भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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१२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता इसी क्रम में गोपालसूरिकृत "पञ्चरात्र-रक्षासंग्रह" नामक ग्रन्थ आता है। गोपालसूरि कृष्णदैशिक के पुत्र तथा वेदान्तरामानुज के शिष्य थे। वह ग्रन्थ पञ्चरात्र के विविध क्रियाकलापों का विवरण देता है। प्रमाणसंग्रह भी ऐसा ही एक ग्रन्थ है जिसमें महाभारत,पुराण तथा स्मृत्यादि को आधार बनाकर पाञ्चरात्र मत की प्रामाणिकता दिखलाई गई है। पाञ्चरात्र-साहित्य विशाल है जिसके कुछ ही ग्रन्थ मुद्रित तथा प्रकाशित हैं। इन ग्रन्थों का दार्शनिक दृष्टि से कम महत्व है तथा सांप्रदायिक दृष्टि से अधिक है। फिर भी इस क्रम में जो महत्वपूर्ण ग्रन्थ है उनमें एक "सात्वतसंहिता है। इस ग्रन्थ के २४ अध्याय हैं। इसमें कहा गया है कि स्वयं नारायण ने ऋषि आदि के हितार्थ पञ्चरात्र शास्त्र का प्रवर्तन किया। 'सात्वत-संहिता" ऋषि द्वारा रचित मानी जाती है। "ईश्वरसंहिता" भी इस शास्त्र की महत्वपूर्ण रचना है। जिसमें २४ अध्याय हैं जिनमें मूर्ति, ध्यान, मन्त्र, शुद्धि तथा आत्मनिग्रह आदि विषय हैं तथा जिसमें दार्शनिक सिद्धान्त भी प्रतिपादित हैं। बाद में यह ग्रन्थ श्रीवैष्णव जन के दर्शन और धर्म का प्रमाणसिद्ध तथा आधारभूत ग्रन्थ माना गया। "हयशीर्षसंहिता" भी इसी क्रम में आता है। जिसमें देवमूर्ति प्रतिष्ठा तथा इनके निर्माण कार्य तथा अन्य प्रकारादि का विवरण है। यह ग्रन्थ विस्तीर्ण है तथा चार विभागों में विभक्त है। वैष्णवतंत्रीग्रन्थों में "जयाख्यसंहिता" चर्चा के योग्य है जिसका आगे (विषयादि) दिखलाने का प्रक्रम रखा गया है। इस तन्त्र के कुछ अन्य ग्रन्थ भी हैं जिनमें पद्मंसहिता, पौष्करसंहिता, सनत्कुमारसंहिता (जो एक बृहद् ग्रन्थ है), अनिरुद्धसंहिता महोपनिषद्, कश्यपसंहिता, विहगेन्द्रसंहिता, सुदर्शनसंहिता, अगस्त्यसंहिता आदि आते हैं। ये सभी ग्रन्थ न्यूनाधिकरूप में आनुष्ठानिक अर्चा आदि के विवरण से युक्त हैं तथा प्रायः अप्रकाशित भी। विष्णुसंहिता-भक्ति का प्रतिपादक ऐसा ग्रन्थ है जिसे भागवतयोग कहा गया है। "मार्कण्डेयसंहिता"ग्रन्थ को प्राचीन माना जाता है जिसमें वैष्णवतन्त्र की १०८ संहिताओं का उल्लेख तथा उसमें से ९१ संहिताओं की सूची दी गयी है। "जयाख्यसंहिता, अहिर्बुध्न्यसंहिता, विष्णुसंहिता, विहगेन्द्रसंहिता, परमसंहिता तथा पौष्करसंहिता नामक ग्रन्थ पाञ्चरात्र आगम के ऐसे ही ग्रन्थ है जिनमें साम्प्रदायिक अर्चा तथा कर्मकाण्डादि विषयों के साथ साथ तात्विक दार्शनिक चिन्तन भी मिलता है। यहां हम क्रमशः इस बिन्दु पर भी थोड़ा प्रकाश डालने का प्रयत्न करेंगे। इनमें भी जयाख्य तथा अहिर्बुध्न्यसंहिताएं अधिक महत्वपूर्ण मानी गयी हैं। जयाख्यसंहिता में वैदिक यज्ञादि से विरत होकर मुक्ति की प्राप्ति हेतु चिन्तना के क्रम में कहा गया कि ऋषिगण शाण्डिल्य मुनि के समीप गये तथा उनसे परमतत्व प्राप्ति की जिज्ञासा की। उत्तर में शाण्डिल्य ने नारद को नारायण द्वारा किये गये उपदेश की गाथा सुनाकर इसी क्रम में साधक के अन्तःकरण में उत्कट भक्ति की स्थिति की आवश्यकता प्रतिपादित की। यह कार्य उसे प्रथमसाधन के रूप में गुरु प्राप्ति से आरम्भ करना पड़ेगा जो शास्त्राध्यापन के द्वारा इसका ज्ञान करवाता है। बाद में सृष्टिप्रक्रिया का विवरण देकर श्रीविष्णु के अनेक आख्यान शिष्य को कहता है। गुरु बतलाता है कि जीव विशुद्ध चैतन्य के सत्य अनादिवासना के योग का परिणाम है। इस वासना को दूर करने के लिये ब्रह्म में से एक विशिष्ट शक्ति उत्पन्न होती है कि जीव के अन्तर्गत शुद्धचैतन्य अपने कर्मों के क्षीण हो जाने पर वासना रहित हो जाता है और अन्त में ब्रह्म से एकरसता प्राप्त कर लेता है। चैतन्य का जड़ से सम्बन्ध ईश्वर की विशिष्ट शक्ति द्वारा होता है जो आत्मा का माया के संयोग से अनेक भोगों का अनुभव करवाता है तथा बन्धन के टूटते ही शुद्धचैतन्यरूप आत्मा का ब्रह्म से एक भाव हो जाता है। जयाख्य-संहिता में दो प्रकार के ज्ञान का उल्लेख हैं जिन्हें स्थिति या सत्तारूप तथा क्रिया या क्रियारूप ज्ञान कहते हैं। क्रियारूप ज्ञान के अन्तर्गत यम नियम आदि अनुशासन आते हैं तथा इन