विषय में कोई नियम नहीं है। कोई स्वभाव से कर्मयोग के लिये तथा कोई ज्ञान-योग के उपयुक्त होता है। परन्तु विशेष योग्यता वाले कर्म तथा ज्ञान दोनों का संयोजन करने में समर्थ हो जाते हैं। "अहिर्बुध्न्यसंहिता" पाञ्चरात्र ग्रन्थों में 'अहिर्बुध्न्यसंहिता' का अपना विशेष तथा प्रामाणिक स्थान माना गया है। इसमें अहिर्बुध्न्य के द्वारा सङ्कर्षण से सुदर्शन नामक सत्यज्ञान की प्राप्ति का विवरण है जो विश्व की समस्त वस्तुओं का आधार है। जब ब्रह्म जो ज्ञानरूप तथा सर्वगुणसम्पन्न है अपने को नानारूप में प्रकट करता है तो वह "सुदर्शन" कहलाता है। ईश्वर में शक्ति अभिन्न रूप से स्थित है तथा जगत् उसकी अभिव्यक्ति है, जिसे आनन्द कहा गया है। क्योंकि वह निरपेक्ष है और जगत् रूप से अभिव्यक्त होने पर लक्ष्मी कहलाती हैं। यह जगत्रूप से अपने को संकुचित करती है अतः कुण्डलिनी है तथा विष्णुशक्ति भी कहलाती है। शक्ति ब्रह्म से अभिन्न दिखती है और ईश्वर इसी की सहायता से जगत् की रचना करता है। प्रगति के क्रम से यह शक्ति सृष्टि का विकास करती है तथा जब यही विपरिवर्तित होती है तो प्रलय होता है। इस शक्ति की दो भिन्न युगल क्रियाओं से नाना प्रकार की शुद्ध रचनाएं होती हैं। ज्ञान और बल क्रियाओं से संकर्षण का आध्यात्मिकरूप उत्पन्न होता है। ऐश्वर्य और वीर्य से प्रद्युम्न का तथा शक्ति और तेज से अनिरुद्ध की उत्पत्ति होती है। ये तीनों दैवी-व्यूह कहे जाते हैं। यद्यपि प्रत्येक व्यूह में दो दो गुण प्रधान है फिर भी वह ईश्वर के षड्गुणों से युक्त हैं क्योंकि ये श्रीविष्णु के ही रूप हैं। व्यूह तीन प्रकार के कार्य करते हैं-(१) उत्पत्ति स्थिति और लय, (२) सांसारिक वस्तुओं का पोषण तथा (३) मुमुक्षु भक्तों की सहायता। ये तीनों रूप वासुदेव से अभिन्न हैं और श्रीविष्णु के शुद्ध या पूर्ण अवतार माने जाते हैं। २

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